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स्कूलों में बढ़ते अपराध; अध्यापक और विद्यार्थी के बदले रिश्ते

एक वह भी समय था जब हम में अपने अध्यापकों को नमस्ते करने का मुक़ाबला सा होता था। सुबह स्कूल में जाते तो सब बिल्कुल चेतन हो कर रहते थे कि कब मास्टर जी आते हैं और हमें उन्हें नमस्ते करनी है। जैसे ही मास्टर जी आने शुरू हो जाते थे, हम में होड़ मच जाती थी, उन्हें नमस्कार करने की। दोनों हाथ जोड़कर ‘नमस्ते मास्ट्री’…, मास्टर जी ध्यान न देते तो घूम कर फिर उनके सामने पहुंच जाते थे उसी मुद्रा में दोनों हाथ जोड़े, बाजू पूरी लम्बाई में फैलाये हुए जैसे कि नमस्ते सीधे उनके दिल तक पहुंचा कर रखेंगे। मास्टर जी कभी ध्यान देते, कभी नहीं देते। यदि उनका ध्यान हमारे नमस्ते की तरफ न जाता तो फिर नमस्ते करने की दिशाएं बदल जाती, कभी दाएं कभी बाएं तो कभी सामने। दिन में जितनी भी बार मिले मास्टर जी शिष्य नमस्ते करेगा ही करेगा। फिर उनकी कुर्सी को लाने और लाकर क्लास के आगे रखने का मुक़ाबला होता था और कक्षा का सबसे स्वस्थ लड़का उसमें बाज़ी मार ले जाता था। फिर कक्षा के कमरे की यदि कोई हो, नहीं तो बाहर खुले में जहां क्लास बैठती थी उस जगह की सफाई भी की जाती थी।

मैंने जब स्कूल जाना शुरू किया वह 1961 का वर्ष था। लाहौल तब बहुत ही कठिन क्षेत्र था। किसी प्रकार के यातायात की सुविधा नहीं थी। लोगों का आना-जाना पैदल ही था। चाहे वह स्थानीय यात्राएं हों या कि दूर के क्षेत्र कुल्लू और चंबा आदि की हों। मेरे गांव जाहलमा से पूरे आठ दिन लगते थे कुल्लू ज़िले के मुख्यालय पहुंचने के लिए। लाहौल में शिक्षक या अध्यापक बनने योग्य पढ़े-लिखे लोग ही उपलब्ध नहीं होते थे। इस लिए गिने चुने कुछ लोग थे जो मास्टर बने थे। यद्यपि तब मास्टर यानि प्राइमरी मास्टर के लिए तो आठवीं पास ही चल पड़ता था। किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं, कोई टेस्ट नहीं और कोई साक्षात्कार नहीं। बस एक कोरे कागज पर प्रार्थना पत्र और मास्टरी पक्की। लाहौल में उन दिनों कांगड़ा के अध्यापक अधिक आते थे। क्योंकि तब मेरा क्षेत्र कांगड़ा ज़िला में था और पंजाब लाहौल कहलाता था और ब्रिटिश राज का सीधा हिस्सा था। यह मास्टर लोग पढ़ाई के लिए मारते भी बहुत थे। डंडे मारना, चांटा-थपड़ और नाक पकड़ कर चांटा मरवाना प्रचलित थे। सजाओं में मुर्गा बनाया जाना, एक टांग पर खड़ा कर देना, क्लास रूम के बाहर या क्लास से दूर खड़े कर देना भी होता था। कुछ डंडे शरारत करने के, कुछ पढ़ाई में कमजोर होने के पड़ते थे सब मिलाकर शाम को हाथ लाल हो जाया करते थे। इतनी मार पड़ने पर भी मजाल कि बच्चों के माता-पिता या बच्चा स्वयं भी नाराज हो मास्टर जी से। दूसरे दिन उसी ताज़गी के साथ मास्टर जी के स्वागत के लिए खड़े मिलते थे।

