मैं चाहता हूं।

यह ठीक है
कि, मैं
तुम से छोटा हूं
क्योंकि
तुम जौंक बन
मेरा
खून चूसते गए
और, मैं
चुपचाप, असहाय
अपना
खून चुसवाता गया
फिर
तुम, दिनों दिन
शक्तिशाली बनते गए
और, मैं
बेबस, बेचारा
दीन हीन बनता गया।
सदियों से
तुम
भेड़िया बन
गुरार्ते रहे
मुझे
डराते रहे
मैं
भेड़ बन
मियमियाता, मरमराता रहा
हरता रहा।
आज, मुझे
ज्ञात हो गया
कि
न तो तुम
भेड़िया जैसे
शक्तिशाली थे/हो
और
न ही, मैं
भेड़ सा
बेबस,
शक्तिहीन था/ हूं।
इसलिए,
मैं चाहता हूं
शेर की तरह
दहाड़ता हुआ
तुम्हारी, गर्दन पर
अपने, पैने-तीखे
ताकतवर दांत गाड़ दूं
और
तुम्हें, बिलबिलाते
कसमसाते, तड़पते हुए
तुम्हारी आँखों में
डर की भयानक छाया
देख, मैं खुश
होता रहूं
क्योंकि
मैंने
सदियों डरकर देखा है
और तुमने
सदियों डराकर।
तुम
ब्रह्मज्ञानी, विराट
महाशक्तिशाली
सेठ-साहूकार
ठेकेदार
महंत, व्यापारी
कृषक बन
इठलाते, गर्वित होते रहे
मुझे,
शूद्र, अछूत
दास बना
अनेकानेक
वर्जनाओं, आदेशों
धर्माज्ञाओं के अधीन
शोषित, दमित
मानवेतर, पशु से
बदतर
जीवन जीने को
मजबूर करते रहे।
अब, मैं
इस देश को
अपना, समझना चाहता हूं
इसके लिए –
अपनी,
मातृभूमि के प्रति
अपने, कर्तव्य
निभाना चाहता हूं,
कर्णधार बन
इसे सजाना-संवारना
चाहता हूं;
क्योंकि
सदियों से सदियों तक
विदेशी आक्रांताओं ने
इसे जीता ही
राज ही किया है
इसका मर्दन-
चीरहरण ही किया है
जिसके उत्तरदायी
तुम हो-
और सिर्फ तुम हो।

मैं चाहता हूं।

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