2017 में श्री राम नाथ कोविन्द जी देश के 14वें राष्ट्रपति बन गये। स्व. केआर नारायण सहित वे देश के दूसरे दलित हैं जो इस शिखर पद पर पहुंचे हैं। उन्हें बधाई। इस बार के इस चुनाव ने बरबस ही 2012 के राष्ट्रपति पद के चुनाव की याद दिला दी। तब स्व. पीए संगमा साहब भी चुनाव में एक प्रत्याशी थे। संगमा जी और कोविन्द में एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि संगमा जी जहां ‘अनुसूचित जनजाति’ से थे वहां कोविन्द जी ‘अनुसूचित जाति’ के हैं। स्व. संगमा जी अन्य हर मामले में कोविन्द जी से इक्कीस ही थे उन्नीस नहीं। फिर भी वह अपने लिए पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पाये थे। जबकि उन्होंने अपने आदिवासी या ‘अनुसूचित जनजाति’ से होने को मुख्य रूप से अपनी अपील में शामिल किया था। लेकिन वे हार गये। जब कि 2017 में कोविन्द जी और मीरा जी दोनों अनुसूचित जाति से संबद्ध थे। यानि देश के सत्तापक्ष के साथ-2 विपक्ष को भी दलित प्रत्याशी उतारना पड़ा।

यह इस बात का प्रमाण है कि बाबा साहब अम्बेडकर का मिशन सफलता की ओर निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इस ऐतिहासिक घटना ने अरावली उद्घोष में छपी श्री हजारी लाल मीणा की एक छोटी कविता की याद दिला दी।प्रस्तुत हैं कुछ पंक्तियां :

 

विकास का अन्तर

दलित
सामाजिक आधार पर
विकसित हो रहा है
और आदिवासी
व्यक्तिगत अवधारणा पर
विकास भोग रहा है
क्या अब भी जरूरी है बताना—–
कि सामाजिक विकास
समाज की थाती है
और व्यक्तिगत उन्नति
व्यक्ति के संग सिमट जाती है।

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हजारी लाल मीणा ‘राही’
साभार : अरावली उद्घोष।