दिन के समय बाहर धूप में क्लासें लगती थी और मास्टर जी कुर्सी पर आंखें मूँदे अर्ध निद्रा में रहते थे और हम कभी असल कभी नकली लघुशंका जाने के उपक्रम में मास्टर जी के सामने हाथ जोड़े खड़े होकर प्रार्थना करते थे। मास्टर जी आँखें खोलो, मेरा पजामा गीला हो रहा है। दिन के समय स्कूल की घंटी बजाने की होड़ होती थी और शाम को बैठने के लिए बिछाई टाट को बारी-2 से लपेटने और संभालने की ज़िम्मेदारी। देर शाम फिर मास्टर जी के डेरे (किराये के कमरे) में हरी सब्जी, दूध आदि पहुंचाने की डियूटी और यह सब साधारणत: बिना किसी प्रकार के लेन-देन का मामला होता था। मास्टर जी स्कूल के बाद के समय में भी कहीं दिख जायें या मिल जायें तो यदि हम खेल भी रहे हों तो छिप जाते थे यदि नहीं तो ‘मास्ट्री’ (मास्टर जी) को सम्मान देने और उनसे पहचान पाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते, जिसमें नमस्ते भी शामिल था।

लेकिन वक्त बदला, वक्त के साथ-2 सब कुछ बदल गया, तो भला गुरु-शिष्य के सम्बन्धों की बिसात ही क्या थी। वे भी बदले और आज हर रोज अखबारों की सुर्खियां होती है, अमुक स्कूल में एक अध्यापक ने छात्रा के साथ बलात्कार किया या छेड़छाड़ की है। जिसका ताजा उदाहरण है हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे से राज्य के ज़िला चंबा का है जहां एक शिक्षक ने एक छात्रा से बलात्कार किया। सरकारी स्कूलों के समाचारों में तो उनके परिणामों के गिरते स्तर के समाचार और इस तरह के उलूल-जलूल समाचार अधिक छपते रहते हैं। तब हमें लघुशंका जाना होता था, पानी पीने जाना होता था तो हम अपने अध्यापक से हाथ जोड़कर आज्ञा मांगते थे, लेकिन आज का विद्यार्थी शिक्षक को छोटी उंगली दिखाता है और शिक्षक देखे न देखे, इजाजत दे न दे छात्र अपने पीछे हमेशा लदे रहने वाले थेले के साथ कक्षा से बाहर हो जाता है। दूसरी ओर मास्टर जी का ध्यान भी स्कूल व बच्चों की पढ़ाई के बजाय अपने निजी कामों की तरफ अधिक होता है। जिसमें बिजनेस, खेतीबाड़ी और ट्यूशन आदि शामिल हैं। छोटे शहरों में स्कूल के बाद मास्टर ट्यूशन की क्लासें लगाते हैं, तो महानगरों में ट्यूशन संस्थानो में पढाते हुए दिख जाते हैं। सरकारी स्कूलों के तो लगभग सब टीचरों के बच्चे निजी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं। यानि कि सरकारी स्कूल के अध्यापक अपने बच्चों को ठीक से पढ़ने के लिए निजी स्कूल में डालते हैं। मजेदार बात यह कि वे दूसरों के बच्चों को अच्छे से पढाने का दावा करते हुए ऊंचे-2 वेतन-भत्तों की मांग करते हैं। इस विषय में बातचीत के बीच में एक जिम्मेदार अध्यापक ने यह माना कि शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों के मध्य बनते निम्न स्तर के रिश्ते के लिए ज्यादा ज़िम्मेदारी अध्यापकों की है।

हम लोग अपने मास्टरों से बात नमस्ते से शुरू करते थे फिर कुछ पुछते थे। परंतु आज का शिष्य हाय से शुरू और बाय पर खत्म करता है और बाजारू भाषा में गुरु जी का सम्मान बढ़ता है। शिक्षक जिन्हें विद्यार्थियों का आदर्श बनना चाहिये, अब्बल तो बच्चों को भाव ही नहीं देते यदि देते भी हैं तो एक व्यापारी की तरह। अध्यापक विद्यार्थियों को अपने बच्चे मन कर उन्हें पढ़ते थे। आज जहां शिक्षकों के अंदर गैर-ज़िम्मेदारी की भावना में बृद्धि हुई है वहीं पर विद्यार्थियों में भी शिक्षकों के लिए इज्ज़त कम हुई है। उनके रिश्तों में बहुत अधिक औपचारिकता आई है जिसके परिणामस्वरूप एक दूसरे पर विश्वास में कमी आई है। शिक्षकों के सम्बन्ध अभिभावक और रक्षित के न रह कर व्यवसायी व ग्राहक के बन गए हैं।
ल.च.ढिस्सा
(सामाजिक कार्यकर्ता)

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