आखिर भाजपा ने देश के सर्वोच्च पद के चुनाव के लिए प्रत्याशी की घोषणा कर दी। जिस पर पूरा का पूरा विपक्ष बड़ी शान से कई दिनों से विचार-विमर्श, बातचीत, चर्चा कर रहा था। भाजपा ने सबको चकित करते हुए बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविन्द को एनडीए का प्रत्याशी घोषित करके अचेत पड़े विपक्ष पर एक और घातक प्रहार किया है। हर तरफ चर्चा है कि भाजपा का यह ‘मास्टर स्ट्रोक’ है। इससे विपक्ष जो कई दिनों से प्रत्यनशील था कि कोई ऐसा प्रत्याशी मिले जो कि उन सबको मंजूर हो। लेकिन राय जो थी वह आम बन ही नहीं रही थी। इस बीच मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने अग्निवाण चला दिया और तथाकथित विपक्ष का जो कि ‘हैंग ओवर’ में चल रहा था, अभी समझ ही नहीं पा रहा है कि यह क्या हो गया? इस बीमारी का उपचार क्या है और किसके पास इसका उपचार है?

भाजपा ने जो अपनी बाजी की तुरुप चल दी है अब विपक्ष का शह और मात से बचना असंभव लगता है। क्योंकि अभी तक तो विपक्ष यह भी तय नहीं कर पा रहा था कि क्या वह मुक़ाबले में किसी प्रत्याशी को खड़ा कर पाएगा या उसे समर्पण करना है? विगत समय की घटनाओं पर गौर करें तो मोदी-शाह की यह चाल अप्रत्याशित नहीं है। क्योंकि इस जोड़ी में अब बेहद आत्मविश्वास आ गया है। फिर वह चाहे विधान सभाओं के चुनाव के प्रत्याशियों का या फिर मुख्यमंत्रियों का चयन हो। हर बार इन लोगों ने बड़े नाटकीय ढंग और अप्रत्याशित तरीके से काम किया है। आज तक तो उनका हर कदम सही पड़ता हुआ दिख रहा है।

समाचार पत्रों ने इसे भाजपा का विपक्ष को एक बड़ा झटका कहा है। भाजपा के इस चाल ने विपक्ष की हवा निकाल कर रख दी और उनकी एकता की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सही अर्थों में देश में विपक्ष का अस्तित्व नहीं के बराबर रह गया है। लुंजपुंज, अपंग सा विपक्ष जिस पर मार पर मार पड़ती जा रही है। भाजपा की चाल को देखते हुए हमें समझना चाहिए कि उसने इस देश की राजनीति को सही में समझ लिया है। इस देश में जो लोग या पार्टियां आज तक ‘सामाजिक न्याय’ या ‘आर्थिक न्याय’ का झण्डा उठाये हुए, उन लोगों के मसीहा होने का दावा करते हुए उन्हीं वर्गों के हाशिये के लोगों से जो व्यवहार करते थे वह किसी भी तरह सवर्ण या ब्राह्मणवादियों के व्यवहार से अलग नहीं था। फिर वह चाहे दलितों में हाशिये के वर्ग या जातियां हों या फिर अल्पसंख्यकों के दलित हों। सामाजिक न्याय के परिधि में आने वाली दलित जातियों के अंदर भी कुछ जातियां दबंग और जनसंख्या में अधिक हैं जबकि कुछ कमजोर, असहाय और सीमांत हैं। इसी कारण संवैधानिक सुविधाओं और सुरक्षाओं के लाभों को वही दबंग लोग लपक ले जाते हैं। शेष कम जनसंख्या के, गरीब और सीमांत दलित जातियों के लोग ताकते रह जाते हैं। इस विषय में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री वीपी सिंह का एक साक्षात्कार 1995 में राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हुआ था, याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि आज देश की राजनीति उन लोगों के हाथ में है, जिन्हें अब तक कुछ नहीं मिला। भविष्य में भी राजनीति की दिशा-दशा वे वर्ग या लोग तय करेंगें जिन्हें आगे भी कुछ नहीं मिलेगा, कितना सही है? क्योंकि हाशिये के लोगों में धीरे-2 अपने शोषण और अधिकारों के प्रति जागृति आना स्वाभाविक है और उसे पहचानना भी आवश्यक है। इस सच को भाजपा की इस जोड़ी ने पहचान लिया और वे उसे पकड़ कर आगे बढ़ रहे हैं। उधर तथाकथित विपक्ष जो मूर्छित अवस्था में पड़ा हुआ है, की समझ में यह नहीं आ रहा कि सब कुछ यहां खत्म नहीं हो जाता?

