उत्तर प्रदेश के चुनावों के दौरान देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी भाषण को श्मशान और क्रबिस्तान तक पहुंचा दिया, जिसे तमाम मीडिया, विशेषतौर पर सोशल मीडिया ने बड़े ऊंचे स्तर पर उठाया। वैसे तो यह मुद्दा कम महत्व का नहीं है फिर भी यह क्यों होता है कि इस तथाकथित डिजिटल हो रहे देश में केश, केशलेस अर्थव्यवस्था पर देश की आर्थिकी पर बात होती ही नहीं? मैं सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाला एक समाज कार्यकर्ता हूं फिर भी आर्थिक प्रश्नों को भी संजीदगी से लेता हूं। ‘फेसबुक’ या अन्य स्थानों पर आर्थिकी पर भी चर्चा करने का प्रयास करता हूं, लेकिन मेरे मित्रों ने आज तक उसे घास तक नहीं डाली। अभी हाल ही में एनपीए और ‘टेक्निकल राइट ऑफ’ पर फेसबुक पर कई स्टेटस डाले यहां तक कि ब्लॉग भी लिखा, मजाल कि कोई प्रतिक्रिया हुई हो, लोगों ने उसे पढ़ा तक नहीं। ऐसा क्यों होता यह समझ में नहीं आता ? क्यों पेट के सवाल को हम सवाल नहीं समझते…? क्यों स्वास्थय, शिक्षा जैसे मूल और सबसे महत्वपूर्ण सवालों को हम विचार करने योग्य नहीं समझते? क्यों सिर्फ भावनात्मक मुद्दों के पीछे दौड़ते हैं?

देश के अंदर एक बड़ा आंदोलन तैयार होने जा रहा है ‘सामाजिक न्याय’ का लेकिन उनके लिए ‘आर्थिक न्याय’ लगभग नगण्य विचार या समस्या है। यहां हम यह क्यों भूल जाते हैं, जो वर्ग ‘सामाजिक अन्याय’ का शिकार है, वही वर्ग आर्थिक क्षेत्र में अन्याय का शिकार है। हमें समझना पड़ेगा और मान कर चलना पड़ेगा कि सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय एक दूसरे के पूरक हैं प्रतिद्वंदी नहीं जिस वर्ग को सामाजिक न्याय की आवश्यकता है, उसी वर्ग की आर्थिक दशा भी बुरी है। उस वर्ग को ही स्वास्थय और शिक्षा के क्षेत्र में भी न्याय की आवश्यकता है। इधर मैं अपने स्टेटस में जब भी ‘जय भीम लाल सलाम’ एक साथ लिखता हूं तो दोनों खेमों यानि ‘सामाजिक न्याय’ और ‘आर्थिक न्याय’ के नाम पर लड़ने वालों को मिर्चें लग जाती हैं और कटाक्ष ही नहीं करते, मुझे ‘क्रीमीलेयर’ के दलाल के रूप में पहचानने का प्रयास भी होता है।

कुछ ही दिनों पहले एक ब्लॉग लिखा था ‘टेक्निकल राइट ऑफ के नाम पर….’ उससे आगे कुछ नई सूचनाएं आई हैं जो मैं सांझा करना चाहता हूं। मैं कुछ सूचनाओं को दोहराना भी चाहता हूं कि ध्यान बना रहे। ये सूचनाएं अधिकतर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के समाचारों से ली गई हैं।

