हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा संचालित हिमाचल पथ परिवहन निगम की एक बस के पीछे राज्य के मुख्यमंत्री के फोटो के साथ दिये गए विज्ञापन (संदेश) – ‘जन मंच को मिली ऐतिहासिक कामयाबी’ को देख/पढ़ कर 8.9.2019 को मेरे गांव जहालमा, लाहौल में हुए ‘जनमंच’ की याद आ गई। साथ में याद आया उस दिन का कार्यक्रम जिसे सांझा कर रहा हूं।

कार्यक्रम 11 बजे पूर्वाहन शुरू हुआ और अध्यक्षता स्थानीय विधायक व कृषिमंत्री ने की। वैसे तो इस कार्यक्रम का उदेश्य जनता की छोटी-2 समस्याओं का त्वरित समाधान होता है। लेकिन उसमें ऐसा कुछ नहीं हुआ।

जैसे आम होता है सामने मंच पर मंत्री जी और ज़िला प्रशासन के बड़े अधिकारी विराजमान थे, उनके दाईं ओर अन्य सहायक अफसर/कर्मचारी बाईं तरफ शासक पार्टी के पदाधिकारी। मंच के सामने मेरे जैसे जन साधारण, जिनके नाम पर यह सब कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा था। जितनी देर वहां बैठ सका, मैंने पाया कि समस्या के नाम पर 70% से अधिक मामले पीने के पानी से संबन्धित थे। अफसोस होता है आज़ादी के 72 साल बाद भी पीने का पानी एक मुख्य समस्या है वह भी उस क्षेत्र में जहां लगभग हर गांव का बहते ताजे पानी का अपना स्रोत नाले के रूप में विद्यमान है ….?

यहां एक बात बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि यद्यपि वहां, उस समय हर उस विभाग के स्टाल लगे हुए थे जिनका आम जन से सीधा संबंध रहता है। जैसे खाद्य आपूर्ति, स्वास्थ्य, समाज कल्याण विभाग आदि-2, स्टालों पर विभाग के कर्मचारी भी मौजूद थे। ताकि लोगों की छोटी-2 समस्याओं का त्वरित ऑन द स्पॉट समाधान किया जाए। दुर्भाग्य से मेरी पत्नी की भी एक समस्या थी, राशन कार्ड की। उनके राशन कार्ड में छोटी बेटी का नाम भी शामिल था। अब बेटी का विवाह हो चुका था इसलिए वह उसका नाम कटवा कर सिर्फ अपना नाम रखना चाहती थी। बताया गया कि उनका काम हो जाएगा। हर प्रकार की औपचारिताएं पूरी करके समस्त दस्तबेजों सहित फार्म अधिकारी के हवाले किया, अधिकारियों ने बताया कि उनका ‘डिजिटल कार्ड’ एक सप्ताह में उन्हें घर में मिल जाएगा।

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लेकिन उस कार्ड को बनाने के लिए मुझे उसके बाद चार बार तो ज़िला मुख्यालय में विभाग के कार्यालय के चक्कर काटने पड़े तब कहीं वह कार्ड बन पाया, वह भी अस्थाई। उस पर मजे की बात यह कि नेट नहीं चलने के कारण डिपो वाले को सब काम मेन्यूयली करना पड़ता है। लेकिन रिपोर्ट जाती है सम्पूर्ण ज़िले के 100% डिजिटलीकृति की।

अफसर हर समस्या के लिए इस-उस बहाने से अपने को साफ बचाते गए और मंत्री महोदय आश्वासन देते गए। फिर, आधे घण्टे बाद नाश्ता परोसा गया ‘हलवा’ और चाय, सबसे पहले ‘सरकार’ को फिर आम जनता को। सबसे अधिक समय तो मंत्री महोदय और राजनैतिक महत्वाकांक्षी एक युवा के बीच बहस और एक दूसरे पर दोषारोपण में बीत गया।

तत्पश्चात खाना (लंच), सरकारी अमले को रेस्ट हाऊस में तथा जन साधारण को स्कूल के ग्राउन्ड में, अलग-2 …. जैसी इस देश की महान परम्परा है? यह तस्वीर काफी है यह बताने के लिए कि ‘जनमंच’ कितना कामयाब है…?

क्या न्यायपूर्ण व्यवस्था की जाती है? जनता के धन पर जनता के नाम के कार्यक्रम इस तरह पूर्ण किये जाते हैं ? मैं खाने में शामिल नहीं हुआ क्योंकि इस प्रकार की ‘छूआ-छूत’ वाली व्यवस्था को मैं सहन नहीं कर सकता। यद्यपि मंत्री महोदय ने बुलाने के लिए एक व्यक्ति को भेजा लेकिन मैंने यह कह कर वापस भेज दिया कि मुझे इस प्रकार का खाना हज़म नहीं होता।