आखिर भारतीय रिज़र्व बैंक की आईएसी (आंतरिक सलाहकार समिति) ने देश के अति विशिष्ट 12 लोगों ने नामों की पहचान कर ली है, जिन्होंने देश के सरकारी बैंकों के लगभग 7 लाख करोड़ रुपयों के ‘बेड लोन’ (लगभग डूबे ऋणों) के 25 प्रतिशत भाग के जिम्मेदार होने का सम्मान प्राप्त किया है। अभी तक तो बैंकों (आरबीआई सहित) को उन लोगों के नाम उजागर करने में डर और शर्म अनुभव होती थी। जबकि 1978 में किसानों के ऋण माफी पर तो हर बैंक ने अपने-2 नोटिस बोर्ड में गर्व से बड़े-2 अक्षरों में उन सब किसानों के नाम लिख दिये थे जिनके 500/- रु. का लोन भी माफ किया गया था।

इस समिति ने सिफ़ारिश की है कि उन मुख्य डिफ़ाल्टर केसों को ‘इन्सोलवेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड’ के अधीन दिवालिया घोषित करने के लिए भेजा जाये। यह सब भी सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद सम्भव हुआ, अन्यथा तो पूरी व्यवस्था के उन मान्यवरों के नामों को उजागर करने और करवाही करने में अपने को असमर्थ महसूस कर रही थी। लेकिन अब देश के धन को अपना मान कर हज़्म करने वाले मान्यों को ससम्मान निर्दोष प्रमाणित करने का अभ्यास शुरू हो चुका है।

आंतरिक सलाहकार समिति (आईएसी) इन 5000 करोड़ रुपयों से अधिक के ऋण के चुकता न करने वालों के केस इसलिए दिवालिया घोषित करना चाहती है ताकि उन ऋणों की या तो तेज़ गति से वसूली हो या फिर शीघ्रता से कंपनियों का समापन किया जा सके। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके इस कदम से जन साधारण पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। आम आदमी के सिर पर बोझ न डाला जाये। इस बारे में हमारी महा पंचायत यानि संसद भी काफी मुस्तेद है, जैसे सहकारिता के अंदर उस सभा के समापन पर हिस्सा धारकों का उनके हिस्से से 10 गुना दायित्व होता है। यानि कि सरकार भी सुरक्षित, तमाम लेनदार भी सुरक्षित। यहां सिर्फ जानबूझ कर ऋण न चुकाने वाले सुरक्षित रखे जायेंगे।

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