एक बात सांझा करना चाहता हूं ताकि प्रमाण रहे कि 03 जुलाई, 2019 (16.06.2019 को हस्ताक्षरित) के दिन मैंने लाल बहादुर शास्त्री मेडिकल कॉलेज, नेरचौक, मण्डी को मृत्यु उपरान्त अपनी ‘देह’ दान (Body Donate) कर दी है। आज उसका आई-कार्ड भी प्राप्त हुआ है (देखें फोटो)।

 

इसके कुछ कारण जो मेरी समझ में है: (1) मृत्यु उपरांत के संस्कारों, रीतियों आदि आदि के नाम पर किए जाने वाले व्यर्थ के प्रपंचों से बचना/बचाना। (2) अब तो मेरे लाहौल के सीधे सरल जीवन पर भी अधिक सभ्य समाज की नज़र लग गई है और उसने जीवन को अधिक जटिल और आडम्बतापूर्ण बना दिया है। मुख्यधारा के बहुत से अनावश्यक रीति-रिवाजों को जोड़ा जा रहा है। (3) मेरा शरीर, अंग समाज के किसी काम आ सकें। (4) अपनी शर्तों पर जीवन जिया है, मरने के बाद भी यह बरकरार रहे।

वैसे तो इसकी शुरुआत मैंने 2001 में कर दी थी, जब मरने के बाद निभाए जाने वाले एक रिवाज (मेरी भाषा में सामो), जिसमें परिजनों और गांव वालों को बुला कर खिला-पिलाना शामिल होता है। इस अवसर पर वर्तनदारी के नाम पर कुछ लेन-देन भी होता है। मैंने अपने पिता जी के लिए दिये गये भोज पर उसे नहीं लिया ताकि किसी के वर्तन को चुकाने की ज़िम्मेदारी न रहे।

आज़ाद पैदा हुए इन्सान को ज़ंजीरों में जकड़ कर रहने के लिए विवश करना सभ्यता नहीं कही जा सकती। मेरा मानना है, व्यक्ति अधिक से अधिक स्वतंत्र हो और जीवन अधिक से अधिक सरल…….. ।

आम तौर पर दुनियां के समस्त जीवों के मृत देह का कोई न कोई सदुपयोग तो होता ही है, वह भले ही एक-दूसरे द्वारा खाने के रूप में ही क्यों न हों। लेकिन मानव देह मृत्यु के बाद आमतौर पर किसी काम नहीं आती बल्कि झगड़े का कारण बनती है। उत्तराधिकारियों के बीच शानदार व यादगार अंतिम संस्कार के लिए।

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कुछ धर्म मृत शरीर को जला देते हैं तो कुछ दफना देते हैं। यह भी सही है कि दुनिया के कुछ धर्मों में मृत देह को पक्षियों, स्थल और जलीय पशुओं के भोजन के रूप में डालने के रिवाज भी हैं। यह सब अलग-2 धर्मों एवं मतों के आदेशानुसार होता है।

यहां एक बात विशेषतौर पर कहना चाहता हूं कि इस सिलसिले में मेडिकल कॉलेज जाने के दौरान मुझे यह भी बताया गया कि नेरचौक मेडिकल कॉलेज में देह दान करने वालों में अधिक संख्या ब्रह्मकुमारी आश्रम के सदस्यों की है।

इस मामले में एक बात और भी कहना चाहता हूं कि ‘देह दान’ के मेरे इस कार्य को ‘साहसिक कार्य’ (

एडवेंचरिज़म) का न समझा जाये। क्योंकि आज का यह अधिक शिक्षित, सभ्य, विकसित और डिजिटल युवा वर्ग इस प्रकार के मामलों की व्याख्या इस रूप में भी करता है। यह मेरा अनुभव आधारित है। कोई चार साल पहले की बात है, मेरे घर में कुछ युवा आए हुए थे। सभी अच्छे पढे-लिखे और सभ्य, अच्छे से खा-पी रहे थे यानि पार्टी भी चल रही थी, दारू भी चल रही थी। इसी बीच न जाने कैसे शहीद भगत सिंह की बात चल निकली तो उनमें एक युवा जो कि कानून का सनातक यानि कि बीए एलएलबी था, ने अपना मत प्रकट किया, उसके अनुसार भगत सिंह का कार्य कोई बलिदान आदि नहीं था बल्कि उसने तो यह प्रसिद्धि पाने के लिए किया था यानि एक साहसिक कार्य था। मैं अपने गुस्से को पी न सका और मैंने उसे सुना दिया। बाद में पता चला कि वह युवा किसी बैंक में ‘लॉ अफसर’ लग गया है। सोचिए! यदि वह जज बन जाता तो क्या होता…?

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इसलिए भी यह कार्य किसी भी तरह प्रसिद्धि पाने के लिए नहीं है बल्कि मेरी हार्दिक इच्छा रही है। यह भी बता दूं कि यह कोई धर्म से प्रेरित या स्वर्ग प्राप्ति के लिए किया गया कार्य नहीं है। जिसका प्रमाण है देह दान के लिए भरा गया फार्म जिसमें पहले नम्बर पर लिखा गया है ‘My body is most precious instrument (given to me by the God) to serve the humanity…….. ।‘ जिसमें ( ) ब्रैकेट के अन्दर के शब्दों को काट दिया था।

इस संदर्भ में एक घटना याद आती है, कुछ तीन-चार साल पहले हमारे एक दूर के रिश्तेदार किसी सरकारी वृद्ध आश्रम में मर गए। करीब 75 साल की आयु तक वह इधर-उधर लोगों के पास फिर अंत में एक ‘ओल्ड एज होम’ में घूमते घामते मर गए, तब तो उसका कोई रिश्तेदार नहीं निकला, लेकिन जैसे ही मर गये उसके कई रिश्तेदार निकल आए और उसके मृत शरीर को बड़ी सी आरामदायक टैक्सी में उसके पुश्तैनी गांव (लाहौल) में पहुंचाया गया, अंतिम संस्कार भी शानदार और यादगार ढंग से किया गया। उसके बाद खाना-पीना भी खूब हुआ।

आज (3.7.2019) के बाद मेरे पास अपना कहने के लिए भी कुछ नहीं रह गया है।  

Lal Chand Dhissa

Editor, Sadprayas