कोरोना की रात के बाद की सुबह भी गरीबों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, शोषितों, उपेक्षितों और सीमांतों के लिए कोई बड़ी चमकदार नहीं होने वाली है। इस लिए उन सब को सचेत और एकजुट होकर अपने अस्तित्व, अस्मिता एवं अधिकारों के लिए काम करना होगा। 14 अप्रेल, सुबह के 10 बजे प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित करते हुए तालाबंदी के दूसरे चरण का ऐलान कर दिया। यद्यपि साधारणत: वे इस तरह की घोषणाएं रात को ही करते हैं। पिछले बार 21 दिन का, इस बार 19 दिन का लॉकडाउन था। इसके कारण तो मन की बात समझने वाले ही जानते होंगे। जैसे आम होता है इस बार का सम्बोधन भी भावनात्मक अपील से न ज्यादा, न कम था। गरीबों की तकलीफ़ों को देश के लिए बलिदान करार दिया और उनसे और झेलने के लिए आदेशात्मक अपील की।

फिर 20 तारीख आएगी स्थिति का सख्ती से मूल्यांकन किया किया जाएगा, तब पता चलेगा किस क्षेत्र को लॉकडाउन से बाहर करना है, वह भी सशर्त। यानि इस देश के गरीब, किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी और मुसलमान को देश, देश भक्ति के नाम अभी तक कितना और झेलना है? देश को संबोधित करने के तत्काल बाद पता चला कि कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित महाराष्ट्र में कई स्थानो पर, जानवरों से बदतर जीवन बिताने के लिए मजबूर किए गए भूखे लोग एकत्रित हो गए और भरपेट खाने या अपने-2 घरों को भेजे जाने की मांग करने लगे। उनका तर्क था यहां भूखे मरने से तो अपने घरों में, अपने सगों के बीच मरना बेहतर  है ?

प्रश्न है क्या सरकार ने 21 दिनो के लॉकडाउन में यही सीखा? बचाव या उपचार का मतलब एक रोग से बचा कर दूसरे से मारना नहीं होता। कल प्रधानमंत्री ने पहली बार नियोक्ताओं से प्रार्थना की कि वे अपने कर्मचारियों व मजदूरों को नौकरी से न निकालें। काश! प्रधामन्त्री की समझ में यह बात होती कि मजदूर उन संस्थाओं और देश की देनदारियां नहीं वे तो इस देश की परिसम्पतियां हैं।

वैसे यह विपति पहली बार आई हो ऐसा भी नहीं है। इतिहास गवाह है, मानव ने इस तरह के अनेक झंझावात झेले हैं और उनका पार पाया है। यहां तक कि कई महान सभ्यताएं तो मिट भी गई, कुछ अवशेषों के आधार पर आज जिनकी पहचान व चर्चा होती है। ऐतिहासिक काल या जिसे हम गणना काल कह सकते हैं, जब से मनुष्य ने इसका लेखा जोखा रखना शुरू किया तब से मानव जाति पर इस प्रकार के असंख्य प्राकृतिक व मानवीय आक्रमण होते रहे हैं, कई दुर्भिक्ष पड़े, कई आपदायेँ आईं। मनुष्य ने हर अवसर पर अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित की है।

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ऐतिहासिक अभिलेखों में हमें यह भी दर्ज मिलता है कि तब के व्यवस्थापकों, यद्यपि तब निरंकुश सत्ताएं हुआ करती थीं, ने अपनी प्रजा के पेट की आग बुझाने के लिए अन्न भण्डार खोल दिये थे और अपनी प्रजा के जीवन की रक्षा की थी। लेकिन आज ऐसा क्यों लगता है, हमारी प्रजातांत्रिक सत्ता ऐसा नहीं कर रही है। जबकि आज तो उसके पास साधन, प्रौध्योगिक ज्ञान तथा सामर्थ्य भी अधिक है। आज लोगों को एक तरफ भूख से मरने का डर, दूसरी तरफ अपनों के दुख दर्द में शामिल न हो पाने की आत्मग्लानि। ऊपर से व्यवस्था की ओर से न कोई जीवन रक्षा का आश्वासन, न कोई पर्याप्त सहायता। एक तरफ भूखों मरने की स्थिति दूसरी तरफ सरकारी गोदामों में अन्न पड़ा सड़ रहा है। सरकारी मदद की लाइनों में लगने वाले भूखे प्यासे लोगों से तरह-2 के पहचान पत्रों और कार्डों की मांग की जा रही है। अलग-2 जितने तरह के कार्ड बनवाए गए हैं, की दरयाफ्त, आखिर क्यों?

