पुनर्वास और उचित मुआवजे की मांग को लेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता व सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का धार के चिखल्दा में चल रहा उपवास आठवें दिन भी जारी है। इस बीच प्रभावितों के समर्थन में विभिन्न संगठनों से जुड़े प्रमुखों का आज से दिल्ली के जंतर-मंतर पर उपवास शुरू हो गया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 31 जुलाई तक संपूर्ण पुनर्वास कर ऊंचाई बढ़ाने के निर्देश दिए थे, मगर पुनर्वास का काम अधूरा पड़ा है। वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आठ अगस्त को सुनवाई किए जाने के कारण अभी ऊंचाई बढ़ाने काम रुका हुआ है।
जहां एक और मेधा पाटकर अपने आठवें दिन में प्रवेश कर रहे अनशन में सिर्फ पानी का सेवन कर रही हैं। वहीं दिल्ली में शुरू हो रहे आंदोलन में देश के बड़े नेताओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं के शामिल होने की उम्मीद है। आंदोलन की विज्ञप्ति के अनुसार जंतर-मंतर पर योगेंद्र यादव, संदीप पांडेय, डॉ. सुनीलम्, आलोक अग्रवाल, न्यायाधीश राजिंदर सच्चर, अरुणा रॉय, एनी राजा, निखिल डे, कविता श्रीवास्तव, सौम्या दत्ता, फैजल खान, भूपेंद्र सिंह रावत, राजेंद्र रवि सरीखे नेता आंदोलन का नेतृत्व करेंगे।
क्या है ये महत्वाकांक्षी परियोजना
दरअसल ये भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है, जिसके तहत देश में 3000 लघु, 136 मध्यम और 30 बड़े स्तर के बांध बनाने का प्लान है। नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना का उद्घाटन 1961 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। लेकिन तीन राज्यों – गुजरात, मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र जहां पर मुख्यता बांध बनना था के बीच उपयुक्त जल वितरण नीति पर कोई सहमति नहीं बन पायी।
गुजरात सरकार का दावा था कि इन प्रोजेक्ट्स से राज्य में करीब 2 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन की सिंचाई की जा सकेगी करीब 1500 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी हो पायेगा। वहीं मध्यप्रदेश सरकार ने दावा किया था कि इस प्रोजेक्ट से मध्यप्रदेश में करीब 15 लाख हेक्टेयर ज़मीन की सिंचाई संभव हो पाएगी और करीब 1000 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी होगा। भारत सरकार ने दावा किया कि इन सभी प्रोजेक्ट के पुरे हो जाने पर देश के करीब 4 करोड़ लोगों को पीने का स्वच्छ पानी भी मिलेगा।गुजरात में इस प्रोजेक्ट को सरदार सरोवर प्रोजेक्ट (SSP) के नाम से जाना गया। वहीं मध्यप्रदेश में इसे नर्मदा सागर प्रोजेक्ट (NSP) के नाम से जाना गया।
वर्ल्ड बैंक ने इस प्रोजेक्ट के कुल खर्च का 10% करीब 250 मिलियन डॉलर (करीब 14 अरब 92 करोड़) देना मंजूर भी किया था। लेकिन वैश्विकस्तर पर हुए आंदोलन ने वर्ल्ड बैंक को अपनी राशि वापिस लेकर इस परियोजना से खुद को अलग करने पर मजबूर कर दिया।
नर्मदा बचाओ आंदोलन है क्या
1989 में मेघा पाटकर द्वारा लाए गये नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर परियोजना तथा इससे विस्थापित लोगों के पुर्नवास की नीतियों के क्रियांवयन की कमियों को उजागर किया। शुरू में आंदोलन का उददेश्य बांध को रोककर पर्यावरण विनाश तथा इससे लोगों के विस्थापन को रोकना था। बाद में आंदोलन का उद्देश्य बांध के कारण विस्थापित लोगों को सरकार द्वारा दी जा रही राहत कार्यों की देख-रेख तथा उनके अधिकारों के लिए न्यायालय में जाना बन गया।
