काफी समय बाद एक बार फिर देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समाचारों में दिखे हैं। इस बार किसी आंदोलन, प्रदर्शन या धरने के नहीं बल्कि नौएडा-कालकाजी मेट्रो लाईन के उद्घाटन में उन्हें आमंत्रित न करने के कारण है। इस अवसर पर जिसमें उदघाटन कर्त्ता देश के प्रधानमंत्री मोदी जी थे एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उपस्थित थे। परन्तु बताया गया है कि इस कार्यक्रम में दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन (डीएमआरसी) के इस कार्यक्रम की व्यवस्था नोएडा प्राधिकरण द्वारा की गई तथा आमंत्रितों की सूची उत्तर प्रदेश सरकार ने दी थी, में व्यवस्थापकों द्वारा दिल्ली के मुख्य मंत्री केजरीवाल साहब को आमंत्रित ही नहीं किया गया था। इस समाचार की सच्चाई क्या है, इस घटना के पीछे क्या कारण हैं और इस पर केजरीवाल तथा दिल्ली सरकार की प्रतिक्रिया क्या होगी यह तो वही जाने। परन्तु आमंत्रित नहीं करने की बात यदि सच है तो यह बहुत बड़ी गलती कही जा सकती है और इसे किसी भी तरह की भूल या छूट नहीं अपितु जानबूझ कर की गई कार्यवाही ही कहा जा सकता है। एक प्रजातांत्रिक देश के दो राज्यों के बीच के कार्यक्रम में उन राज्यों के चुने गए मुख्य मंत्रियों में से एक को बुलाया भी न जाये और एक के पधारने का आवश्यकता से अधिक प्रचार-प्रसार किया जाये, इसे किसी भी तरह सही नहीं कहा जा सकता। समाचारों में यह भी बताया गया है कि इस लाईन के नौ स्टेशनों में सात स्टेशन दिल्ली क्षेत्र तथा मात्र दो स्टेशन उत्तर प्रदेश में आते हैं। फिर भी एक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम के द्वारा एक प्रदेश के चुनी हुई सरकार के मुख्यमंत्री को उसी प्रदेश में हो रहे कार्यक्रम में न बुलाया जाना, उस उपक्रम द्वारा किया गया असम व नयाचार के विरुद्ध कार्य माना जाएगा और जिम्मेदार अधिकारियों पर सेवा नियमों के अन्तर्गत कारवाई की मांग करता है। यद्यपि दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री इस घटना पर ट्वीट्टर पर विरोध जता चुके हैं फिर भी प्रधानमंत्री तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालयों को इसका संज्ञान लेना चाहिये।

यह ठीक है कि केजरीवाल भाजपा के नहीं हैं, एक अलग राजनैतिक पार्टी से हैं, उनके विचार, विचारधारा, सिद्धांत भाजपा से मेल नहीं खाते, जो कि प्रजातंत्र की एक आवश्यक शर्त भी है। लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि एक मुख्यमंत्री को उसके राज्य से संबन्धित कार्यक्रम के अवसर पर आमंत्रित करना भी आवश्यक न समझा जाये। यह भी सही है कि केजरीवाल एक व्यवस्था विरोध और आंदोलन की उपज हैं और उन्होंने अपनी पहचान इसी से बनाई है। एक व्यवस्थित टेक्नो-ब्यूरोक्रेटिक जीवन से समाज-राजनैतिक क्षेत्र में प्रवेश किया है। यह भी ठीक है कि उनका राजनीति में प्रवेश एक अप्रत्याशित और चौंकाने वाली घटना थी। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन और धरना। धरना के स्थान, दिल्ली के जंतर मंतर पर राजनैतिक पार्टी का गठन और एकदम दिल्ली की सत्ता पा लेना। फिर धीरे-2 अपना असली रंग दिखाना और आंदोलन के अपने तमाम महत्वपूर्ण साथियों अन्ना हज़ारे, योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण आदि को छोड़ना व बाहर का रास्ता दिखाना।

