28.6.2017 ने आज से पंद्रह साल पहले 23.8.2002 की घटना की याद ताज़ा करवा दी। कारण था कल लाहौल के गांव हिन्सा में मेरे ससुर स्व. श्री गरीबदास काश्वीय जी की याद में दिया जाने वाला अंतिम भोज (सामो)। जो कायदे के अनुसार व्यक्ति के मर जाने के एक साल के अंदर-2 कर दिया जाना चाहिए। एक वर्ष की समय सीमा निर्धारित करने का कारण भी शायद उस समय की व्याप्त निर्धनता ही रही होगी, जब इस प्रकार के रिवाज बनाए गए होंगे। शुरू में इस रिवाज का स्वरूप क्या रहा होगा, यह तो ज्ञात नहीं, लेकिन मैंने जो देखा वह था घर का कोई वयस्क मर जाता था तो उसका अंतिम क्रियाकर्म यानि उसके शरीर को जला देने के बाद दूसरे दिन ‘मास्वरा’ नामक एक भोज देते थे जिसमें भूने हुए थंगज़त (नंगे जौ) ऐसे जौ जिनका छिलका नहीं होता, के आटे (सत्तू) को घोल कर उसके गोले बनाते थे, परोसे जाते थे। उसके बाद ‘सामो’ नाम का यह कार्यक्रम अपनी हैसियत अनुसार किया जाता था।
इस अवसर पर परिवार के रिश्तेदारों को बुलाया जाता है। कार्यक्रम लगातार चार दिन चलता है। पहले दिन गांव के अपने समुदाय के लोगों के हर घर से कम से कम एक व्यक्ति आता है और खाने-पीने की वस्तुएं पकाई, तली जाती हैं। जिनमें मरछू (पूरियां), ‘लंका’ (सत्तू के गोले) बनाना तथा ‘चकथि’ एक स्थानीय नशीला पेय, जो काफी समय से फर्मटेशन के लिए रखा होता है आदि तैयार किए जाते हैं। दूसरे दिन ‘एरांहि’ (शाब्दिक अर्थ दिन का खाना) उस दिन मृतक के दूसरी और तीसरी पीढ़ी के रिश्तेदार और अन्य वर्तनदारी के अनुसार नंगे जौ या गंदम के भूने दाने (अब तो मूंगफली आदि) लाकर आए हुए लोगों में बांटते हैं। ध्यान दें कि इसी दिन रिश्तेदारों का आना शुरू होता है। तीसरे दिन ‘सामो’ जिसमें दिन का खाना दिया जाता है जो मृतक के घर की तरफ से होता है। जिस में अपनी-2 हेसीयत या कहें दिखाबे की ताकत के हिसाब से मीट/मुर्गा, दाल-भात, सब्जियां आदि-2 परोसी जाती हैं। उसके अतिरिक्त सुबह का नाश्ता जिसमें हलवा, पूरी, चाय आदि का प्रबन्ध होता है। सारा दिन ‘चकथि, शराब (स्थानीय देसी, अंग्रेज़ी तथा बीयर)’ भी भरपूर दी जाती है। इसके अलावा चाय, ठंडे पेय (आज तो ड्यू आदि) भी चलाये जाते हैं। यह सब आज का सीन है, खूब ड्रामेबाजी और दिखावा किया जाता है। लेकिन मुझे याद है, उस समय मामला इतना पेचीदा नहीं था। लोग गरीब थे और ‘सामो’ की तैयारी में ही साल भर लगा देते थे। फिर रिश्तेदार वर्तनदारी के नाम पर तय मात्रा में नंगे जौ लाते थे तब कहीं अंतिम तर्पण भोज हो पाता था। जिसमें सत्तू के गोले मृतक के घर की और से तथा ‘मरछू’ (पूरियां) मृतक के सगी महिला रिश्तेदारों (बहनें, बेटियां आदि) की ओर से दिये जाते थे, जिसे ‘शिमरछु’ कहते थे। हां! कहीं-2 मृतक के घर से ‘खुरवा’ के नाम से भी मरछू दिये जाते थे। अंत में चौथा दिन ‘सिलसुद’ का आता था, उस दिन रह गए मेहमानों या रिश्तेदारों को सुबह का खाना दिया जाता था और फिर गांव वाले प्रयोग किए गए वर्तनों की सफाई आदि के काम को निपटा कर रात को जाकर निवृत होते थे। इस प्रकार इस प्रकरण या रिवाज को निभाने में पूरे चार दिन का समय लग जाता है।
जैसे देश के अन्य भागों में प्रचलित है, लाहौल के गांवों में भी जन्माधारित जातीय विभेद के चलते गांव मेँ होने वाले इस कार्य के अतिरिक्त हर समारोहों या कार्यों के दौरान सवर्ण एवं अवर्ण जातियों के बीच भी लेन-देन की एक तय प्रक्रिया होती है। सवर्ण के घर पर कोई कार्य या समारोह हो तो वहां अवर्ण जाता है और उसे बहुत दूर बिठाकर खाना-पीना दिया जाता, जब कि वह (अवर्ण) अपनी तरफ से वर्तनदारी पूरी तरह निभाता है। दुसरी ओर इस प्रकार के कार्य या समारोह यदि दलित के घर में हों तो उच्च जाति के लोगों को उनका खाने-पीने का हिस्सा अलग सा, उन्हीं में से किसी के घर दिया जाता है और वहां उनकी अच्छे से व्यवस्था की जाती थी।