You May Also Like  2018- शीर्ष में महिलाओं की घटती हिस्सेदारी व अन्य प्रश्न

मैंने पीछे सांझा किया था कि 1) इस देश के शिखर के एक प्रतिशत (1%) लोगों के कब्ज़े में देश की 60% सम्पति है। 2) इस देश के शिखर के 20% धनकुबेरों ने देश की 80% सम्पति दबा रखी है। 3) इस देश के निम्न पायदान के 50-60% लोगों के हिस्से में देश की सम्पति का मात्र 2% आता है। आगे भी सांझा किया था कि (1) इस देश के सरकारी बैंकों ने देश के बड़े पूंजीपतियों के वर्ष 2000 से आज तक 4 लाख करोड़ रुपयों के ऋण बट्टे खाते डाले हैं, जिसे हमारे महान अर्थशास्त्री ‘बैक डोर’ वितमंत्री ‘टेक्निकल राइट ऑफ’ कहते हैं और दावा करते हैं कि इस प्रकार किसी का भी ऋण माफ नहीं किया जाता। (2) वर्ष 2000 से मार्च 2016 तक सरकारी बैंकों का एनपीए 10 लाख करोड़ का था। (3) जिसमें 4 लाख करोड़ बट्टे खाते चढ़ाया जा चुका है, 6 लाख करोड़ अब भी बट्टे खाते चढ़ना है। देर सबेर यह सब ऋण माफ भी कर दिया जायेगा जिसका पता न आप को चल पायेगा न मुझे। इस बात का यह एक बड़ा उदाहरण है कि यदि पिछला 4 लाख करोड़ रुपये का एनपीए बट्टे खाते न डाला गया होता तो आज हमें पता चलता कि सरकारी बैंकों का 10 लाख करोड़ का ऋण फंसा हुआ है। लेकिन अब 4 लाख करोड़ को बट्टे खाते डाल दिया गया है। इसलिए अब सिर्फ 6 लाख करोड़ ही सामने है, उसी की बात होगी। 4 लाख करोड़ को लोगों की नज़र से छिपा दिया गया, जिसके बारे में कभी पता नहीं चल पायेगा उसका क्या हुआ? लेकिन मजाल कोई प्रतिक्रिया हुई हो?

जेटली जी के इस ‘टेक्निकल राइट ऑफ’ को ऋण माफी के लिए कई तरह से प्रयोग किया जा सकता है और वह भी आम जन को पता लगे बिना। उसमें पहला और सबसे बड़ा तरीका है, सरकार बैंकों के अंदर अपने हिस्से को विनिवेश कर दे यानि कि बेच दे और बैंक लोन को वापस करे, शिखर स्तर पर जिस पर सक्रिय विचार चल रहा है। दूसरा तरीका है किसी भी तरह के प्रोत्साहन के नाम पर कार्पोरेटर को मदद की जाये। तीसरा तरीका है ‘पैकेज’, मंदी की स्थिति से उबरने के लिए बैंकों को विशेष पैकेज देकर सहायता की जाती है। इस सब का इन अदृश्य किए गए ऋणों यानि बट्टे खाते डाले गए ऋणों की अदायिगी आसान की जा सकती है। इसकी एक विशेषता यह कि इस प्रकार के ऋण कब, कैसे और कौन इन ऋणों को चुकाता है इस बात का ज्ञान किसी को नहीं होता। चुपके से ऋण खाते बंद हो जाते है किसी को पता भी नहीं चलता कि किसका और कितना ऋण खत्म हो गया। बैंकों को उनके लोन मिल जाते हैं, उनके नुकसान की भरपाई हो जाती, बड़े लोगों के ऋण माफ, उनके नाम तक पता नहीं चला पाते कि किसने कितना डकारा है। तमाम चीजें रफादफा और आम आदमी मूर्ख बन टापता रह जाता है….?

You May Also Like  'मजदूर दिवस' पर हर मजदूर को ‘सतरंगी सलाम'

अब कुछ नए आंकड़े सामने आए हैं उसके आधार पर मैं आप से कुछ सांझा करना चाहता हूं। वह है दिसम्बर, 2016 तक सरकारी बैंकों का यह एनपीए बढ़कर 6,14,872 करोड़ रुपये हो गया है। अब यदि निजी बैंकों के एनपीए उसमें मिला दिया जाये तो यह राशि 6,97,409 करोड़ हो जाती है। बताया गया है कि इस बढ़ोतरी का एक कारण नोटबंदी भी है।

