3 अगस्त को संसद में विदेश नीति पर बोलते हुए भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज में ने वैसे तो मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़े मगर वो तारीफ वैसे ही थी जैसे शोले फिल्म में अमिताभ बच्चन ने अपने दोस्त वीरू अर्थात धमेन्द्र की तारीफ की थी। सुषमा स्वराज मोदी सरकार की तारीफ करती रही मोदी को नायक बताती रही मगर पूरी तारीफ का लब्बोलुबाब मोदी को नायक नही नालायक ही बताना था।

सबसे बड़ी बात जो उन्होंने कही कि जंग से कोई समस्या का समाधान नही होता और चीनी समस्या का जंग से नही बातचीत से समाधान निकलेगा। उनके भाषण का यही सार मोदी सरकार की अभी तक डोकलाम में की जा रही पूरी कसरत की हवा निकाल देता है। डोकलाम में जब जून में इस विवाद की शुरूआत हुई तो देश के पूरे वित्तमंत्री अधूरे और रक्षा मंत्री अरूण जेटली ने हुंकार भरी थी कि भारत अब 1962 वाला भारत नही है। मतलब साफ था कि चीन हमें अब 1962 की तरह कमजोर नही समझे। इसके अलावा देश की थल सेना के सेनापति जनरल रावत पिछले दिनों जब मीड़िया में नियमित बयानबाजी कर रहे थे और दुनिया को भारत की ताकत का भान करा रहे थे मानों कि वो देश की सेना के जनरल नही बल्कि देश के पूर्णकालिक रक्षा मंत्री हैं और उनकी आवाज में वहीं राजनीतिक अंदाज दिखाई भी पड़ रहा था। जान पड़ता था कि वो वी के सिंह को अपना आदर्श मानकर भविष्य उज्ज्वल कर रहे हैं। जनरल साहब ने कहा था कि भारतीय सेना ढ़ाई मोर्चों पर एक साथ लड़ सकती है। उनके बयान पर राजनीतिक विशेषज्ञ भी ढ़ाई मोर्चे के गणित में उलझकर रह गये थे। तभी ज्ञात हुआ की ढ़ाई अर्थात पाकिस्तान, चीन दो और आधा आतंकवाद। अरूण जेटली और जनरल रावत की वीर रस की बयानबाजी के बाद अब देश की विदेशमंत्री कह रही हैं कि जंग कोई समाधान नही है और बातचीत से समस्या का हल निकलेगा। यह तो मोदी-महावीरी का यूटर्न ही हो गया है। अब ढ़ाई मोर्चो पर दुश्मन को धूल चटाने वाली महावीरी क्या मुंह लेकर अपनी जनता के सामने जाएगी।

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दूसरी महत्वपूर्ण बात विदेश मंत्री ने आंकड़ों के साथ रखी वह थी चीन से व्यापार। पूरी भगवा बिग्रेड पिछले तीन सालों और उससे भी पहले से चीनी सामान के बहिष्कार की मुहिम छेड़े हुए है। दिपावली की लड़ियों से लेकर देवी, देवताओं, भगवान और कपड़े तक सभी चीजों के बहिष्कार की हुंकार गली मोहल्लों में भगवा बिग्रेड और भक्त करते घूमते हैं। परंतु गुरूवार को विदेश मंत्री ने देश को बताया कि 2014 में चीन के साथ हमारा 116 अरब का कारोबार था जो आज बढ़कर 160 अरब डालर पहुंच चुका है अर्थात शुद्ध 37 प्रतिशत की बढ़ोतरी। अब चीन को पानी पी पीकर कोसने की राजनीति का क्या होगा। चीन की अक्ल ठीक करने वाला युद्ध भी गया, जनरल रावत के ढ़ाई मोर्चे भी खामोश पड़ते दिख रहे हैं और महावीर मोदी हैं कि चीन के सामान से भारतीय बाजार को भरते ही जा रहे हैं। अब भक्तों और उनकी भगवा बिग्रेड को तय करना है कि यदि मोदी 2019 तक भी पद पर बने रहते हैं तो कम से कम इस व्यापार में 60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होगी और यदि चीनी राष्ट्रपति एक बार फिर आकर झूला झूल गये साबरमती किनारे तो हो सकता है यह व्यापार 2014 के मुकाबले दोगुना भी हो जाये। इससे ना जाने कितने भक्तों की दुकाने बंद होंगी।

ट्रंप के साथ मोदी की तुलना करके सबसे दिलचस्प और मोदी पर चोट करने वाला काम सुषमा स्वराज ने किया है। उन्होंने कहा कि मोदी ट्रंप का मुकाबला करने का माद्दा रखते हैं। असल में पूरी दुनिया जानती है कि ट्रंप एक हवाबाज और जुमलेबाज नेता हैं। अब सुषमा सीधे सीधे मोदी को जुमलेबाज तो कह नही सकती थी तो उन्होंने बेहद निपुणता से उन्हें वही कह दिया जो वह दिल से कहना चाहती थी। पूरी दुनिया जानती है कि ट्रंप अभी तक के अमेरिकी इतिहास के सबसे अलोकप्रिय और बदनाम नेता हैं। महिलाओं के खिलाफ वाहियात बयानबाजी हो अथवा मुसलमानों के खिलाफ बेतुके बयान देना और मीड़िया का अश्लील तरीके मजाक उड़ाना। ट्रंप जैसा बदनाम राष्ट्रपति अमेरिका के इतिहास में कोई दूसरा नही हुआ और उनकी बदनामी को तब और चार चांद लग गये जब मुसलमान देशों के नागरिकों पर रोक लगाने के उनके कार्यकारी आदेश को दो बार अमेरिकी न्यायपालिका ने डंप करके उन्हें आईना दिखा दिया कि वो क्या हैं। इसके अलावा उनकी पार्टी के बहुमत वाली संसद ने ओबामा केयर योजना पर रोक लगाने की उनकी मंशा को भी घूल चटा दी। अब अमेरिकी इतिहास के इतने अलोकप्रिय, बदनाम और नाकारा इंसान से तुलना करने की क्या तुक थी। सुषमा स्वराज अमेरिकी इतिहास के किन्ही बड़े नामों का सहारा ले सकती थी पिछले राष्ट्रपति ओबामा से उनकी तुलना कर सकती थी या दुनिया के सबसे ताकवर माने जाने वाले रूस के पुतिन से तुलना कर सकती थी। परंतु सुषमा ने वही किया जो वो करना चाहती थी। इस जय ने मोदी को वीरू बनाकर रख दिया। सुषमा बेहद सधे अंदाज में भाषण देने वाली भाषणबाज हैं और ऐसा नही है कि वो अपने भाषण के निहितार्थ समझती नही हों। इसीलिए वो मोदी को नायक, नायक कहती रही और उसका अर्थ नालायक, नालायक निकलता रहा।

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महेश राठी

(वरिष्ठ पत्रकार)