आंदोलन की यह भी मांग है कि जिन लोगों की जमीन ली जा रही है उन्हें योजना में भागीदारी का अधिकार होना चाहिए, उन्हें अपने लिए न केवल उचित भुगतान का अधिकार होना चाहिए बल्कि परियोजना के लाभों में भी भागीदारी होनी चाहिए। इस प्रक्रिया में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने वर्तमान विकास के मॉडल पर प्रशनचिन्ह लगाया है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन जो एक जन आंदोलन के रूप में उभरा, कई समाजसेवियों, पर्यावरणविदों, छात्रों, महिलाओं, आदिवासियों, किसानों तथा मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का एक संगठित समूह बना। आंदोलन ने विरोध के कई तरीके अपनाए जैसे- भूख हड़ताल, पदयात्राएं, समाचार पत्रों के माध्यम से, तथा फिल्मी कलाकारों तथा हस्तियों को अपने आंदोलन में शामिल कर अपनी बात आम लोगों तथा सरकार तक पहुँचाने की कोशिश की। इसके मुख्य कार्यकर्ताओं में मेधा पाटकर के अलावा बाबा आम्टे, अनिल पटेल, बुकर सम्मान से नवाजी गयी अरुणधती रॉय आदि शामिल हैं।
1994 में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दर्ज की तथा न्यायपालिका से केस के निपटारे तक बांध के निर्माण कार्य को रोकने की गुजारिश की। 1995 के आरम्भ में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सरकार बांध के बाकी कार्यों को तब तक रोक दे जब तक विस्थापित हो चुके लोगों के पुर्नवास का प्रबंध नहीं हो जाता। 18 अक्तूबर, 2000 को सर्वोच्च न्यायालय ने बांध के कार्य को फिर शुरू करने तथा इसकी उचाई 90 मीटर तक बढ़ाने की मंजूरी दे दी।
अप्रैल 2006 में नर्मदा बचाओ आंदोलन में एक बार फिर से उग्रता आई क्योंकि बांध की उँचाई बढ़ाकर 122 मीटर तक ले जाने का निर्णय लिया गया। मेघा पाटकर अनशन पर बैठ गयीं। 17 अप्रैल 2006 को नर्मदा बचाओ आंदोलन की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने संबंधित राज्य सरकारों को चेतावनी दी कि यदि विस्थापितों का उचित पुनर्वास नहीं हुआ तो बांध का और आगे निर्माण कार्य रोक दिया जाएगा।
ज्ञात हो कि मज़लूमों की आवाज़ बन चुकी मेधा पाटेकर 2014 का लोकसभा चुनाव आम आदमी पार्टी के टिकट पर लड़ीं थी, शायद एक जन आंदोलन को बेहतर मुकाम तक पहुंचाने के लिए, लेकिन हार गयीं।
बांध के बनने से खतरा व नुक्सान
बांध के बनने से बहुत सारा बहता पानी एक जगह रुक कर इकठ्ठा होना शुरू हो जाता है, जिससे आस पास की ज़मीन पानी में डूब जाती है। जिससे वहां के रहने वाले लोग अपनी ज़मीन, घर और रोजगार से हाथ धो बैठते हैं। साथ ही बहुत बड़ा इलाका उपजाऊ ज़मीन से हाथ धो बैठता है।
ज्ञात हो कि नर्मदा भारत की पांचवीं सबसे बड़ी नदी है, जिस पर बांध बनना है और ये आंदोलन जारी है। अकेले गुजरात के सरदार सरोवर बांध की बात करें तो ये बांध करीब 455 फुट ऊंचा है। इतने ऊंचे बांध में जब पानी भरना शुरू होगा तो गुजरात, महाराष्ट्र समेत मध्यप्रदेश के करीब 37000 हेक्टेयर कृषि के उपजाऊ ज़मीन पानी में डूब जाएंगे। सिर्फ एक सरदार सरोवर बांध से 320,000 लोगों को विस्थापित होना पड़ा है। इसके अलावा जंगली जीव और पेड़ पौधों का नुक़सान अलग।
सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने से मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी के 192 गांव डूब क्षेत्र में आने वाले हैं, जिससे 40 हजार परिवारों की जिंदगी प्रभावित होने वाली है।