दुनिया के सबसे बड़े मजदूर ‘पलायन’ या अधिक उपयुक्त ‘घर वापसी’ के दौरान की तकलीफ़ों ने यह भी बता दिया कि गरीब चाहे कहीं का हो, मजदूर (Migrant Labour) जिस भी तरह का हो उसके दुख और तकलीफ़ें एक से होते हैं। मजदूरों के इस महा पलायन के बीच एक खबर थी जिसे बहुत महत्व के साथ दिखाया गया इसीलिए लिखना पड़ा , Migrant Labour: गरीब के जीवन का सच, अमीर का मनोरंजन।
खबर बड़वानी, मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की है। जहां एक मजदूर औरत ने घर वापसी के दौरान बीच रास्ते (राष्ट्रीय राज मार्ग, जिस पर बड़े-2 ट्राले, लंबी-2 कारें चलती हैं और सरकारें जिसे अपनी उपलब्धियों में गिनाती हैं) उस मजदूर महिला ने समय से पहले राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक आठ माह के बच्चे को जन्म दिया और अपनी मंजिल यानि उसके घर तक जाने वाला 160 किमी रास्ते पर बढ़ गई।
समाचार पत्रों, टीवी चेनलों, उच्च, मध्यम वर्ग और सिविल सोसाइटी के लोगों को तो यह समाचार एकदम नया, कोतूहलपूर्ण और मनोरंजक लगा होगा। कुछ लोगों की हमदर्दी भी जगी होगी। तो बता दूं ,यह सब मजदूरों (Labours) की दिनचर्या का हिस्सा है। उनके लिए यह सब जीवन का हिस्सा है। गरीब के साथ इस तरह के हादसे आम बात हैं। यह सब तो गरीब के जन्म के साथ ही शुरू होता है और मृत्यु के साथ ही खत्म हो पाता है। ऐसा भी नहीं कि यह आज और इसी मामले में हुआ है। यह तो सभ्यता के साथ शुरू हुआ और चलता रहेगा।
गरीब के जीवन का सच, अमीर का मनोरंजन
यहां इसी तरह की कुछ सच्ची घटनाओं को सांझा कर रहा हूं। अतीत में मेरे लाहौल (Lahaul) के गरीब सर्दियों में कुल्लू (Kullu) उतर आते थे ताकि मजदूरी (Migrant Labour) करके अपना व बच्चों का पेट पाल सके। फिर वापसी होती थी, मौसम के बदलने पर। पैदल यात्रा के कई दिनो के रास्ते, बीच में एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा ‘रोहतांग’। रोहतांग पार करने से पहले राहला और मढ़ी के बीच में आश्रय के लिए कुछ प्राकृतिक गुफाएं, जिन का प्रयोग करते थे लाहौल जाने वाले लोग। वे लोग समूहों में चला करते थे।
एक बार इस तरह के एक समूह में एक गर्भवती महिला भी शामिल थी। रास्ते में रोहतांग पर उस महिला को प्रसवपीड़ा शुरू हुई और उसने शून्य डिग्री से नीचे के तापमान में एक शिशु को जन्म दिया। यात्रा निर्विघ्न जारी रही। मजे की बात मजबूर लेकिन मजबूत मां ने उस बच्चे का नाम रोहतांग में जन्मने के कारण ‘धारु’ रखा, मेरी भाषा में रोहतांग को ‘धार’ कहते हैं। धारु अभी कुछ साल पहले तक जीवित रहा।
यह कोई अकेला या अपवाद का मामला नहीं है। इस सात-आठ दिनो की कठिन यात्रा के दौरान अनेकों बार ऐसा हुआ है। एक अन्य घटना, एक अन्य महिला की है, बताता हूं। उसी तरह की यात्रा, उसी तरह का समूह, वही क्षेत्र। महिला का प्रसव काल निकट था, लेकिन वह रुक नहीं सकती थी। क्योंकि उसके समूह का जाना तय था। वह भी चल पड़ी, उसने रोहतांग पार कर लिया और कोकसर पहुंच गई, लेकिन एक तरफ मौसम ने करवट बदल ली और दूसरी ओर उसे प्रसवपीड़ा शुरू हो गई। मौसम खराब था, बर्फवारी हो रही थी, उसके पास कोई आश्रय भी नहीं था।
इस लिए बाहर खुले आसमान के नीचे, पड़ती बर्फ के बीच उस गरीब मज़दूरन (Migrant Labour) ने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन उसके पास रुक कर आराम करने न तो समय था और न ही साधन। उस दिन जना बच्चा आज 45-50 वर्ष की आयु का पुरुष जीवित है। मां, भले ही हमारे बीच में नहीं है। अमीरों और सुविधाभोगी वर्ग के लिए ये कोतूहल और मनोरंजन के विषय हो सकते हैं, लेकिन गरीब के जीवन की सच्चाइयां हैं।