2014 से 2016 तक के दो वर्षों में देश के 24 सरकारी बैंकों के संदर्भ में एनपीए में 135 प्रतिशत की वृद्धि हुई है यानि दिसम्बर, 2014 में जो राशि 2,61,843 करोड़ रुपये थी वह बढ़कर 2016 दिसम्बर में 6,14,872 करोड़ हो गई। इसी तरह दिसम्बर, 2015 से दिसम्बर, 2016 के बीच यह 3,93,047 करोड़ से बढ़कर 6,14,872 करोड़ हो गई यानि 56.4% की वृद्धि। यदि इसमें निजी बैंकों को जोड़ दिया जाए तो यह 2014 से 2016 के दो सालों में 2,92,193 करोड़ में बढ़कर 6,97,409 करोड़ और 2015 के मुक़ाबले 2016 में 4,37,860 करोड़ से बढ़कर 6,97,409 करोड़ हो गई यानि क्रमश: 139% और 59% की वृद्धि।

जैसे कि आरबीआई के पूर्व उप गवर्नर श्री चक्रवर्ती ने भी कहा है कि इस सबका एक बड़ा कारण है वित्तीय कुशासन। वित्तीय सुशासन से इस स्थिति से निपटा जा सकता है। यह वित्तीय कुशासन भी एक योजना के अंतर्गत होता है, जिसमें कुछ अति विशिष्ट लोगों के व्यक्तिगत हित भी जुड़े होते है। इसके अलावा देश के शिखर स्थानों के अंदर भ्रष्टाचार का जो आलम है और भी देश के अंदर सम्पति का असमान बंटवारा और आय में असमानता भी इस प्रकार के कुशासन के लिए उत्तरदायी है।

You May Also Like  वायु प्रदूषण से लड़ता है 'विटामिन ई', जानिए कैसे?

एक अन्य महत्वपूर्ण विषय की तरफ ध्यान खींचना चाहता हूं, वह है शिक्षा के क्षेत्र में चलाई जाने वाली असमानता की नीति। देश की उच्च शिक्षा प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से देश के नए-पुराने ब्राह्मणों के लिए आरक्षित कर दी गई है और गरीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों और सीमांतों के लिए कौशल विकास के कार्यक्रमों के नाम पर भी देश के संसाधनों और धन को लुटाने के साथ-2 देश के युवाओं को धोखा दिया जा रहा है।

यहां उन ‘कौशल विकास’ के कार्यक्रमों की दशा के बारे में बता दिया जाता है कि कुछ दिन पहले मैंने समाचारों के आधार पर लिखा था कि देश के अच्छे नियोक्ताओं ने कहा है कि इस प्रकार के असली-नकली संस्थाओं के ‘उत्पाद इंजीनियर’ और अन्य तकनीकी बल में 65% ऐसे हैं जिन्हें नौकरियों से निकाल दिया जाना चाहिए। क्योंकि उनके पास जो डिग्रियां हैं उनके हिसाब से उनका ज्ञान भी नहीं है और तकनीकी कौशल भी नहीं है। जिसका सीधा मतलब है कि कौशल विकास के नाम पर लोग बहती गंगा में हाथ ही नहीं धो रहे, पूरा स्नान कर रहे हैं। दूसरी और गरीब और बेरोजगार युवा वर्ग के साथ एक मज़ाक और एक बार फिर धोखा। एक अन्य बात जो लोग 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले सिर्फ विकास की ही बात करते थे। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नाम पर उत्तर प्रदेश में ‘लैंड स्लाइड’ जीत हासिल की थी। आज विधान सभा (विशेषत: उत्तर प्रदेश) चुनावों में ‘कब्रिस्तान और श्मशान’ पर उतर गये और विजयी हुए हैं। तथाकथित आर्थिक सुधार और विकास किस्म के विषय तो भुला ही दिये गए हैं।


क्यों पेट के सवाल को हम सवाल नहीं समझते…? क्यों स्वास्थय, शिक्षा जैसे मूल और सबसे महत्वपूर्ण सवालों को हम विचार करने योग्य नहीं समझते?

वर्ष 2000 से मार्च 2016 तक सरकारी बैंकों का एनपीए 10 लाख करोड़ का था।

अच्छे नियोक्ताओं ने कहा है इस प्रकार के असली-नकली संस्थाओं के ‘उत्पाद इंजीनियर’ और अन्य तकनीकी बल में 65% ऐसे हैं जिन्हें नौकरियों से निकाल दिया जाना चाहिए। क्योंकि उनके पास जो डिग्रियां हैं उनके हिसाब से उनका ज्ञान भी नहीं है और तकनीकी कौशल भी नहीं है।