कुछ दिन पहले देश की थल सेना प्रमुख जनरल रावत ने जम्मू-कश्मीर के स्कूलों के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा था कि वहां के स्कूलों में दो-2 नक्शे, एक भारत का तथा दूसरा जम्मू-कश्मीर राज्य का लगाए देखे जा सकते हैं (यद्यपि बयान सुस्वादू नहीं था)। यह भी सही है कि उनके कहने का संदर्भ कुछ और था। लेकिन इसी तरह की बात कुछ दिनों बाद देश की शिक्षा के स्तर पर हुए एक सर्वेक्षण में सामने आई। प्रथम नामक एक गैर सरकारी संस्था द्वारा किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट ‘असर’ (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट) 16 जनवरी, 2018 को जारी की गई। जिसमें एक निष्कर्ष यह भी निकाला गया है कि गांव के स्कूलों में 14 से 18 वर्ष की आयु के बच्चों के हाथ में मोबाइल भले ही हों और उनके नाम के बैंकों में खाते खुले हों, लेकिन उनमें 40% यानि 10 में से सिर्फ 4 बच्चे हो देश के नक्शे में अपने राज्य की पहचान कर सकते हैं।
जो जनरल रावत के कहे को किसी अन्य दृष्टि से देखने के लिए मजबूर करता है। इसके अतिरिक्त भी जनरल रावत के बयान को कुछ ने शिक्षा क्षेत्र में अनावश्यक दखल बताया है तो वहीं परकुछ ने इसे मूल्य आधारित शिक्षा के साथ जोड़ा कर देखने का प्रयास किया है। यह भी ठीक है कि मूल्य आधारित शिक्षा का मतलब अलग-2 लोगों के लिए अलग-2 हो सकता है। लेकिन देश के राष्ट्रीय नक्शे और राज्य के नक्शे को अलग-2, बनाना, दिखाना, पढ़ाने का मतलब वही नहीं हो सकता, जो एक वर्ग मनवाना चाहता है। यहां एक अन्य बात यह भी देखने को मिली है कि देश के हर राज्य में देश और प्रदेश का भौगोलिक नक्शा अलग-2 दिखाया जाता है ताकि उस समूह के छात्र अच्छे से अपने राज्य और देश की भौगोलिकता एवं सीमाओं को समझ सकें।
‘असर’ की इस रिपोर्ट में बहुत महत्वपूर्ण आंकड़े दिये गए हैं जिनकी सहायता से बहुत महत्वपूर्ण व बड़े निष्कर्ष निकले जा सकते हैं। इसमें कहा गया है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2010 के लागू होने से पहले असर (एएसईआर) की पहली रिपोर्ट 2005-06 तथा मानव संसाधन मंत्रालय के हाउस होल्ड सर्वे के अनुसार स्कूल में भर्ती (एनरोलमेंट) 90% था। पिछले 10 वर्षों में यह बढ़ कर 95% हो गया है।
सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2005-06 में 1.1 करोड़ बच्चे आठवीं कक्षा में दाखिल हुए थे, 10 वर्ष बाद यह आंकड़ा बढ़ कर दोगुना हो गया। 2014-15 में 8वीं कक्षा में 2.2 करोड़ बच्चे भर्ती हुए थे।
इस रिपोर्ट यह भी कहा गया है कि 14 से 18 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों में 73% मोबाइल फोन धारक हैं और उस पर अच्छे से चेटिंग कर सकते हैं। जबकि उनमें सिर्फ 58% ऐसे हैं जो अखबार पढ़ते हैं। यहां भी लड़कों में 12% तथा लड़कियों में 22% ऐसे हैं जिन्होंने अभी तक फोन प्रयोग नहीं किया है।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस 14 से 18 वर्ष आयु वर्ग के 60% बच्चे 12वीं कक्षा से आगे पढ़ना चाहते थे। जिनमें 17.6% लड़के ‘सेना या पुलिस’ में भर्ती होना चाहते थे जबकि 25% लड़कियां अध्यापन कार्य करना चाहती थीं।
इस रिपोर्ट में कुछ निराश करने वाले तथ्य भी सामने रखे हैं। इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि बहुत से दावों के बावजूद शिक्षा की गुणवता स्तर में गिरावट आई है। 8वीं कक्षा के समस्त विद्यार्थियों में 25% के करीब बच्चे कठिनाई से साधारण पाठ पढ़ पाते हैं और आधे से अधिक अंक गणित के मूल क्रियाओं जैसे भाग करने के प्रश्नों को हल करने असमर्थ थे। ‘असर’ के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि समय के साथ-2 शिक्षा स्तर में तुलनात्मक गिरावट आई है। यानि कि आज के 8वीं के छात्र अपने से पहले के उसी कक्षा के छात्रों से पिछड़ी दशा में हैं।
‘असर’ के उपरोक्त निष्कर्षों का, लंबे समय से आंध्र प्रदेश में इस क्षेत्र में कार्यरत यंग लाईवस स्टडी ने भी समर्थन किया है। उसके अनुसार 2006 में 12 साल की आयु के बच्चे 2013 के उसी आयु के बच्चे से उन्हीं प्रश्नों के उत्तर अच्छे से देते थे।
