मेरे घर के सामने दरिया-ए-ब्यास के उस पार जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा, अतिक्रमणकारियों के क्रूर चंगुल से बचा हुआ है। जहां शायद कभी गांव के पशु चरा करते होंगे ? समय बदला, इंसान बदला और उसका पेशा तथा जीवन पद्धति बदली। उसने पशुओं का साथ छोड़ मशीनों का हाथ थामा। गांव की समस्त सामुदायिक सम्पति जंगल और जमीन पर दबंगों ने कब्जा कर लिया। कुछ जमीन फिर सरकार बहादुर ने दिल्ली एक बड़ी कंपनी के रसुखदार मालिकों के हाथ सौंप दी। बताया जाता है यहां पर ‘हर्बल फ़ार्मिंग’ होती है। काफी बड़े क्षेत्र में फैले इस फार्म में बड़े-2 ग्रीन हाउस के प्लास्टिक के तम्बू लगे हुए हैं।

ब्यास के किनारे गिद्धों कि नज़र से बचा हुआ जमीन का यह छोटा सा टुकड़ा, कभी कभार ही आबाद होता हुआ दिखता है। जैसे साल में दो बार एक गुज्जर परिवार और उसकी भेंसें आ कर यहां दो-तीन दिन रुक कर अपनी अगली यात्रा शुरू करता था। कुछ साल पहले सरकार हुज़ूर की बुरी नज़र इस पर भी पड़ गई और 2018 के शुरू होते ही उस क्षेत्र को एक पार्क बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो गई। क्षेत्र को बंद कर दिया गया। लेकिन उसी साल सितम्बर महीने की बाढ़ ने उस क्षेत्र को पहले वाले से भी बदतर हाल में पहुंचा कर रख दिया।

2018 की बाढ़ के दौरान भी मैंने इस पर कई लेख लिखे थे। जिनमें इस बात पर ज़ोर दिया था कि यह आपदा नहीं है, इसे प्रकृति और मानव के बीच एक खेल समझना चाहिए, जिस में प्रकृति पहले अपनी चाल चलती है और फिर इंसान को उसका जबाव देना होता है। आज तक के अधिकतर मेचों में मनुष्य की ही जीत हुई है। उन लेखों में मैं अपने घर के सामने एक छोटे से मैदान का जिक्र किया करता था। ऊपर उसी की बात कर रहा हूं। आज दो साल बाद जमीन का वही टुकड़ा एक बार फिर हरा भरा हुआ है। सुबह उठ कर बाहर आता हूं, पहली नज़र उसी पर पड़ती है, खुश हो जाता हूं। अब इन दो सालों में स्थिति में थोड़ा परिवर्तन हुआ है। गांव में कहीं से एक गधों वाला आ कर रहने लगा है। हर रोज सुबह 6 से शाम के 6 बजे तक वह अपने गधों से दरिया किनारे से रेत, पत्थर आदि ढोने का काम बिना रुके लेता है। बेचारे गधों को सुबह से रात तक लाद कर भगाया जाता है। पता नहीं कब खाते हैं, कब सोते थे, ये गधे ?

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लेकिन इस लॉकडाउन के दौरान मैंने उन गधों को देश के बैंकों और गरीब जनता को लूट कर मौज करते बड़े लोगों की भांति सुबह से शाम तक दिन भर मस्ती में हरी घास चरते, कभी पेड़ों की घनी छांव में विश्राम करते हुए तो कभी एक दूसरे पीछे दौड़ कर खेलते हुए देखा है। आजकल तालाबंदी के चलते मिली आज़ादी का भरपूर आनन्द ले रहे हैं, रेत वाले के गधे। गधों ने सबसे ज्यादा एंजॉय किया है तालाबंदी या लॉकडाउन को।

इस दृश्य को देख कर मुझे एहसास हुआ कि इन्सान ने बहुत से स्थानों पर कुछ ज़्यादतियां भी की हैं। सजीव एवं निर्जीव सब को अपनी सुख सुविधा बढ़ाने के लिए बड़ी सफाई और सफलता से प्रयोग किया है। इसे देख कर ही तो मानव बुद्धि और प्रतिभा की श्रेष्ठता की प्रशंसा और उसकी सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करता हूं। दूसरी तरफ उस की निर्दयता, स्वार्थ और हबस पर दु:ख और अफसोस भी प्रकट करता हूं।