आज एक नई दुनिया में लिये चलता हूं। देश के उत्तर में अन्तिम छोर पर मध्य हिमालय में स्थित ज़िला लाहौल-स्पिती (Lahaul Spiti) के लाहौल क्षेत्र की चंद्रा व चन्द्रभागा घाटियों में। इन घाटियों का अत्याधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण जीवन जीने वाले जीवट लोगों में से एक प्रजाति जो अंतोगत्वा सिर्फ एक जाति बन कर रह गई, की सांस्कृतिक धरोहर से (चिनलभाशे: अस्तित्व के लिए संघर्ष (Lahaul-Spiti) के अंतर्गत) साक्षात्कार करवाता हूं।
हां! मैं अपने ‘चिनाल’ समुदाय की बात कर रहा हूं, जो यहां सिर्फ एक जाति, वह भी अछूत बन कर रह गया (Lahaul Spiti)। अपने आगे पीछे का एक लम्बे लेकिन अज्ञात इतिहास को छोड़-भूल कर हिमालय की कन्दराओं में, उस भोट बहुल और भोटी (तिब्बती-बर्मी) भाषा/बोलियों के बीच आज भी लगभग उसी भव्यता, सुन्दरता और विशालता से खड़ी बोली से परिचित करवाना चाहता हूं।
मैं बात कर रहा हूं, ‘चिनाल’ समुदाय की भाषा/बोली ‘चिनलभाशे’ की, 1980 में इस क्षेत्र से बाहर के एक विद्वान द्वारा ‘चिनाली’ एक गलत नाम देकर जिसका परिचय करवाया गया था। उसी ‘चिनलभाशे’ के शब्दों की एक झलक दिखाना चाहता हूं, बिना ढोल-नगाड़े पीटे, बिना किसी व्यक्ति/संस्था की सहायता या सहयोग से जिसके शब्दों के संचयन का एक अदना सा प्रयास किया गया है। इस संचयन में इस भाषा/बोली के लगभग 8000 शब्द हैं, परन्तु इसे शब्दकोश कहने की हिमाकत इस लिए नहीं कर सकता, क्योंकि यह उन मानकों और शर्तों को पूरा नहीं करता, जो शब्दकोश के लिए अनिवार्य हैं।
चिनलभाशे: अस्तित्व के लिए संघर्ष (Lahaul-Spiti)
एक आग्रह है, इस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है कि मैं न तो कोई भाषाविद हूं और न ही ऐसा दावा करने की धृष्टता कर सकता हूं। मैं तो सिर्फ एक छोटा सा समाज कार्यकर्ता हूं और मेरा प्राथमिकता का क्षेत्र है सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक।
परन्तु, क्योंकि राजनीति में, मैं बात करता हूं अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों की। भाषा क्योंकि मानवजाति के समाज विशेष के अस्तित्व के साथ सीधे जुड़ी हुई है, इस लिए यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है, उसके पहचान का और मेरे मिशन का, जिसका मोटो है ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’।
https://www.sadprayas.com/2018/02/28/nine-languages-of-lahaul-speaking-should-be-added-in-unescos-list-of-endangered-languages/
