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पर्यावरण औपचारिकता नहीं, जीवन की अनिवार्यता है

पर्यावरण एक चिन्तनीय विषय है, औपचारिकता नहीं। पर्यावरण कोई बाज़ारी वस्तु नहीं, जीवन की अनिवार्यता है। आज के व्यवसायी युग में हर वस्तु की तरह पर्यावरण को भी खरीदी-बेची जाने वाली वस्तु मान कर चलने का चलन चला हुआ है।

विकसित एवं समृद्ध देश, दौलत के नशे में चूर धनवान और धन-कुबेरों में अपने को शामिल करने की उत्कंठ इच्छा रखने वाले लोग पर्यावरण को खरीदने-बेचने की मंडियां लगाने का प्रयास करते हुए दिख जाते हैं। उनको लगता है कि एक स्वच्छ वातावरण और पर्यावरण को कागज के नोटों से खरीदा जा सकता है।

उनकी इस रोगग्रस्त सोच का लाभ उठाने के लिए समाज के अन्दर एक अन्य रुगण मानसिकता वाला वर्ग भी पैदा हो गया है, जो धन के बदले स्वच्छ वातावरण तथा पर्यावरण की गारंटी देता है। पर्यावरण को एक फैशन के रूप में लिए जाने का फैशन भी बढ़ा है। सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाएं पर्यावरण रक्षा के नाम पर स्कूली बच्चों को उल्टी ‘पी-केप’ पहना कर चारकोल की सड़कों पर परेड करवाकर अपना कार्य पूरा समझती हैं।

वृक्षारोपण के नाम पर कुछ डंडे गाड़ दिये जाते हैं कहीं तो कहीं स्वच्छता अभियान के नाम कुछ भाषण झाड़ दिये जाते हैं। इधर कुछ समय से इस देश की वनीकरण नीति का एक रोगग्रस्त नमूना सामने आया है। सरकारी अफसरशाही और बाबू छाप वनीकरण, डंडा गाड़ कार्यक्रम से अधिक कुछ नहीं है। वनीकरण के नाम पर नुकीली पट्टियों के पेड़ लगाए गए जो पूरी पारिस्थितिकी के लिए लाभप्रद होने के बजाय हानिकारक साबित हुआ है। कुछ जगहों पर डंडे गाड़ कर वनीकरण कार्यक्रम को बहुत सफल दिखाया गया। क्या यह सोच ठीक थी? नहीं हमारे प्रशासकों और इस कार्यक्रम को लागू करने वालों ने वनीकरण को ठीक से समझा ही नहीं।

वनीकरण तीन स्तरों पर वनस्पति उगाने पर पूर्ण माना जाता है। पहले स्तर पर घास, दूसरे स्तर पर झाड़ियां और तीसरे स्तर पर चौड़ी पत्तियों के पेड़। इस प्रकार के वनो से चारा, ईंधन और इमारती लकड़ी भी मिलती है, भूमि का कटाव रुकता है और पारिस्थितिकीय संतुलन भी बनता है और स्वच्छ वातावरण व स्वस्थ पर्यावरण भी नसीब होता है। हमें आज किस हद तक स्तही जीवन जीने को बाध्य किया जा रहा है, इस बात का अनुभव तब हुआ जब अभी गत वर्ष मुझे अपने पैतृक गांव जाने का अवसर मिला। वहां की दशा बता रहा हूं।

लाहौल मध्य हिमालय में पड़ने वाला एक गांव समुद्र तल से जिसकी ऊंचाई लगभग 9000 फुट है। जैसे कि लाहौल का लगभग हर गांव किसी न किसी पानी के नाले से जुड़ा हुआ है। मेरा गांव भी एक नाले से जुड़ा हुआ है। गांव कि जल आपूर्ति काफी दूर से पाइप द्वारा कि गई है। सड़क पर जमीन की सतह पर तीन-चार पाइप बिछे हुए दिखाई देते हैं। यानि तीन-चार बार पाईपें बिछाई गई थी, वह तो जमीन के ऊपर, जमीन के नीचे कितनी बार पाईप लाईन बिछाई गई थी यह तो वही जाने। इतना होने के बावजूद पानी यदा कदा बंद हो जाता है। जबकि आज से 20-25 साल पहले तक उस नाले के दोनों तरफ रहने वाले 10-15 गांवों को पीने व अन्य जरूरतों के लिए पानी वही नाला देता था।

आज के पीने के पानी की अवधारणा यह है कि जब तक पानी पाईप में से नहीं गुजरता पीने योग्य नहीं हो सकता; जबकि उस प्राकृतिक स्वच्छ जल स्रोत को कूड़ा करकट डालने तथा शौच के स्थान के रूप में बदल दिया गया है। आज हिमालय क्षेत्र के गांव में पीने का पानी उसी का मानने को मजबूर किया जा रहा है जो पाइपों के द्वारा आता है। जबकि मेरा गांव सीधे ग्लेशियर से निकला पानी पिया करता था।

पर्यावरण एक चिन्तनीय विषय है न कि एक औपचारिकता मात्र। इसलिए उसे उसी तरह से देखना, सोचना और कार्यान्वित करना होगा। पर्यावरण को पहुंचाई गई क्षति के कारणो को भी ढूंढना होगा और उसके लिए जिम्मेदारियां भी तय करनी पड़ेंगी। अब कुछ साधारण निष्कर्ष निकाल कर इति करने से काम नहीं चलेगा। इस विषय में यह कह देना फैशन सा हो गया है कि पर्यावरण बिगड़ने का कारण जनसंख्या वृद्धि ही है। इसके पीछे यह एक कारण हो सकता है, सिर्फ और सिर्फ यही कारण नहीं।

किसी महापुरुष ने सही कहा है कि प्रकृति के पास हर व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति का सामर्थ्य है, लेकिन एक भी व्यक्ति के लालच को पूरा करने का सामर्थ्य नहीं है। एक गरीब आदमी का पूरा जीवन पेट भरने की कशमकश में कट जाता है। वह क्या वन कटेगा तो क्या पर्यावरण को हानि पहुंचायेगा? लेकिन एक विकसित व्यक्ति और देश की दौलत की हवस समस्त प्राकृतिक-परिवेश को ध्वस्त कर सकती है।

 

ल.च.ढिस्सा

(पर्यावरणविद व समाजसेवक )

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