ठोलंग गांव से हैं 15 आईएएस अधिकारी, चार साल में 300 युवा सेना में भर्ती, लाहौल-स्पिती में पहली बार हुई सेना भर्ती रैली।
ये हैं एक समाचार की मुख्य बातें जो कि लाहौल-स्पिती के विधायक के हवाले से लगाया गया था। सिर्फ रिकार्ड ही मत गिनाइये विधायक साहब, यह भी बताइये कि लाहौल-स्पिती में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षण संस्थानों, संचार एवं यातायात व्यवस्थाओं और बिजली-पानी का क्या हाल है….?
करोड़ों रुपये खर्च करके अस्पतालों की गगनचुंबी इमारतें खड़ी कर रखी हैं, लगभग हर गांव में स्कूल खोल रखे हैं, कई मोबाइल कंपनियों के ऊंचे-2 टावर शान से खड़े लोगों के मुंह चिढ़ा रहे हैं, हर साल नई बसों की खेप आ रही है। फिर भी लोगों को दांत उखाड़ने तक के लिए कुल्लू दौड़ना पड़ता है…? अधिकतर स्कूल लगभग खाली, लाहौ के अधिकतर बच्चे कुल्लू में पढ़ रहे हैं….? कुकुमसेरी लाहौल-स्पिती का एकमात्र कॉलेज की दुर्गति, गरीबों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करने का मौका खत्म…….? बिजली 15-15 दिनो तक नदारद….? पानी की व्यवस्था गांव के लोग अपने दमखम पर करते हैं…..? संचार, मोबाइल हफ्तों बंद….?
यातायात का तो कहना ही क्या? यातायात के नाम पर सर्दियों में बाहरी दुनियां से सम्पर्क के लिए एक मात्र सहारा है हेलीकाप्टर, इधर उसका भी पता ही नहीं चलता कि वह कब उड़ता है और कैसे? अधिकतर तो यह वीआईपी लोगों को ही उड़ाता है….? आज से बेहतर हेली सेवा तो आज से 30-35 साल पहले थी। जब यह सेवा एयरफोर्स के पास थी। वे बिना किसी नखरे के 32-40 आदमी उठा लेते थे और मौसम साफ होने की सूरत में नियमित सेवा देते थे। अब इसे शिमला के बाबुओं के हवाले कर दिया गया, सब उनके रहम-ओ-करम पर है। इस हेली सेवा के सवारियों की कितनी इज्जत होती है, उसकी बानगी, सुना है एक बार तो अति विशिष्ट व्यक्ति के लिए अंदर बैठी हुई सवारियों को उतार दिया गया था……? आए दिन समाचार पढ़ने को मिलते हैं ‘हेलीकाप्टर सेवा के न मिलने के कारण फलां मरीज की मौत हो गई, इतनी संख्या में परीक्षार्थी लाहौल-स्पिती में फंस गए, सरकारी कर्मचारी आर-पार फंसे हैं’।
इसी प्रकार का एक समाचार 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भी ‘गुजरात मॉडल की बात छोड़िये ठोलंग की बात करिये’ शीर्षक से छपा था। तब भी मैंने कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाए थे।
इस तरह के समाचारों में यह नहीं बताया जाता है कि इस रिकार्ड 15 आईएएस व 100 क्लास वन अफसरों वाले गांव की सामाजिक संरचना क्या है और इन का बंटवारा कैसा है? भारत के हर गांव की तरह इस गांव का समाज भी स्तरीकृत है या नहीं? यदि है तो कितनी जनसंख्या सवर्णों की है और कितनी दलितों की? इन 15 आईएएस में कितने उच्च जाति के हैं कितने दलितों के? यानि सामाजिक न्याय का बंटवारा क्या सही, उचित और तर्कसंगत ढंग से हुआ है? ये बातें भी विधायक महोदय को साफ करनी चाहिये। यह बात सिर्फ ठोलंग गांव पर ही नहीं तमाम लाहौल-स्पिती पर लागू होती है। इस क्षेत्र से बाहर के अपने पाठकों की सूचना एवं ज्ञान के लिए बता दूं कि यह ज़िला अनुसूचित क्षेत्र है और संविधान की पांचवीं अनुसूची में आता है। पूरे देश के अन्दर यह देखा गया है कि संविधान के सामाजिक न्याय का कार्यान्वयन सही ढंग से नहीं हुआ है। समर्थ और सक्षम लोगों ने संविधान प्रदत सुविधाओं एवं सुरक्षाओं को ऊपर-2 से लपक लिया है और असमर्थ व अक्षम अब भी प्रतिक्षारत हैं। ठोलंग गांव के अफसरों और आईएएस में सामाजिक, पारिवारिक और लैंगिक वितरण का विवरण भी दिया जाना चाहिए था। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जो उपलब्धियां हैं सब सामाजिक न्याय के नाम पर प्राप्त संवैधानिक सुविधाओं के चलते हो पाया है। इसलिए उपरोक्त समाज की सामाजिक संरचना जैसे प्रजातीय, जातीय और लैंगिक स्थितियों और सुविधाओं के वितरण का अनुपात देखा जाना भी विकास व प्रगति की आवश्यक शर्तें हैं और किसी मामले में गर्व करने के अनिवार्य घटक भी। इधर हम इस बात पर खुश हो रहे हैं कि लाहौल-स्पिती शिशु लिंग अनुपात में देश में प्रथम स्थान पर है, उसी लाहौल-स्पिती में महिलाएं क्या सिर्फ किसानी करने व कुछ छोटी-मोटी नौकरियों तक सीमित हैं या कि उन्हें समानता से आगे बढ़ने का अवसर दिया गया है?
