लेकिन मैं मुर्दा नहीं हूं।
अदब से गर्दन झुकाये खड़ा हूं
लेकिन मैं मुर्दा नहीं हूं।
तुम्हारी खिलाई अफीम के
नशे में
सदियों से चुपचाप
बेसुध लेटा पड़ा हूं
लेकिन मैं मुर्दा नहीं हूं।
तुम्हारे दिखाये हुए
डर के डर में
जन्म-2 से बेबस
दुबका पड़ा हूं
लेकिन मैं मुर्दा नहीं हूं।
तुम्हारे लगाये गए
सामाजिक, आर्थिक
सांस्कृतिक, शैक्षिक
प्रतिबंधों के कारण
मूर्छित पड़ा हूं
लेकिन मैं मुर्दा नहीं हूं।
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Corona Effect: अपना कहने के लिए कुछ कम ही रहता है । ‘कोरोना’ के उत्पाद तालाबंदी ने मेरे लिए जीवन पर्यन्त स्मरण रखी जाने योग्य कई घटनाएं पैदा की हैं। इस कड़ी में एक घटना को सांझा करना चाहता हूं। मैं अपनी पत्नी के साथ आज जहां रहता हूं, यद्यपि हमें यहां आये हुये कुछ 10 साल से अधिक नहीं हुए हैं। जैसा कि बता चुका हूं कि मेरा जन्म लाहौल (Lahoul) के एक छोटे से गांव जहालमा में हुआ और मुझे पढ़ाई के लिए घर से बाहर आना पड़ा।
पहले स्कूली पढ़ाई के लिए ‘फ्री एजुकेशन हॉस्टल’ मनाली (Manali), कुल्लू (Kullu), जिसे पंजाब सरकार ने लाहौल-स्पिती (Lahoul-Spiti) के बच्चों के लिए शुरू किया था तथा उसी के द्वारा चलाया जाता था। क्योंकि उस ज़िले में एक तरफ जहां कठिन स्थलाकृति और अत्याधिक ठंडी जलवायु की समस्या थी, वहीं पर स्कूलों की भी कमी थी। इस क्षेत्र के हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में सम्मिलित हो जाने बाद उस हॉस्टल को कुछ समय तक हिमाचल सरकार (Himachal Government) ने चलाया। इसी स्कूल से 1970 में मैट्रिक पास की और कॉलेज की पढ़ाई के लिए नये खुले डिग्री कॉलेज कुल्लू में पीयूसी में दाखिला लिया। तब शिक्षा 10+2+3 के पैट्रन पर चलती थी।
आगे की पढ़ाई और फिर नौकरी, उसके बाद समाज कार्य, जीवित रहने का ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’, सब मिला कर कोई 44 साल तक किराये के मकानों में ही रहता रहा/रहे। सच कहूं तो इस पूरे जीवन में अपने लिए कुछ अधिक कर भी नहीं पाया। या यह कहना अधिक सही ……