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‘हीरो ऑफ़ कंचनजंगा’ कर्नल प्रेम से खास बातचीत

मूलरूप से गांव लिंडूर, ज़िला लाहौल-स्पीति के रहने वाले 75 वर्षीय कर्नल (रि.) प्रेम चंद, केसी, एसएम, वीएसएम। सेनिक सम्मानों के अतिरिक्त भारतीय पर्वतारोहण प्रतिष्ठान द्वारा देश में पर्वतारोहण एवं साहसिक कार्य क्षेत्र में दीर्घकालीन श्रेष्ठता हेतु ‘स्वर्ण एवं रजत पदक’, यूएसआई द्वारा एक सीमा क्षेत्र की खोज हेतु ‘मेकग्रेगर पदक’ तथा फ़्रांस द्वारा नन्दा देवी के सफल अभियान के लिए ‘मेडल’ से सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में बदाह, कुल्लू कस्बे से लगभग दो कि.मी. की दूरी पर मंडी के रास्ते में, बहुत से लाहौल वालों की तरह अपने परिवार के साथ रहते हैं। काफी समय पहले यह तय किया गया था कि सद्प्रयास के लिए पहला साक्षात्कार सीधे, सपाट, ईमानदार और राजनीतिक दलों से सीधे संबद्ध न रहने वाले किसी व्यक्ति का लिया जाये और वे यही हो सकते थे। क्योकि एक सच्चे सैनिक की तरह वे भी वक्त के पाबंद हैं इसलिए तय समय पर उनके घर पहुंचा तो उनको बिलकुल तैयार पाया। उनके छोटे से कार्यालय में हर वस्तु करीने से रखी हुई कुछ यादगार फोटो दीवारों पर थे। दो घंटे की बातचीत के दौरान वे एक अनुशासित सैन्य अधिकारी भांति पूरी तरह से तने हुए और सजगता से बैठे रहे। सद्प्रयास के लिए साक्षात्कार ल.च.ढिस्सा ने लिया जो यहां दिया जा रहा है।

ढिस्सा- जीवन की कहानी शुरू करने की बात हो तो कहां से शुरू करना चाहेंगे?
प्रेम- ज़ाहिर है वहीं से जहां से मैंने दुनिया को बड़ा होते हुए पाया। यानि कि बचपन से। पहली बार अपने गांव से बाहर दूसरे गांव गया, स्कूल में दाखिल होने के लिए। 1950-51 में प्राईमरी स्कूल जाहलमां गया। वहां मैंने महसूस किया कि दुनियां बड़ी है। अपने छोटे से गांव से निकल कर स्कूल में पहली बार अध्यापकों, दो-तीन दुकानों को देखा। प्राईमरी परिक्षाओं में अपनी कक्षा में प्रथम आता रहा। उसके बाद 26 कि.मी. दूर हाई स्कूल केलंग चला गया। वहां हॉस्टल में रहता था। वहां पर जाकर जीवन में पहली बार प्रतियोगिता की भावना मन में आई। क्योंकि मेरी कक्षा में एक विद्यार्थी लाल चंद था जो परीक्षा में प्रथम रहता था। मैंने उसके साथ प्रतियोगिता करने की ठानी।

