अच्छी बात है कि पेट्रोलियम मंत्रालय पंजाब में हुसैनीवाला बार्डर के उस पवित्र स्थान पर राजधानी दिल्ली में इंडियागेट की लगातार प्रज्ज्वलित रहने वाली ‘अमर जवान ज्योति’ की तर्ज पर ‘अमर ज्योति’ प्रज्ज्वलित कर रहा है, जहां गोरे हुक्मरानों ने 23 मार्च, 1931 को शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु के पार्थिव शरीरों को बेहद अपमानपूर्वक जलाने की कोशिश की थी. हम जानते हैं कि जनाक्रोश भड़कने के डर से लाहौर सेन्ट्रल जेल में इन तीनों को फांसी की निश्चित तारीख 24 मार्च से एक दिन पहले ही सारे नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए शहीद कर दिया गया था.
लेकिन ऐसी किसी ज्योति से उनकी शहादतों के सम्मान की प्रतीकात्मक रक्षा ही सम्भव है और सच्ची श्रद्धांजलि उनको अभीष्ट इन्कलाब का रास्ता हमवार करके ही दी जा सकती है, जो अभी भी इस देश पर उधार है और जिसका जिम्मा लेने या सूद चुकाने को वे भी तैयार नहीं दिखायी देते जो उनके अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने के नारे लगाते नहीं थकते. तभी तो वे जिस इन्कलाब के जिन्दाबाद के नारे लगाया करते थे, वह अभी भी उस साम्राज्यवाद के डैनों में़ फंसा फड़फड़ाने को अभिशप्त है, जो इतना शातिर है कि इन शहीदों द्वारा की गयी अपने नाश की सारी कामनाओं को चकमा देकर अपनी हार को जीत में बदलता और नये-नये रूप धारणकर हमें सताता आ रहा है.
प्रसंगवश, ये तीनों ही शहीद 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग में हुए भयावह नरसंहार से विचलित और गोरों के प्रतिरोध के अहिंसक या गांधीवादी तरीकों से निराश होकर क्रांतिकारी बने थे. 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन में पंजाबकेसरी लाल लाजपतराय गोरी पुलिस की लाठियों से घायल हुए और मर्मान्तक तकलीफें झेलकर 17 नवम्बर, 1928 को उन्होंने अंतिम सांस ली, तो इन तीनों ने ठीक एक महीने बाद 17 दिसम्बर को उक्त लाठीचार्ज के जिम्मेदार अंगे्रज अधिकारी जाॅन पी. सांडर्स को योजनाबद्ध ढंग से गोलियों से भून डाला.
ऐसा करके उन्होंने जताया कि काकोरी कांड के नायकों की शहादतों के बावजूद देश के नौजवानों का खून ठंडा नहीं पड़ा है. बाद में आठ अप्रैल, 1929 को भगत सिंह ने बटुकेश्वरदत्त के साथ दिल्ली में केन्द्रीय असेम्बली में बम और परचे फेंके तो उनका उद्देश्य था-दो अत्यधिक दमनकारी कानूनों के विरोध की देश की आवाज को बहरी सरकार के कानों तक पहुंचाना. इस उद्देश्य की पूर्ति के बाद वे भागे नहीं, वहीं खुद को गिरफ्तार करा लिया और अपने खिलाफ चली समूची अदालती कार्रवाई को अपनी अनूठी क्रांतिकारी चेतना और विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल किया.
28 सितम्बर, 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के एक गांव में, जो अब पाकिस्तान में है, भगत सिंह का जन्म हुआ तो उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों के सिलसिले में जेलों में थे. तीनों को उसी दिन रिहाई मिली तो माना गया कि नवजात शिशु अच्छा भाग्य लेकर आया है. उसका नाम भगत रखा गया, पंजाबी में जिसका अर्थ भी है-भाग्यशाली. माता विद्यावती उसको प्यार से भगता बुलाती थीं-भगता यानी भागों वाला. लेकिन बाद में अनीश्वरवादी भगत सिंह को न भाग्य में और न ही भगवान में भरोसा रह गया.