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यह भी सही है कि विपक्ष के पास इतना समय था कि वह इसकी पहल करते हुए भाजपा से पहले ही प्रत्याशी की घोषणा कर सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उसकी दशा तो न तो मुझे मिलेगा और न तुम्हें खाने दूंगा वाली है। यह भी सही है कि देश में सशक्त और संघर्षशील विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं बची है। भले ही कांग्रेस, वाम और क्षेत्रीय क्षत्रप जितना भी अपनी-2 पीठें थपथपाएं। सब जानते हैं कि देश का वाम लकवाग्रस्त होकर पस्त पड़ा हुआ है। क्योंकि जो काम उन्हें करने चाहिए थे वह सब भाजपा ने आरएसएस के माध्यम से किये। आज आरएसएस देश के कौने-2 में दूर से दूर और कठिन से कठिन क्षेत्रों तक फेल चुका है जब कि वाम सिर्फ और सिर्फ शहरी मध्य वर्ग और ट्रेड यूनियन तक सीमित रह गया है। उसके नेतागण आज तक चारकोल वाली सड़क से अलग नहीं हट सके हैं, कच्ची सड़क पर उनकी कारें गंदी हो जाती हैं, गांव देहात का पानी उनके पेट को खराब कर देता है और उनको बिसलरी का मिनरल पानी पीने की आदत पड़ चुकी है। जो क्षेत्र वाम के होने चाहिए वहां आज आरएसएस और भाजपा का भगवा फहराता है। आज वहीं वाम जो नारे लगाता था ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’ देश के नक्शे से मिटता जा रहा है। कांग्रेस की झण्डा उठाने की आदत और एक परिवार को ढोने की संस्कृति तथा विटामिन के इंजेक्शन की मदद से नेता के अंदर ताकत डाल कर चलाने की मजबूरी, क्षेत्रीय क्षत्रपों की अपने-2 वंश को आगे बढ़ाने और निरंकुश प्रजापीड़क बनने की इच्छा तथा महिला नेत्रियों में किसी की महारानी बनने की महत्वाकांक्षा तो किसी की दिशाहीन राजनीति। इस सबसे मिल कर बनता है आज इस देश का विपक्ष तो क्या उम्मीद की जा सकती है? उधर मोदी साहब का सीधा संवाद के नाम पर मन की बात में तमाम तरह का झूठ। जिसका जवाब देने की विपक्ष के पास न तो कोई इच्छा शक्ति है और न ही सामर्थ्य। सरकार और भाजपा झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं और विपक्ष बेबसी देखता रहता है।

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आज भाजपा ने एक दलित को राष्ट्रपति के लिए प्रत्याशी बना दिया तो विपक्ष की किसी भी पार्टी में हिम्मत नहीं कि वह उसका विरोध करे। जैसे कि सब कुछ यहां पर आकर खत्म हो जाता है। किसी में भी यह दम नहीं कि दलित वोट को चुनौती दे सके। लोजपा के नेता पासवान ने तो घोषणा ही कर दी है कि यदि कोई कोविन्द जी का विरोध करेगा तो उसे दलित विरोधी माना जाएगा। जैसे कि भाजपा हर चीज को देशभक्ति और राष्ट्रवाद से जोड़ देती है, वैसे ही राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन को लेकर भी होगा और विपक्ष के नेता चित….। देश की विपक्षी पार्टियों, नेताओं को पूछा जाना चाहिए कि इस बात से उन्हें इतना डर क्यों लगता है ?

एलेजेंडर ने अपने सेनापति सेल्यूकस से कहना कि यह देश बहुत विचित्र है, मुझे बार-2 याद आता है। यह ठीक है कि इस देश में सवर्ण और अवर्ण में बहुत फासले हैं। यह भी उतना ही सच है कि दलितों या अवर्णो के अंदर भी उतने ही फासले और विभेद हैं। इसी लड़ाई को मैं पिछले 40 सालों से लड़ रहा हूं, मैं जानता हूं कि दलित जातियों के बीच भी उतनी ही दूरियां हैं जितनी एक सवर्ण और अवर्ण के बीच। इनमें भी आपस में कोई सामाजिक अंतरक्रियाएं नहीं होती। संविधान के सामाजिक न्याय के नाम किए गए प्रावधानों का लाभ भी अनुसूचित जातियों के दबंग, प्रवल एवं अधिसंख्यकों ने ही उठाया है। इसी सच्चाई को भाजपा या मोदी-शाह ने समझा है और उस पर कार्य किया है, जिसे अन्य राजनीतिक पार्टियां या राजनेता न तो समझ सके न लीक से हट कर कार्य कर सके। इसी सच्चाई को मैंने अपनी पुस्तक ‘संविधान के समाजिक अन्याय’ में बताने का प्रयास किया है। मैं इस सच्चाई से उपजी समस्या के समाधान के लिए मांग करता रहा हूं- ‘सविधान के सामाजिक न्याय की परिधि में आने वाले वर्गों, समाजों, समुदायों तथा समूहों के अंदर भी सामाजिक न्याय हो’। याद रखना चाहिए अब वह समय चला गया जब दलित एकता के नाम पर हाशिये के, कम जनसंख्या और गरीबों को दबाया या भावनात्मक रूप से ठगाया जाता था। आज पासवान या मायावती बोल दे तो कोई आवश्यक नहीं कि वह पूरे देश के पूरे दलित जातियों की आवाज़ हो। इसलिए विपक्ष को कोविन्द साहब की जाति और उनकी प्राथमिक प्रतिबध्ता अवश्य जाननी चाहिए। और भी कि क्या वह देश के समस्त दलितों या समस्त दलित जातियों और उपजातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। या कि वह सिर्फ अपनी ही जाति यानि ‘कोली’ का झण्डा लेकर चलते हैं?

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समाचारों के अनुसार कुछ दिन पहले जब कोविन्द साहब हिमाचल प्रदेश में घूमने के लिए आये तो उन्होंने शिमला में अपनी जाति ‘कोली समाज’ के एक बड़े समारोह में हिस्सा लिया था। इसी प्रकार कुछ माह पहले 8 दिसम्बर, 2016 कुल्लू में सम्पन्न हिमाचल प्रदेश के ‘कोली समाज’ के समारोह में भी उन्हें मुख्य अतिथि के तौर पर आना था लेकिन अंतिम समय में खराब मौसम के कारण आना स्थगित हुआ। इससे साफ है कि यह दलित एकता, दलित वोट आदि-2 बातें पुरानी पड़ चुकी हैं और समाज आगे गया है। पूरे देश का दलित कभी भी एक दलित नेता के साथ आज किसी भी तरह नहीं हो सकता। अंत में किसी का दलित होना, दलित वोट की गारंटी नहीं देता।

 

ल.च.ढिस्सा
समाज कार्यकर्ता