मैं जहां रहता था वहां से लाल चंद के कमरे की खिड़की दिखाई पड़ती थी, रात को जब तक उसकी रोशनी रहती मैं भी नहीं सोता था। पहले दो साल तो वह प्रथम आता रहा लेकिन तीसरे साल आठवीं कक्षा में मैं प्रथम रहा। यहीं से कम्पीटीशन की भावना आई। उस स्कूल में एक मास्टर हुआ करते थे, नाम था रामनाथ बहुत अनुशासित, मेहनती और अपने कर्त्तव्य के प्रति समर्पित। (स्कूल की एक घटना को याद करते हुए बताते हैं) स्कूल में बच्चों में बांटने के लिए पहली बार बिस्कुट, मीठे छोले आदि आए थे, लेकिन उनको बच्चों में न बांट कर कुछ और लोग ही खा लेते थे। इसे लेकर हम लोगों के मन में रोष पैदा हो रहा था और हम इस का विरोध करना चाह रहे थे। इसका मौका हमें तब मिला जब पीटीआई मास्टर ने एक विद्यार्थी की बुरी तरह पिटाई कर दी। उसी रात को हम सबने मिल कर पोस्टर बनाए, जिसमें ‘पीटीआई भालू है’ जैसे नारे लिख कर रातों रात पूरे केलंग में चिपकाए। जो लाहौल और केलंग में पहली बार हुआ था। परिणाम हुआ बिस्कुट आदि का वितरण बच्चों में किया जाने लगा और पीटीआई साहब उसके बाद मेरी कक्षा में कभी नहीं आए।

केलंग से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद मैं लुधियाना के लिए चला क्योंकि मैं कृषि विज्ञान में बीएससी करना चाहता था। हां! उससे पहले एक घटना घटी, मास्टर रामनाथ मेरे घर लिंडूर किसी कार्यवश आये तों मेरे घर भी आये और मेरे घर वालों से पूछा कि मैट्रिक के बाद प्रेम चंद से क्या करवाना है तो पिताजी ने जवाब दिया कि पटवारी आदि बनाएंगें। इस पर मास्टर जी ने कहा कि नहीं इसे आगे पढ़ाओ लड़का होशियार है। मैं कोई बहुत पैसे वाले घर का नहीं था, कुछ पैसे लेकर घर से चला और चाचा जी मेरे साथ मनाली तक आए। अब बरसात का मौसम था रास्ते ठीक नहीं थे। इसलिए किसी के साथ भुंतर से हवाई जहाज में चंडीगढ़ पहुंचा, वहां से लुधियाना। कालेज जाने पर पता चला कि एडमिशन खत्म हो चुके हैं। इसलिए धर्मशाला चल पड़ा क्योंकि वहां पर लाहौल के बहुत लड़के पढ़ते थे। वहां पर अचानक निहाल चंद ठाकुर मिल गए, जो उस समय जनजातीय सलाहकार समिति के सदस्य थे, उनके साथ लाहौल के कुछ और लोग भी थे। मैं भी उनके साथ हो लिया और चंडीगढ़ में उनके माध्यम से पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री स. प्रताप सिंह कैरों मिला और उनसे कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के प्रिंसीपल के नाम एक पत्र लेकर वापस लुधियाना पहुंचा और कॉलेज में दाखिला ले लिया।

ढिस्सा- जीवन में किससे प्रभावित रहे या आदर्श कौन रहे?
प्रेम- केलंग स्कूल के दौरान संपर्क में आए मास्टर रामनाथ जो अपने डीयूटी के प्रति ईमानदार, अनुशासित और मेहनती अध्यापक थे, उनसे मेंने बहुत कुछ सीखा। उनके जीवन, जीवनशैली और कार्यकलापों का मेरे ऊपर बहुत प्रभाव पड़ा जो आज भी बरकरार है।

इसके अतिरिक्त सेना में नियुक्ति के बाद पहली बार संपर्क में आए अफसर मेजर रोमेश वर्मानी, जिसे ‘रोमी’ कह कर बुलाया जाता था। बहुत तेज़-तर्रार, सीधे, ईमानदार, स्पष्टवादी और सदा तन कर रहने वाले अफसर थे। उनसे इतना प्रभावित हुआ कि अपने बड़े बेटे का नाम रोमेश रखा और आज उसे रोमी के नाम से बुलाते हैं। जहां तक आदर्श की बात है, मेरे आदर्श रहे हैं, मेजर जनरल चन्दन सिंह नोग्याल जो जम्मू से थे। बाना सिंह को परमवीर चक्र उन्हीं की कमांड के दौरान मिला। मैं उनकी बड़े भाई की तरह इज्ज़त करता हूं।