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केजरीवाल साहब आईआरएस (जैसे कि उनके साथी धमकाने वाले अंदाज़ में दावा करते हैं) के साथ जो हो जाए कम है। एक साल पहले एक बड़ी समस्या उनके और उनकी सरकार के सामने आई थी। और वह थी उनके अपने कार्यालय सीएमओ में नौकरशाहों की कमी। कुछ अफसरों को गिरफ्तार किया गया, कुछ नौकरी छोड़ रहे थे, कुछ का स्थानांतरण हो रहा था और कुछ अपने पुराने विभागों में वापसी कर गए थे। यहां तक कि पूरे सचिवालय में यह विचार फैलाया जा रहा था कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। इसलिए सरकार को काम चलाना अति कठिन हो गया था। बता दिया जाये कि जो लोग नई राजनीति के नाम पर सत्ता में आए, उनमें अपने वादे के प्रति प्रतिबद्धता नहीं थी। उन्होंने सब कुछ उसी पुराने तरीके से करना शुरू कर दिया था। यहां पर उन्हें पार्टी भी कहने में भी शंका होती है। क्योंकि नई राजनीति देने वाली पार्टी में इतने कम समय में बिखराव आया जिसकी कल्पना नहीं की जा गई थी। यहां तक कि संस्थापकों का पार्टी से बाहर निकाल दिया जाना, उसके कई विधायकों के विरुद्ध कानूनी कारवाइयां और भ्रष्टाचार के इतने आरोप। वह भी उसके प्रमुख पर, जो कि इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के दम पर चुनाव जीते थे। पार्टी में व्यक्ति पूजा की सीमा लांघ दी गई, हर तरफ सिर्फ और सिर्फ केजरीवाल ही केजरीवाल सुनाई देने लगा था।

केजरीवाल साहब और उनकी सेना को समझना चाहिए था कि कागज़ की नाव पर तूफानी समुद्र पार नहीं होता। लोग तो कागज की नाव को असली नाव समझ कर धोखा खा गये, लेकिन सागर के पानी ने कागज को पहचान लिया….। पहले ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’, ‘अन्ना हज़ारे’, ‘लोकपाल’…..। तमाम दुखों की एक दवा के तर्ज़ पर दिल्ली की अत्यधिक पढ़ी लिखी जनता को गच्चा और दिल्ली का राजपाठ।

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ऐसा कौन सा झूठ था जो वे लोग नहीं वोले, ऐसा कौन सा हथकंडा था जो उन्होंने नहीं अपनाया? बेचारे दिल्ली वालों को लगा कि ‘राम वाण’ लेकर ‘राम राज’ आ गया है, अब उनकी समस्त दुख तकलीफ़ें दूर हो जाएंगी।

केजरीवाल साहब के सेना नायक टीवी के और दूसरे कार्यक्रमों में मीडिया के सामने ताल ठोंक कर अन्य विशेषताओं के अतिरिक्त केजरीवाल की कुर्बानियां भी गिनाते थे। जैसे कि केजरीवाल ने सरकारी नौकरी छोड़ कर देश पर एहसान किया हो। इसी देश में सैनिक, पुलिस, मजदूर, किसान हर रोज कुर्बान हो रहे हैं, कोई सीमा पर, कोई गट्टर की सफाई करते हुए, उनका तो सर्वोच्च बलिदान होता है। इस देश ने स्वतन्त्रता के लिए लड़ी लड़ाई के दौरान भी देखा, खुशी-2 फांसी पर चढ़ते, लड़कर अमर होते उन वीरों को।

यही क्या केजरीवाल साहब की तरह ही बहुत से लोगों ने सरकारी नौकरियां छोड़ दी यह स्वतन्त्रता के लिए हुए आंदोलन के दौरान उमेश सी बनर्जी से लेकर आज तक एक बहुत लम्बी लिस्ट है। लेकिन उनमें किसी ने भी देश पर एहसान नहीं जताया। चुपचाप जो उनसे हो सकता था/है, देश और समाज के लिए किया/कर रहे हैं…..। याद करें यहीं कहीं हमने चर्चा की थी, ‘हर मर्ज की दवा राजनीति नहीं है’। हो सकता है, यह एक महत्वपूर्ण दवा हो, लेकिन एकमात्र नहीं। आज देश को सामाजिक-आर्थिक दबाव समूहों की आवश्यकता अधिक है…..।