कोरोना के बाद की स्थिति क्या होने वाली है, सोच कर डर लगता है। वैसे तो यह एक वैश्विक विपति है और इस का समाधान भी अलग-2 देश और क्षेत्र अपने-2 हिसाब से निकाल ही लेंगे और जीवन देर सवेर फिर पटरी पर दौड़ने लगेगा। अपने देश के बारे में सोचें तो तस्वीर कुछ इस तरह की बनती हुई दिखती है। 135 करोड़ लोगों का यह देश, जिसके आधे से अधिक लोग देश के योग्य बाबुओं द्वारा गरीबी रेखा से नीचे के घोषित किए हुए हैं।

देश की सम्पति और संसाधनों पर शीर्ष के कुछ ही धनिकों का कब्जा है। सम्पति और आय का अत्यधिक असमान बंटवारा और अधिकतम और न्यूनतम आय में ज़मीन और आसमान जितना अंतर। बेरोजगारी की विकट समस्या, आत्महत्या करते किसान, भूख से मरते गरीब, सामाजिक व आर्थिक असमानता, शोषण और तकलीफ़ों के शिकार दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, मज़दूर और बेसहारा लोग। अपनी समस्याओं के भार तले दबते लोगों पर कोड में खाज के रूप में कोरोना के दुष्प्रभाव।

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सब मिला कर देखा जाये तो लगता है, पूरी दुनिया एक बड़े परिवर्तन की दहलीज पर खड़ी है, पूंजीवादी व्यवस्था और उसके नीति निर्धारकों के अविवेकपूर्ण व दम्भ भरे निर्णय। जिनका परिणाम कोरोना से पहले भी और कोरोना के समय भी विफलता के रूप में सामने आया है।

निकट भविष्य में कोरोना के तत्काल बाद देश की सम्पति और संसाधनों की लूट तथा बंदरबांट होनी सुनिश्चित है। इस बात का अनुमान देश के वाणिज्य और औध्योगिक क्षेत्र के दो बड़े संगठनों एसोचैम (एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया) और फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री) द्वारा सरकार को संस्तुत मांगों से लगता है।

इन बड़े संगठनों द्वारा प्रस्तावित मांगों की बानगी देखें। इन मांगों को स्टिमुलस पैकेज कहा गया है और एसोचैम ने 12 से 18 महीनो के बीच में 16 से 24 लाख करोड़ रुपये स्टिमुलस पैकेज प्रस्तावित किया है। जीएसटी में 25 से 50% की कमी, आय कर और केपिटल गेन टेक्स में कमी, ऋण में 25% की ओटोमेटिक बढ़ोतरी के अतिरिक्त अन्य रियायतों, सुरक्षाओं और सुविधाओं की मांगें प्रस्तावित हैं। इसके अलावा फिक्की ने भी इसी तरह का पैकेज प्रस्तावित किया है। जिसमें 9 से 10 लाख करोड़ के स्टिमुलस पैकेज के साथ टेक्स व अन्य रियायतों की बात की गई है।

यहां ध्यान दिया जाये कि देश की अर्थव्यवस्था के अन्य घटक भी होते हैं जो कम महत्वपूर्ण नहीं होते। उसमें बहुत से मंझौले, लघु व सूक्षम उध्यम शामिल हैं। जो बहुत संख्या में श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध करवाते हैं। इस सब के अतिरिक्त भी ऐसे स्वरोजगार पैदा करने वाले असंख्य उध्यम भी हैं जो बिलकुल ही नष्ट हो चुके हैं। फिर कृषि क्षेत्र, सेवा क्षेत्र और अर्थव्यवस्था के बहुत से अन्य घटक, जिन में श्रम, जिसे वर्तमान की मशीनी पूंजीवादी व्यवस्था में सबसे अधिक अव्यवस्था और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है, को उबारना होगा। इस प्रकार यदि बड़े पूंजीपतियों की मांगें मान ली जाती हैं तो अन्यों की दशा कैसे सुधारी जाएगी, यह समझ से बाहर की बात है। इसके अतिरिक्त भी देश में थोक और परचून व्यापारियों की एक लंबी कड़ी है, जो उत्पादक और उपभोगता के बीच निरन्तर सक्रिय रूप से कार्यरत है। इन सब की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना एक बड़ी चुनौती होगी।

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यहां एक विशेष बात की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा और वह है, हाल में कोरोना के कारण बेरोजगार हुए उन गरीबों के लिए, जो देश भर के गांवों से शहर आकर विभिन्न काम करते थे, आधी अधूरी सहायता की घोषणा की गई थी। वे मजदूर अपना श्रम बेच कर एक तरफ तो अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते थे दूसरी ओर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का काम कर रहे थे और देश के विकास में योगदान दे रहे थे। कोरोना आया और अचानक सरकार ने लॉकडाउन घोषित कर दिया। पूरा देश थम गया, लाखों मजदूर बेकार हो गए। उन में अधिकतर ऐसे थे जो दिन में कमाते थे और रात को खाते थे। अब बेरोजगार हो गए तो भूखों मरने की नौबत आ गई।

इस तरह से उपजी समस्या से निबटने के उदेश्य से भारत सरकार ने उन गरीबों की मदद करने के लिए 1.70 लाख करोड़ रुपयों का पैकेज दिया। जिसकी चर्चा देश के मुख्य धारा मीडिया में कई दिनों तक चलती रही। लेकिन मजाल कि बड़े-2 मगरमच्छों को चारा के रूप में दी जाने वाली 25-35 लाख करोड़ जितनी बड़ी राशि का पता भी लगने दें। जब यह मदद घोषित की गई थी तब भी मैंने अपने स्टेट्स में लिखा था- ‘कोरोना …….लूट जरूर मचवायेगा, 1.70 लाख करोड़ भी सही हकदारों के बजाय कहीं और ही पहुंच जाएगा’, जो आज हो रहा है, ऐसा सुनने में आता है। ।