न, न मुझे अपना फोटो देकर अपनी नुमाइश भी नहीं करनी है और न ही अपने सोशल मीडिया के मित्रों के लाइक्स एकत्रित करने हैं और न ही मेरी शक्ल फोटोजनिक है। मेरा एक अन्य उद्देश्य है।
आप सबसे मेरा आग्रह है कृपा करके इस फोटो की हर चीज को ध्यान से देखें। आप को पता चलेगा इसमें जितनी भी वस्तुएं, जीवित निर्जीव, खाने-पीने की वस्तुएं, मेरे पहने हुए कपडों में न तो ट्रम्प साहब का, न मोदी जी का, न उनके बड़े-2 सलाहकारों और विशेषज्ञों का कोई योगदान है।
पहरावे में कोट लाहौल के अपने घर की भेड़ों की ऊन, उसे काता है मेरी पत्नी ने, जिसे बुनकर पट्टी की शक्ल दी है, मेरा स्व. मित्र निक्कू जिन का काम बुनना था, शालें, पट्टियां आदि-2। तत्पश्चात पट्टी की मंडाई की है मेरे मित्र रामलाल ने किरतिंग (लाहौल) में और अन्त में सिलाकर कोट की शक्ल दी है फिर एक मित्र शेर सिंह ने, जो सिलाई का काम करते हैं। टोपी मुझे मेरे किन्नौर के अनुसूचित जनजातीय दलित साथियों ने भेंट की है, जो हर स्तर पर उनका अपना उत्पादन है। टोपी और कोट पर टंगे फूल नुमा टेग फिर अपने घर में बनाए गए हैं।
तो बताइये इन विकासवादियों की आर्थिक, तकनीकी विकास का मेरे जीवन में कितना बड़ा योगदान है? सामने रखे ‘सोल्तक’ (छोटी मेज) बनी है यहीं कुल्लू में शोभला फर्नीचर हाऊस में, लकड़ी स्थानीय है। उस पर सजाई गई खाने-पीने की वस्तुएं भी कुछ आटे की बनी हैं, कुछ चावल की, जिन्हें फिर मेरे देश के साथियों ने पैदा किया है। भले ही उसे पैदा करने के बाद उन में से कुछ ने आत्महत्या कर ली हो…। जिस बिछौने पर मैं बैठा हूं, उसे भी बड़े एडवांस तकनीकी कारखानों में नहीं बनाया गया है। उसमें से कुछ मेरे स्थानीय उत्पाद हैं तो कुछ मेरे उत्तर प्रदेश, बिहार तक हरियाणा के गरीब बुनकरों द्वारा उत्पादित हैं।
कुल मिलाकर कोई भी ऐसी वस्तु नहीं जिसके लिए मुझे एडवांस तकनीक या लाखों करोड़ के निवेश वाले कारखानों पर निर्भर रहना पड़ता है। भले ही कुछ अभिजातीय लोगों के लिए इस प्रकार की मजबूरियां रहती हों। मुझे लगता है, मुझे यह सवाल करने का हक है कि वर्तमान विकास का मॉडल जिसके नाम पर सबको ठगाया, हड़काया जा रहा है, उसका मेरे संदर्भ में क्या औचित्य है।
विकास अंग्रेजी के दो ‘जी’ के चारों तरफ घूमता हुआ दिखता है। जैसे सूर्य के चारों तरफ धरती घूमती है। एक ‘जी’ है संचार क्षेत्र का जिसके अभी तक चार जेनरेशन आ चुके हैं। भारत में चौथी जेनरेशन या ‘4 जी’ का सबसे बड़ा ठेकेदार बना है मुकेश अंबानी और जो पूरे देश को मुफ्त संचार की सुविधा उपलब्ध करवा रहा है ‘जियो’, जिसे हम जी रहे हैं, ‘कुत्ते को हड्डी की तर्ज़ पर’। जिसके दम पर आज मुकेश अंबानी ‘द इंडियन एक्स्प्रेस’ द्वारा जारी की गई 2017 के सबसे शक्तिशाली 100 व्यक्तियों की सूची मेँ 7वें स्थान पर पहुंचे हैं।
