हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनावों के परिणाम जो 18 दिसंबर को आ चुके हैं। चुनाव के दौरान जो भी घटित हुआ उसके लिए ये चुनाव देश के प्रजातांत्रिक इतिहास में लंबे समय तक याद रखे जायेँगे। जैसा कि मैंने हिमाचल प्रदेश के चुनावों के दौरान लिखा था कि ये चुनाव भविष्य की राजनीति के संकेतक होंगे? चुनाव परिणामों ने स्पष्ट ऐसा इशारा कर दिया है। यह चुनाव आज से पहले के चुनावों से कई अर्थों में भिन्न रहे हैं। देश की राजनीति में दक्षिणपंथी एवं साम्प्रदायिक ताकतों की जीत का एक अटूट सिलसिला जो 2014 में लोकसभा चुनावों से शुरू हुआ, कमोबेश आज भी चल ही रहा था। कुछ छोटी हारों को छोड़ भाजपा बड़ी जीतें हासिल करती रही थी। देश में घोषित नफरत की राजनीति और कई बड़ी गलतियों के बावजूद उसका विजय रथ बढ़ता जा रहा था। इस बीच नोटबंदी की गई, लोगों को बड़ी तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा, वे नाराज़ भी हुए। उसके तत्काल बाद उत्तर प्रदेश के चुनाव हुए। जिस प्रदेश में भाजपा सहित देश की तमाम राष्ट्रीय पार्टियों को लंबे समय से सत्ता से बाहर ही नहीं अपितु लगभग हाशिये पर खड़ा कर दिया गया था। क्षेत्रीय शक्तियों समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के द्वारा राज्य में राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों के अस्तित्व तक को खतरे में डाल दिया गया था। उसी उत्तर प्रदेश में भाजपा बहुत बड़ी ताकत बन कर उभरी और उससे भी बड़ी बात, जीत हासिल करके न सिर्फ क्षेत्रीय पार्टियों को बल्कि पूरे विपक्ष को ही धराशाही कर दिया। मामला यहीं नहीं रुका अपितु उसने बिहार में भी अपने आप को सत्ता का हिस्सेदार बनाने में सफलता प्राप्त की।

‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के साथ सत्ता में आई पार्टी ने धीरे-2 अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। सुशासन का ढ़ोल पीटने वालों ने 2014 से लगातार ‘लव जिहाद’, ‘घर वापसी’, गौ रक्षा’ के नाम पर देश के अल्पसंख्यकों, दलितों और सीमांत लोगों का उत्पीड़न जारी रखा। इतना ही नहीं बल्कि उत्पीड़न की घटनाओं का वीडियो बना कर सोशल मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया को दिखाये जाने का रिवाज सा बना लिया गया और सरकारें इस पर न सिर्फ मौन दिखीं बल्कि समर्थन करती हुई दिखती रही। मुसलमानों का जीना मुश्किल कर दिया गया। यदा कदा गौ रक्षा, लव जिहाद के नाम पर मुसलमानों की पीट-2 कर बेरहमी से हत्या करने और उसकी वीडियो सोशल मीडिया में दिखाये जाते रहे। हैरानी की बात तो यह कि उन जघन्य कृत्यों को जन समर्थन भी मिलता रहा, जिसका नवीनतम उदाहरण राजस्थान के राजसमद का है जहां पर पश्चिम बंगाल के एक मुसलमान मजदूर अफराजुल को लव जेहाद के नाम पर बेरहमी से मार दिया गया और उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में बड़े पैमाने पर दिखाया गया। मजे की बात तो यह है कि कत्ल के उस मुजरिम की पत्नी के नाम पर देश भर से तीन लाख रुपयों का चंदा भेजा गया। ध्यान देने योग्य बात यह है इस मामले में अपराधी शंभू नाथ रेगर एक दलित (गैर जनेऊधारी हिन्दू) है। देश की साम्प्रदायिक शक्तियां दलितों व आदिवासियों को अल्पसंख्यक मुसलमानों के विरूद्ध खड़ा करने में अत्यन्त शातिराना तरीके से सफल हुई हैं।