1925-26 में उन्होंने बलवंत सिंह नाम से अपने क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत की और जल्दी ही उसके कई आयाम विकसित कर लिये. क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के प्रयत्नों के क्रम में लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन पर ले जाये जा रहे सरकारी खजाने की लूट के ऐतिहासिक कांड में मृत्युदंड प्राप्त रामप्रसाद बिस्मिल को छुड़ाने की जद्दोजहद में असफलता के बावजूद वे निराश नहीं हुए और हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के { जो बाद में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन में बदल गया} ‘पीले परचे’ यानी संविधान में एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प दोहराया, जिसमें एक मनुष्य द्वारा दूसरे का शोषण संभव न हो. अपने दो साल के जेल जीवन का तो उन्होंने पढ़ने और लिखने में ऐसा सदुपयोग किया कि कई लोग उन्हें भारत का लेनिन कहने लगे. कहते हैं कि शहादत के लिए ले जाये जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. कम ही लोग जानते हैं कि उन्हें दिल्ली से मियांवाली सेंट्रल जेल स्थानांतरित किया गया तो उन्होंने वहां कैदियों से भेदभाव के खात्मे और उनके अधिकार उन्हें दिलाने के लिए लम्बी भूख हड़ताल की थी.
अफसोस कि देेश का सत्तातंत्र अब तक इन तीनों की शहादतों का सिला उनके अरमानों से मंुह मोड़कर और उनके परिजनों से कृतघ्नता बरत कर देता रहा है. भगत सिंह की शहादत के बाद उनकी माता विद्यावती को दी गयी ‘पंजाब माता’ की उपाधि भी एक तरह से उनकी और शहीद-ए-आजम कहे जाने वाले उनके बेटे की शहादत दोनों की अवमानना ही थी. पंजाबी के लोकप्रिय कवि संतराम ‘उदासी’ ने इसके विरोध में कविता रचकर सवाल भी उठाया था कि क्या भगत सिंह ने सिर्फ पंजाब के लिए जान दी थी? देश के लिए दी थी तो उनकी माता को ‘देश माता’ का खिताब क्यों नहीं?
सुखदेव की माता रल्ली देवी और पिता रामलाल को भी अपने बेटे की शहादत के बदले में कृतघ्नता ही ज्यादा मिली. अभी कुछ बरसों पहले तक पंजाब के लुधियाना जिले में पुराने किले के पास नौघरा इलाके में स्थित उनका पैतृक घर खंडहर बना हुआ था और कोई उसकी हालत देखकर शरमाने वाला नहीं था. गनीमत है कि अब एक ट्रस्ट उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उठा रहा है. महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ा गांव में जन्मे शिवराम हरि राजगुरु के गांव का नाम भले ही उनके नाम पर कर दिया गया है, उनकी माता पार्वती बाई और पिता हरिनारायण विस्मृति के गर्त में ही हैं.
यह कृतघ्नता क्रांतिकारी आन्दोलन के संगठक और सिद्धांतकार भगवतीचरण वोहरा तक भी जाती है, जिनकी बनायी योजना उनकी जान पर न आ बनती तो भमत सिंह, सुखदेव व राजगुरू फांसी की सजा पर अमल से पहले ही छुड़ा लिये जाते. योजना यह थी कि उक्त तीनों को लाहौर जेल से न्यायालय ले जाते समय अचानक पुलिस पर धावा बोलकर उन्हें छुड़ा लिया जाये. चूंकि उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच लाया ले जाया जाता था, इसलिए इस धावे के लिए अपेक्षाकृत बेहतर तकनीक वाले और ज्यादा शक्तिशाली बमों की आवश्यकता महसूस की गयी. वोहरा बम बनाने में सिद्धहस्त थे और लाहौर की कश्मीर बिल्डिंग के जिस किराये के कमरे का वे इसके लिए इस्तेमाल करते थे, उसमें उन्होंने ऐसे नये बम बना भी लिये थे. लेकिन कहीं बम ऐन मौके पर दगा न दे जायें, इस संदेह का निवारण करने के लिए चाहते थे कि एक बार उनका परीक्षण कर लिया जाये. इस परीक्षण के लिए उन्होंने रावी तट चुना और अपनी जान गंवा बैठे.
सवाल है कि इस कृतघ्नता के रहते उन्हें अभीष्ट इन्कलाब की राह कैसे हमवार होगी?
रिपोर्ट-कृष्ण प्रताप सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)