लेकिन मेरे जीवन में ‘जियो’ की कोई दखल नहीं है। ‘जियो’ अंबानी के लिए वरदान है, साथ में कई अन्यों के लिए भी हो सकता है…? इस प्रकार इस 1जी, 2जी, 3जी, 4जी से क्या होगा? इस देश की 132 करोड़ जनता के लिए कई दर्जन ‘जी’ की आवश्यकता पड़ सकती है। तब जाकर उनके जीवन पर कोई असर पड़ सकता है।
अब तो वे सब ‘जी’ उन्हीं कुछ लोगों के अंदर घूम-2 कर प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। दूसरा ‘जी’ है जीडीपी का ‘जी’ पूरा देश, विशेषकर हमारी सरकारें, सरकार के मंत्री, बड़े बाबू, सरकारों के भक्त, अर्थशास्त्रियों का एक पूरा कुनबा ढोल पीट-2 कर प्रचार-प्रसार करते हैं कि ‘जीडीपी’ बढ़ ही रहा है, लेकिन मेरे जीवन में उसका असर क्यों नहीं दिखता। उस जीडीपी के बढ़ने के बीच में किसानों की आत्महत्या नहीं रुकी, बेरोजगारों की संख्या में कभी नहीं आई, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति नहीं सुधरी, गरीबी रेखा के नीचे वाले लोगों के जीवन में कोई अन्तर नहीं पड़ा।
बस अब उस गरीबी रेखा के निर्धारण में पैमाना बदल दिया गया है। अब ‘कैलोरी’ की बात होती है, जो अभी तक ठीक से मेरी समझ में भी नहीं आ पाई है। इसे समझने के लिए एक ‘न्यूट्रिशियन’ के दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है। हां! जीडीपी के बढ़ने का असर अवश्य दिखता है, देश में बढ़ती अरब-खरबपतियों की संख्या से। देश में बढ़ती सम्पति, आय के आसमान बंटवारे से। इधर शिक्षा के क्षेत्र में मूलचूक परिवर्तन किया गया है।
उच्च शिक्षा या विश्वविद्यालय की शिक्षा विशिष्टों के लिए अघोषित आरक्षित कर दी गई है और जनसाधारण के लिए ‘कौशल विकास’। कौशल विकास के प्रदान करने के कारखाने, गलियों, मुहल्लों में खुल गए हैं। गरीब के बच्चों से लाखों लूट कर नाम का इंजीनियर और निजी संस्थानों में दो-चार हज़ार की नौकरी और वह भी मालिक के तीन शब्दों एक वाक्य पर ‘यू आर फायर्ड’ पर टिकी हुई जैसे ‘तीन तलाक’।
दूसरा कारण इस फोटो को देने का यह है कि आज कल देश में देशभक्ति, देशप्रेम और संस्कृति सीखने के भी प्रयास ज़ोरों पर हैं। इसलिए इस फोटो और इस त्यौहार ‘कुन्स’ को मनाने की भूमिका और इतिहास को भी मैं जानता हूं और इसके साथ जुड़ी भावनाओं का भी सम्मान करता हूं। ‘कुन्स’ लाहौल के पट्टन क्षेत्र के तांदी से तिन्दी गांव तक के क्षेत्र के अतिरिक्त चन्द्रा नदी के वाम तट के गांव यंगला, मूलिङ, बरगुल, शिप्टिंग में मनाया जाता है। यहां एक और बात बता दूं कि लाहौल का समाज दो अलग-2 सांस्कृतिक भूमिकाओं वाले समाजों के मिलन से बना हुआ है।
यहां मैं बात करना चाहता हूं, मैं जिस समुदाय से हूं उसमें ‘कुन्स’ क्यों मनाया जाता है। सबसे पहले तो बता दूं कि लाहौल के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि हर कार्य ‘लुनार केलेंडर’ पर आधारित है। मेरे समुदाय के अंदर इस ‘कुन्स’ के निर्धारण के लिए चाँद की दशा ही आधार है। लोहड़ी (आमतौर पर 13 जनवरी हर वर्ष) के दूसरे दिन यानि 14 जनवरी को मेरे लोग नए वर्ष (संक्रान्ति) के रूप में मनाते हैं।