ढिस्सा-  सेना में जाने के पीछे की सोच या उद्देश्य?
प्रेम- नहीं, किसी योजना के अंतर्गत भर्ती नहीं हुआ, यह अचानक हुआ है। हां! केलंग स्कूल के दौरान पीएपी (पंजाब आंर्ड पुलिस) के अफसरों को देख कर कभी-2 बर्दीधारी बनने की मन में इच्छा होती थी। कॉलेज जाने के बाद मेरा पूरा ध्यान पढ़ने पर था कि बीच में ‘एमरजेंसी कमीशन’ का विज्ञापन आ गया साथियों के साथ-2 भर दिया और टेस्ट देकर आ गया। कुछ दिनों बाद इंटरव्यू के लिए कॉल आ गई और बहुत से दोस्तों के कहने पर न चाहते हुए भी मेरठ जाकर इंटरव्यू दे भी दे आया और अंत में चयन हो गया और मैंने हाजरी दे दी।

ढिस्सा- ‘कंचनजंगा का हीरो’ सुनने पर कैसा लगता है, यह नाम किसने दिया?
प्रेम- मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यह नाम शायद मीडिया ने दिया हो, क्योंकि मुझे ‘स्नो टाइगर’ भी कहते हैं, जो नाम 13 डोगरा के सीओ ने दिया है। (रुककर) हां! 1965 में पहली बार भारतीय टीम ने एवरेस्ट पर चढ़ने में सफलता पाई थी, उस टीम में सबसे कम उम्र का सदस्य था सोनम वंज्ञाल लद्दाखी था, उसे भी मीडिया ने ‘हीरो ऑफ एवरेस्ट’ का नाम दिया था।

ढिस्सा- पर्वतारोहण का क्षेत्र क्यों चुना?
प्रेम- उस समय मैं 13 डोगरा में डिगशाई में नियुक्त था यहां से ही मुझे शुगर सेक्टर किन्नौर नियुक्त कर दिया। वहां से कारणों के चलते 1965 में ‘स्कींग एंड स्नो वारफेयर’ के लिए गुलमर्ग भेज दिया गया। वहीं से ‘माउंटेन वारफेयर ट्रेनिंग’ के लिए चला गया और आखिर में ‘एडवांस माउंटेन वारफेयर’ स्कूल में इंस्ट्रक्टर नियुक्त कर दिया गया और इस प्रकार मेरा पर्वतारोहण के साथ अटूट नाता जुड़ गया।

ढिस्सा- सैनिक और नागरिक जीवन में क्या फर्क लगता है?
प्रेम- जहां सैनिक जीवन में अनुशासन, पारदर्शिता, विश्वास, विश्वसनीयता है वहीं सिविल में इन सबका अभाव है या कहें बिल्कुल नहीं हैं।

ढिस्सा- लाहौल पोटैटो सोसाइटी से संबद्ध अनुभव…..?
प्रेम- जिस उद्देश्य को लेकर लाहौल पोटैटो सोसाइटी का गठन किया था, वह कहीं दिखता नहीं। आज वह भ्रष्टाचार, कुशासन और राजनीति का अड्डा बन चुका है। मैंने कुछ सुधारने का प्रयास किया लेकिन नहीं कर पाया।

ढिस्सा- अफस्पा पर क्या विचार हैं, क्या यह अधिनियम सेना और नागरिकों के बीच दूरियां पैदा करता है?
प्रेम- जहां तक आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा) का संबंध है, हालातों के मुताबिक प्रासंगिक है लेकिन राजनैतिक मुद्दों को राजनैतिक तरीके से सुलझाने के बजाए यह कानून व्यवस्था के मुद्दे बना कर उलझा दिये जाते हैं। नहीं, इससे सेना और नागरिकों के बीच दूरियां पैदा हुई हैं, यह कहना गलत है।