इसके अतिरिक्त किसी भी उपलब्धि पर गर्व करने से पहले यह भी देखना आवश्यक होता है कि उस उपलब्धि से उस क्षेत्र या समाज को क्या और कितना लाभ पहुंचा है? अपनों के आगे बढ़ने और उन्नति करने पर गर्व होता है समाज को भी क्षेत्र को भी। इसका एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूंगा 2007 का वर्ष था ‘नाको’ किन्नौर, स्पिती के रास्ते में एक कठिन गांव, में बौद्ध कालचक्र का आयोजन किया गया। मुझे भी जाना हुआ, एक तो एक सेमिनार था, दूसरा उस वर्ष स्पिती में ‘लामा कांड’ हुआ था वहां के उच्च जातीय लोगों ने दलितों के लामा बनने गए 16 बच्चों को वापस बुलाने को मजबूर किया था, कारण दिया गया कि दलित लामा नहीं बन सकते। हम लोग वहां ‘दलाई लामा जी’ के पास इस फरयाद को लेकर गए थे। वहां जाकर देखा तो किन्नौर के अधिकतर आईएएस और अन्य अधिकारी उस आयोजन का प्रबंधन कर रहे थे। जिसमें और तो और एचसी नेगी जो मुंबई में इन्कम टेक्स कमिशनर थे भी आए हुए थे। इधर हिमाचल प्रदेश से पीएल नेगी, एससी नेगी और अन्य बहुत से अफसर। गांव राष्ट्र उच्च मार्ग से काफी ऊपर पड़ता है, लेकिन वहां तक चौड़ी सड़क बनवाई गई थी, नया गोम्पा बनवाया गया था। हेलीपेड बना था। बाहर से आने वालों के लिए गांव की अधिकतर ज़मीनों को क्षतिपूर्ति देकर उसमें टेंट डाले गए थे और बताया गया कि वे टेंट अंबाला से आए गये थे जिसके लिए लाखों रुपये का किराया दिया गया। बहुत ही भव्य आयोजन था, जिसमें पूरा योगदान किन्नौर के अफसरों का था और समस्त श्रेय भी उन्हीं को मिला।
विशेषकर लाहौल-स्पीति के युवाओं से कहना है लाहौल-स्पीति के इतिहास में बहुत से अवसर आए है, बहुत से व्यक्ति हुए हैं गर्व करने योग्य। एक उदाहरण हैं, ‘द्वितीय विश्व युद्ध’ में बहुत से शायद सैंकड़ों लाहौलियों द्वारा सुदूर अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका में ‘रंगरूट’ के रूप में हिस्सा लेना। जहां तक प्रश्न है व्यक्तित्व का तो एक खोजो तो दस मिल जायेंगे।
एक अन्य बात यदि खोदा जाए तो यहां देश के अन्य स्थानों से भी बड़े भ्रष्टाचार के मामले सामने आ सकते हैं। और तो और यहां आये दिन कोई न कोई पुल अपने ही वजन से गिर जाता है…..?
चुनाव से पहले इस प्रकार के प्रश्नों पर अवश्य विचार किया जाना चाहिए।
लाल चन्द ढिस्सा
(सामाजिक कार्यकर्ता)