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आज से एक वर्ष पहले यानि नवंबर, 2016 में कालेधन, नकली करेंसी तथा आतंकी फंडिंग की समस्याओं के समाधान के नाम पर नोटबंदी की गई। जिसके परिणामों के बारे में अभी तक सरकार द्वारा कोई संतुष्टि जनक उत्तर नहीं दिये गए। हां! ऊपर से खाज पर खुजली की तर्ज़ पर आर्थिक सुधार के नाम पर अध्यादेश के द्वारा जीएसटी को लागू किया गया। विकास के नाम पर सत्ता में आई पार्टी न सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भी बुरी तरह असफल रही। देश में बेरोजगारी बढ़ी, किसानों की ख़ुदकुशियां नहीं रुकी, महंगाई बढ़ती जा रही है, छोटे व्यापार धंधे और उद्योग बंद होते गए हैं। विकास के नाम पर गुजरात मॉडल, जो कारपोरेट, पूंजीपति और बड़े उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने वाला और जनसाधारण के हितों के विरोधी है, चलता रहा। गलत विदेश नीति के चलते अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में असफलताएं ही हाथ आई। पड़ोस के छोटे देशों में चीन का दखल और प्रभाव अधिक बढ़ा है। वह चाहे नेपाल, बंगलादेश, म्यनमार हो या फिर मालदीव सब चीन के अधिक निकट हो गए, पाकिस्तान तो पहले ही वहां था। हां! एक अस्थिर नेता और अविश्वसनीय देश के पीछे अवश्य पड़े रहे।

इस प्रकार की परिस्थितियों में एक बार फिर देश में हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनाव आ गए। अनुमान लगाया गया था कि देश की धर्मनिरपेक्ष एवं जनपक्षीय शक्तियां और राजनैतिक पार्टियां आपसी सामंजस्य और पूरे दमखम के साथ चुनाव में उतरेंगी और 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए इन दो प्रदेशों के चुनावों में भाग लेंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि 2017 के हिमाचल प्रदेश और विशेषकर गुजरात के चुनावों ने देश के लोकतान्त्रिक व्यवस्था के पुराने मानकों को तोड़ दिया और नये मानक गड़कर, नये कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इन चुनावों ने देश की राजनैतिक पार्टियों, उनके नेताओं, चुनाव से जुड़े संस्थानों और व्यक्तियों के चरित्र और प्रतिबद्धताओं पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए हैं।

चुनाव परिणामों के अनुसार मतदाताओं ने भाजपा को दोनों प्रदेशों में सत्ता सौंपी है। भले ही भाजपा, एक राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टी की जीत हुई है परन्तु देश और देश का प्रजातन्त्र हारता हुआ दिख रहा है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले देश के चुनाव आयोग ने अपनी प्रतिष्ठा को गिराया है और विश्वसनीयता को कम करवाया है। जिस चुनाव आयोग ने विश्व के दूसरे सबसे बड़े लोकतन्त्र के चुनावों को निष्पक्षता, निष्ठा एवं पारदर्शिता से सफलतापूर्वक निभा कर अपनी विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को स्थापित किया था, उसी आयोग को आलोचना झेलनी पड़ी। इस बात के प्रमाण तो तभी मिल गए थे जब चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनावों की घोषणा अलग-2 करने का निर्णय लिया था। जिसके परिणामस्वरूप हिमाचल प्रदेश के मतदाताओं के मत 9 नवंबर से 18 दिसंबर  तक इवीएम के मशीनी डब्बों में बंद पड़े रहे। देश की स्वायत संस्था और प्रजातन्त्र के सबसे बड़े रक्षक ने अपने ही स्थापित नियम को ताक पर रख कर, बड़े ही अविश्वसनीय और काल्पनिक कारणों के दावे से इन दोनों राज्यों के चुनावों की अलग-2 घोषणाएं की थी। जिसके लिए आयोग की हर तरफ आलोचना हुई थी।

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इस चुनाव ने, चुनाव प्रक्रिया की एक अन्य कमी को दिखाया है, जिसे ठीक किया जाना आवश्यक हो गया है। गुजरात चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के मतदान 14 दिसंबर की शाम को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दिये गए साक्षात्कार को चुनाव आयोग ने ‘मॉडल आचार संहिता’ के उल्लंघन के रूप में सही मानकर इस पर दायर आपति पर कार्यवाही की है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि सोशल मीडिया पर प्रचार मतदान के समाप्त होने के अंतिम क्षण तक भी जारी रहा। जो कि ‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट-1951’ की धारा 126 का साफ-2 उल्लंघन है। धारा 126 में किए प्रावधान का उद्देश्य यह है कि मतदाता को मतदान करने से पहले 48 घण्टे स्वतंत्र निर्णय लेने का समय मिल सके। यह 20वीं सदी के लिए तो काफी था, लेकिन आज के इस कम्पयूटर एवं संचार क्रांति के युग में यह नाकाफी साबित हो चुका है। आज सोशल मीडिया के चलते, राहुल गांधी पर कारवाई करने का चुनाव आयोग का निर्णय कितना सही है यह तो समय ही बताएगा। लेकिन यह तय है कि गुजरात के चुनावों ने चुनाव सुधारों की तत्कालिक आवश्यकता की ओर भी ध्यान दिलाया है। जिसमें ‘मॉडल आचार संहिता’ और ‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट-1951’ की धारा 126 भी शामिल है। धारा 126 के अंतर्गत मूलत: पब्लिक मीटिंग और जलूसों के आयोजन, उपस्थिति व सम्बोधन की मनाही थी। 1996 के बाद सिनेमा, टेलीविज़न और उसी तरह के अन्य उपकरणों के द्वारा चुनाव सामग्री का दिखाया जाना तथा मतदान से 48 घंटे पहले मतदाताओं को प्रभावित करने की मंशा से संगीत गोष्ठी या नाटय क्रियाओं या मनोरंजन कार्यक्रमों की मनाही भी सम्मिलित की गई।