ढिस्सा- उन क्षेत्रों में जहां अफस्पा लागू होता है, में सेना द्वारा ज़्यादतियां होती हैं क्या, जैसा बताया जाता है?
प्रेम- संभव है ऐसा हो। लेकिन सेना के इस तरह के प्रयोग से सेना और सैनिक के नैतिक, प्रशिक्षण, प्रतिष्ठा और रुतबे पर फर्क पड़ता है। (मेजर गोगोई के मानव ढाल पर बात करने पर कहते हैं) मैं उनके कार्य से सहमत हूं।

ढिस्सा- जीवन के सबसे यादगार पल और प्रिय वस्तु….?
प्रेम- (संजीदा होते हुए) हां! मैं तब नेहरू इंस्टिच्युत ऑफ माउंट ट्रेनिंग, उत्तरकाशी में वाइस प्रिंसीपल तैनात था। एडवांस माउंट ट्रेनिंग कोर्स के मध्य ‘जावंलि ट्रेनिंग’ चल रही थी और मैं अपने सहयोगियों नीमा और रत्न सिंह के साथ प्रशिक्षणार्थियों को लेकर गया था।

उसके दौरान हमें ‘बंदरपूंछ शिखर’ पर पहुंचना था। नीमा के पांव ठंडे पड़ने की शिकायत के कारण नीमा को पीछे छोड़ मैं रत्न सिंह के साथ दूसरे दिन की चढ़ाई की तैयारी के लिए चला गया। बेस केम्प से चलते हुए आसमान साफ था। लेकिन अचानक बादलों का एक टुकड़ा हमारे ऊपर आ गया, अंधेरा हो गया और जीरो विजीविलिटी हो गई। हमारे सिर के बालों के बीच चींटियां सी रेंगती हुई लग रही थी जो बिजली गिरने का संकेत था। बिजली भी कड़कने लगी। काफी देर बाद जब कुछ दिखाई देने लगा तो देखा कि सामने ‘आईस वाल’ बन गया था। नीचे उतरने के लिए अब हमें फिर पीछे जाना पड़ता। लेकिन अब एक तो रात का अंधेरा छाने वाला था दूसरा सामने ‘आईस वाल’ बन गया था। हम थके हुए थे और हमारे पास खाने-पीने के नाम पर सिर्फ 200 मिली लीटर जूस की बोतल थी। रात को वहीं रुकने का तय कर बर्फ में गुफा बनाई और रस्सियां आदि डाल कर उसके ऊपर बैठ गए। रात को बारी-2 सोने का कार्यक्रम बनाया और पहले मेरा सहयोगी इंस्ट्रक्टर रत्न सिंह सोया और मैं जागता रहा। सारी रात हम एक दूसरे को हिला डुला कर हाल पुछते रहे और ‘टो काउंटिंग’ यानि पैर के पंजे की गिनती करवाते रहे, जिसमें पैर की उंगलियों को हिलाया जाता है। जिससे पता चलता है पैर ठीक है कि नहीं। कहीं ‘फ्रोस्ट बाईटिंग’ तो नहीं हुआ है। वहां पर मैंने जीवन में पहली बार प्रभु से प्रार्थना की थी- ‘कुछ करना है तो जल्दी करना यदि नहीं तो दोनों को कुछ नहीं करना’। लंबी रात आखिर कट गई, सुबह की पहली किरणों ने जीवित होने का एहसास दिया। उधर बेस कैंप से संदेश भेजा जा चुका था कि वाईस प्रिंसीपल और इंस्ट्रक्टर गायब हैं।

ढिस्सा- सद्प्रयास से बातचीत करने के लिए आपका धन्यवाद।
प्रेम- आपको सद्प्रयास की दुबारा शुरुआत के लिए शुभकामनाएं,धन्यवाद।

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