उस नए साल की पहले पूर्णमासी के दिन हम ‘द्याई’ (दीवाली के समतुल्य) मनाते हैं। उसके बाद की पहली अमावस्या के दिन को लेकर ‘कुन्स’ का त्यौहार तय होता है। यानि अमावस्या के दिन कुन्स की पूर्व संध्या जिसे मेरी भाषा में ‘कुन्सेर ब्यालि’ कहते हैं। उस दिन की तैयारी के लिए घर की साफ-सफाई तथा कुछ खाने-पीने की वस्तुएं बनाई/पकाई जाती हैं। ‘कुन्स’ की पूर्व संध्या पर शाम होते-2 घर के उस कमरे में जिसमें परिवार रहता है, की उत्तरी दीवार पर काले रंग (भूमिका) पर सफ़ेद मिट्टी से ‘बराज़ा’ बनाया जाता है, जो एक विशेष प्रकार की पेंटिंग होती है।
चौकोर आकार में एक दूसरी को काटती रेखाओं के चारों कौनों तथा मध्य में बाहर की तरफ अर्ध गोल किनारे बनाए जाते हैं। जिनका अपना अर्थ होता है। यह सब उससे ‘द्याई’ के दिन बनाए गए ‘स्वातिक’ के चिन्ह के निकट ही नीचे बनाया जाता है। ‘बराज़ा’ के अंदर एक घोड़े और घुड़सवार की आकृति बनाई जाती है जिसका मुंह सदा पूर्व की तरफ रहता है। ‘बराज़ा’ के ठीक नीचे कमरे के फर्श पर एक अन्य आकृति (पेंटिंग) बनाई जाती है, जिसके बीच में भिन्न प्रकार के पशुओं की आकृतियां जो कि आटे की बनी होती हैं और तेल में तल कर बनाई गई होती, रखी जाती हैं।
‘बराज़ा’ और नीचे की आकृतियों के ऊपर एक तिकोना ढांचा बनाया जाता है। जो कि देवदार (शूर) की लकड़ी के महीन चीर कर बनाई गठल का होता है। जिसे अन्य अवसरों पर मशाल के रूप में काम में लाया जाता है। अब उस त्रिकोण आकृति को सफ़ेद कपड़े से ढक दिया जाता है, जैसे किसी मृत शरीर को ढका जाता है। इस प्रक्रिया को कहते हैं ‘चोक ठहरब•’। उस ‘चोक’ के बीच एक दीया जला कर रखा जाता है। ध्यान रखा जाता है कि दीया जला रहे कम से कम दूसरी संध्या तक यानि 24 घंटे।
इसके अतिरिक्त उस मुर्दानुमा ‘चोक’ को दूसरी शाम तक अकेला भी नहीं छोड़ा जाता यानि किसी न किसी को उसकी पहरेदारी करनी होती है। ‘कुन्स’ को राजा ‘बरदानों’ के अंतिम क्रियाकर्म के रूप में ही मनाया जाता है। अब यह राजा ‘बरदानों’ कौन है। कुछ लोग इसे राजा ‘बली’ कुछ इसे राजा ‘दानो’ के रूप में पहचानने का प्रयास करते हैं।
इस पर एक शोध हो सकता है और वह तभी सम्भव हो सकता है यदि इस देश को सांस्कृतिक दिशा-निर्देश दिये जाने बंद हों। यह सब इसलिए लिख रहा हूं कि आज देश में जो पूरे देश को एक रंग में रंगने का प्रयास चल रहा है। इतिहास को अपनी सुविधा और पसंद का दिखने, देश का ‘मीनू’ तय करने, एक संस्कृति- एक भाषा एक राष्ट्र पर अतिरिक्त उत्साह से कार्य किया जा रहा है।
देशभक्ति और देशद्रोह की नई परिभाषाएं देने, संवैधानिक स्वतंत्रताओं के अतिक्रमण, हर गोष्टी, सेमिनार यहां तक कि विश्वविद्यालय के हर विषय के लेक्चर भी तय किए जाने पर ज़ोर चल रहा है। मैं इस लेख से यह भी बताना चाहता हूं कि समाज के अंदर इतनी शक्ति सदा से रही है और रहेगी कि उसे क्या करना है? देश को सांस्कृतिक दिशा-निर्देशन की आवश्यकता नहीं है। कम से कम मेरे क्षेत्र को तो कतई नहीं कि दिल्ली से आकर संस्कृति के पाठ पढ़ाये जायें।