सम्भव है, दिल्ली वालों को बिजली-पानी सही मिल गया हो, लेकिन केजरीवाल और उसके साथियों ने देश और देश के आम जन को निराश ही किया है और वे उन्हें विश्वास योग्य नहीं लगे। बातें नए तरीके की राजनीति की करते रहे लेकिन हर वह तरीका अपनाते रहे जो कि दूसरी पार्टियां अपनाती आ रही थीं। केजरीवाल साहब को लगा कि देश के अंदर जो राजनैतिक माहौल बना है उसका लाभ वह तथा उसके सोशल मीडिया एक्सपर्ट उठा लेंगे, लेकिन ऐसा न हो सका। इस देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सच्चाइयों और समस्याओं को समझने के लिए सिर्फ आईआईटी से इंजीनियरिंग की डिग्री, सिविल सेवा उतीर्ण करना और सोशल मीडिया एक्सपर्ट होना ही काफी नहीं है।

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बात 10 अप्रेल, 2012 की है, ‘आप’ के कमांडर न. 2 यानि सिसोदिया जी हिमाचल प्रदेश के दौरे पर थे और कुल्लू में मेरे से मिलना चाहते थे लेकिन मैंने सविनय मना कर दिया। क्योंकि जो वे कह, कर रहे थे उसमें सच कम, झूठ और धोखेबाज़ी अधिक थी।

संघ सरकार द्वारा किये जा रहे व्यवहार की बात को नज़र अंदाज़ भी कर दिया जाये, आज उसी दिल्ली तथा देश की जनता ने भी उन्हें आईना दिखाना शुरू कर दिया है। यहां सवाल चुनावों में या राजनैतिक हार जीत का नहीं है। प्रश्न है एक उम्मीद और विश्वास का है, जो दिल्ली व देश की जनता ने उन पर किया था….? अब भी वे लोग दोष चाहे ‘इवीएम’ को दें या किसी और को और दोष प्रमाणित भी हो जाये। उन्हें इधर उधर की छोड़ कर ईमानदारी से आत्ममंथन करना चाहिए। यदि वे अपना और देश के अस्तित्व को बचाना चाहते हैं तो उन्हें अपने आप की, अपनी कथनी और करनी की समीक्षा करनी ही पड़ेगी।

यह भी सही है कि दिल्ली के जंतर मंतर पर उगी पार्टी को दिल्ली की जनता ने हाथों हाथ लिया था। उस जनता में पूरे देश के हर वर्ग, स्तर और तरह के लोग थे, बुद्धिजीवि, राजनेता, व्यवसायी, विद्यार्थी, नौकरशाह, रिक्शावाला, मजदूर और आम आदमी। लोगों को उनसे बहुत उम्मीदें थी। देश उनसे राजनैतिक विकल्प की अपेक्षा कर रहा था। लेकिन केजरीवाल साहब को लगा कि वे एक झटके में पूरा भारत और वह भी बिना बहुत कुछ गवाए, पा लेंगे। देश को पाने का सिर्फ एक मुद्दा ‘भ्रष्टाचार’ (वह भी सिर्फ मौद्रिक) और एक ही हथियार ‘लोकपाल’। केजरीवाल ने आज से दो हजार साल पहले देश पर आक्रमण करने वाले एलेक्जेंडर महान की कही बात- ‘यह देश बहुत विचित्र है’ को ध्यान में नहीं रखा, शायद।

2013 विधान सभा चुनावों से पहले दिल्ली में केजरीवाल साहब पोल पर चढ़ कर जिस तरह बिजली का कनेक्शन काटते/जोड़ते थे, लगता है आज वही बिजली उन्हें झटके दे रही है। पहले संसद फिर पंजाब, गोवा, एमसीडी दिल्ली, और कुछ दिन पहले पंजाब के नगरपालिका के चुनाव और इस प्रकार का सार्वजनिक निरादर तथा नज़र अंदाज़ कर दिये जाने की स्थिति। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को समझना होगा कि प्रतिष्ठा एवं सम्मान भीख व दान में नहीं मिलते, अर्जित करने पड़ते हैं।