शिक्षा के गिरते स्तर पर देश की राज्य सरकारें भी चिंतित हैं और वे भी अपने-2 राज्यों में अपने स्तर पर ऐसे अध्ययन करवा रहे हैं। इस कड़ी में हाल में पंजाब में राज्य शिक्षा विभाग द्वारा ‘पढ़ो पंजाब, पढ़ाओ पंजाब’ परियोजना के अंतर्गत अध्ययन करवाया गया। जिसका निष्कर्ष भी चिंता जनक ही है। इस अध्ययन के लिए राज्य के समस्त सरकारी स्कूलों के 6टी से 8वीं कक्षा तक के 6.07 लाख छात्रों को चुना गया। इस अध्ययन में पता चला कि छटी कक्षा के 13% बच्चे अंग्रेज़ी वर्णों को पहचानने में असफल हुए। यहां तक कि इन 6.07 लाख छात्रों में से 69% यह नहीं बता पाये कि ‘भारत का राष्ट्रपति कौन है?’ और तीन अंकों की संख्या को एक अंक की संख्या से भाग देने में 75% बच्चे फेल हो गए।
देश की शिक्षा के स्तर का इस हद तक गिरने के कई कारण हैं। शिक्षा के स्तर के गिरने का सबसे पहला और बड़ा कारण तो इसका संवैधानिक स्टेटस भी है। संविधान में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को राज्य के विषयों में रखा गया है। जिसका सीधा सा अर्थ यह होता है कि शिक्षा की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की है और केंद्र को उससे कुछ भी लेना-देना नहीं है। जिसके परिणामस्वरूप शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय की अत्यंत उपेक्षा हुई।
इसके अतिरिक्त कारण है शिक्षा एवं शिक्षा पद्वति में प्रयोगोन का किया जाना। जिसमें शिक्षा का वैश्वीकरण भी शामिल है। शिक्षा के वैश्वीकरण के निर्णय के अनुसार मिडिल स्तर तक फेल न करने व अगली कक्षा में प्रोन्नत करने की नीति के कारण भी सरकारी स्कूलों के बच्चों का पढ़ाई का स्तर गिरता गया। एक तरफ तो विद्यार्थियों को परीक्षा की चिंता से मुक्ति मिल गई। दूसरी ओर शिक्षकों ने भी मौजें करनी शुरू कर दी क्योंकि उन्हें कोई प्रगति रिपोर्ट नहीं देनी होती थी। शिक्षकों ने अपने बच्चे निजी स्कूलों में डाल दिये और स्वयं बिना किसी जिम्मेदारी के स्कूलों से वेतन भत्ते पाते रहे।
पता चला है कि देश शिक्षा के क्षेत्र में अब एक और प्रयोग करने की तैयारी कर रहा है। दावा किया जा रहा है कि 2018 देश की शिक्षा के लिए एतिहासिक वर्ष होगा। कस्तूरीरंजन समिति नई शिक्षा नीति की घोषणा करेगी। जिसमें इसके सिद्धान्त, नीतियों और विशेष कार्यक्रम व दिशा निर्देश शामिल होंगे जो कि देश में शिक्षा वितरण का मार्ग दर्शन करेंगे। यह सब फिर एक नये नाम ‘नेशनल एचीवमेंट सर्वे’ (एनएएस) के अधीन किया जायेगा। जो फिर ‘ग्रेड-लेवल लर्निंग’ का ध्यान रखेगा।
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आज तो दशा यह है कि शिक्षा विशेषकर उच्च शिक्षा का क्षेत्र निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिया गया जिसका परिणाम यह निकला कि हर गली में शिक्षा की दुकानें खुल गई जिनको सरकार का संरक्षण प्राप्त है। शिक्षा के निजी होने के कुछ परिणाम ऐसे भी निकले जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है। इस विषय में एक प्रकरण याद आता है वह आप से सांझा करना चाहता हूं। बात 2014 की है, मेरे एक मित्र ने एक लड़के को मेरा नाम पता देकर भेजा था और मुझे फोन पर बता भी दिया था। उस लड़के को भर्ती होना था आईटीबीपी में। अब क्योंकि मैं आईटीबीपी के भर्ती केंद्र के समीप ही रहता हूं, इसलिए उस लड़के के रहने की व्यवस्था अपने पास ही की। भर्ती के पहले चरण पर फिजिकल टेस्ट होते हैं दौड़, छलांग आदि। भर्ती के दिन सुबह तैयार होकर लड़का चला गया और मैं भी निकल गया। शाम को वापस आया तो देखा लड़का मुंह लटकाए हुए बैठा हुआ था। पूछने पर पता चला कि उसे भर्ती की प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था। कारण था वह फिजिकल टेस्ट पास नहीं कर पाया था। उस टेस्ट में चार कि.मी. की दौड़ पूरी करनी थी। हैरानी हुई एक 20 साल का युवा चार कि.मी. की दौड़ को पूरा नहीं कर पाया। पूछने पर पता चला कि वह एक प्राइवेट स्कूल में और कॉलेज में पढ़ा था, जहां पर वह 3000 रुपये प्रति माह फीस के रूप में देता था। लेकिन उस संस्थान में शारीरिक अभ्यास यानि खेलकूद के क्रिया कलापों की कोई व्यवस्था नहीं थी। हालांकि उस युवा ने बीएससी 82% अंकों के साथ पास की थी। आज स्कूलों और अन्य शिक्षा संस्थानों में जहां एक ओर शिक्षा के स्तर में गिरावट आ रही है, वहीं पर फिजिकल फिटनेस पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। अच्छी और अङ्ग्रेज़ी शिक्षा के नाम पर खोली गई ये दुकानें, कम से कम शारीरिक रूप से कमजोर व अक्षम युवाओं को पैदा कर रहे हैं।