इस चुनाव ने एक अन्य समस्या और उसके निदान की तरफ भी जोरदार तरीके से इशारा किया है और वह है कार्यपालिका के द्वारा चुनाव प्रक्रिया में सीधी और सीमा रहित भागीदारी। न सिर्फ सरकार के मंत्री अपितु प्रधानमंत्री तक सीधे तौर पर अपनी-2 पार्टियों के लिए प्रचार करते हैं। जिसका प्रभाव निश्चित तौर पर मतदाताओं के स्वतंत्र मतदान के निर्णय और विवेक पर पड़ता है। इसलिए कार्यपालिका के द्वारा चुनाव प्रक्रिया में चुनाव प्रचारक के रूप में भाग लेने पर रोक लगाई जानी चाहिए। इसका साफ उदाहरण इस चुनाव में प्रधानमंत्री द्वारा प्रचार करना विशेषकर ‘सी प्लेन’ का प्रदर्शन करना था। इसके अतिरिक्त चुनाव प्रचार में दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों और केंद्र सरकार के मंत्रियों और प्रधानमंत्री द्वारा सरकारी सुविधाओं का प्रयोग किया जाता है, इसका भी संज्ञान लिया जाना चाहिए और चुनाव सुधारों में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

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इन चुनावों ने यह भी दिखा दिया है कि देश की मुख्य राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों यानि भाजपा और कांग्रेस में कोई अंतर नहीं रह गया है। विचारधारा, सिद्धांतों और कार्यपालना में किसी भी तरह की भिन्नता नहीं रह गई है। एक पार्टी के नाराज़ और विद्रोही दूसरी पार्टी के टिकिटधारी बनकर अखाड़े में उतरे हुए होते हैं। इसके अतिरिक्त भी इस चुनावों में कांग्रेस का भाजपाईकरण तथा भाजपा का कांग्रेसीकरण की हद खत्म होती हुई भी साफ दिखी। इन चुनावों ने इन दोनों पार्टियों के चरित्र का पर्दाफाश कर दिया है। दक्षिणपंथी विचारधारा के उबार ने सीमा लांघी दी गई। चुनाव प्रचार विकास के नाम पर शुरू हुआ और जल्दी ही जनेऊ, मंदिर-मस्जिद, जाति, धर्म पर पहुंच गया। यहां तक कि गाली-गलौच तक पहुंच गया, व्यक्ति कहां तक गिर सकता है उसकी भी सीमा नहीं रही। ‘जनेऊधारी हिन्दू’ के माध्यम से देश को मनु काल तक पहुंचा दिया गया और किसी माईं के लाल ने इसे स्पष्ट करने का प्रयास तक नहीं किया। देश के प्रधानमंत्री ने प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री के पद की प्रतिष्ठा और मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाली भाषा का प्रयोग और व्यवहार का प्रदर्शन किया।

इन चुनावों, विशेषकर गुजरात के चुनाव ने यह भी साफ कर दिया, न तो मोदी जी उतने बड़े कद के नेता हैं और न ही राहुल जी उतने बड़े नेता बनने की कूबत रखते हैं, जितना कि मानने के लिए मजबूर किया जाता है। मोदी जी या भाजपा के जीतने का सबसे बड़ा कारण विपक्ष की कमजोरी और कांग्रेस की सत्ता के दौरान की असफलताएं और पथभ्रष्ट होना है, न कि मोदी की नेतृत्व क्षमता, लोकप्रियता और भाजपा की लोगों में स्वीकारिता है। गुजरात चुनाव में कांग्रेस के ‘मन्दिर मोह, जनेऊ मोह’ और उसके नेताओं द्वारा प्रयुक्त शब्दावलियों तथा भाजपा के सामने प्रचार क्षमता की कमजोरी ने खेल का पासा पलट दिया।