हां! मैं कह रहा था 28.8.2002 की याद आ गई। उस दिन मैंने अपने पिता जी की मृत्यु के बाद इसी ‘सामो’ की रस्म को निभाया था। पिता जी को फेफड़े का केंसर हो गया था और उन्होंने छोटे भाई के पास दिल्ली में ही अंतिम सांस ली। मैं कुल्लू से गया और तब तक उनका दाह संस्कार कर दिया गया था। तीसरे दिन हम लोग वापस कुल्लू की तरफ आने लगे। साथ में माता जी, छोटी बहन, एक चाचा जी तथा छोटा भाई भी था। दिल्ली में ही माता जी आदि द्वारा कहा गया कि पिता जी के अस्तुओं को हरिद्वार और लाहौल के संगम पर विसर्जित किया जाना है। मैंने इस पर आपति जताई और चाचा जी के दखल के बाद कहीं बात लाइन पर आई और तय हुआ कि उनके अस्तु को ब्यास में प्रवाहित किया जाये, क्योंकि पिताजी अपने अंतिम दिनों में सतसंगी बन गए थे। हम सब लोग अमृतसर के निकट स्थित ब्यास (सतसंग) में अस्तु प्रवाहित कर कुल्लू आ गए। यहां पर कुछ दिनों बाद पता चला कि मेरी छोटी बहन ने पिता जी के नाम पर तेरहवीं या कोई अन्य संस्कार निभाया, यद्यपि स्थापित मान्यताओं के अनुसार भी और तर्क की दृष्टि से भी यह कार्य सिर्फ मृतक के घर में ही होता है और होना चाहिए। खैर! बहन ने जो करना था कर दिया और मैंने अपने को आहत महसूस किया, वह एक अलग विषय है।
अब बात आई पिताजी की याद में दिया जाने वाले भोज की। अब क्योंकि मैं अपने परिवार सहित अपने पैतृक घर, गांव जाहलमा (लाहौल) से बाहर कुल्लू में रहता था और गर्मियों में गांव में श्रीमति जी को मदद करने जाता था। तय हुआ ‘सामो’ अगस्त के महीने में किया जाये क्योंकि वह एक ऐसा समय होता है जब लाहौल में लोग खेतीबाड़ी के कामों से कुछ हल्की राहत में होते हैं। 28.8.2002 का दिन तय किया गया। अब जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि इस पूरे कार्यक्रम में चार दिन का समय लगता है, इतना भारी दिखावा और सामाजिक असमानता के भाव आदि सबको लेकर मेरे मन में रोष भी था और इस पुरानी परंपरा को बदलने की इच्छा भी।
इसलिए मैंने बिना किसी के परामर्श के अपने आप निर्णय लिये कि
(1) इस चार दिन की बर्बादी से बचा जाये। आज के कम्पयूटर युग में चार दिन का समय बहुत कीमत रखता है। इसलिए इन चार दिनों को काट कर सिर्फ एक दिन कर दिया और कार्यक्रम एस बनाया कि लोग सुबह आयेँ चाय-नाश्ता करें। दिन को सादा शाकाहारी भोजन जिसमें अनिवार्य वस्तुओं को छोड़कर सब अपना उत्पाद, दिया जाये और शाम तक वर्तन आदि साफ करके निवृत हुआ जाये।
(2) सवर्णों के लिए अलग व्यवस्था को खत्म किया जाये और उनके साथ समान का व्यवहार हो। उनमें जो इस रस्म में आना चाहें उनका स्वागत किया जाये और जो नहीं आना चाहें तो भविष्य में उनके साथ मेरा भी लेन-देन खत्म माना जाये।
(3) लाहौल की संस्कृति में हर अवसर पर चकथि, शराब (अब तो अंग्रेजी तथा बीयर) भी एक अनिवार्यता समझा जाता है, परोसने पर भी क्षमा याचना की गई। ताकि इससे भी बचा जा सके।
(4) वर्तनदारी से भी क्षमा याचना की गई थी। इसके पीछे सोच थी कि आज के युग में हर कार्य में औपचारिकता आ गई है और दिखावे का रिवाज बढ़ गया है। इसलिए कई बार तो लोग सिर्फ उस वर्तन को वापस देने के लिए आते हैं। इस वर्तनदारी के पीछे शायद सोच यही रही हो कि उस समय के मांग के अनुसार उस कार्य के लिए सहयोग की भावना। जिसका रूप आज विकृत हो चुका था। उस समय एक नियत मात्रा का सहयोग होता था और हर सेठ-गरीब बराबर का हिस्सेदार। लेकिन आज यह वर्तनदारी वस्तु न होकर मुद्रा हो गई है और बराबरी का न होकर लोग अपनी हेसीयत बताने का प्रयास कर रहे हैं। उस निर्णय के पीछे एक अन्य कारण था मेरा लाहौल से बाहर रहना और आमतौर पर इस प्रकार के हर एक मौके पर न पहुंच पाना। इसलिए इस वर्तनदारी को तोड़ दिया गया था और नये तरीके से बरत सकूँ।
(5) किसी प्रकार के धार्मिक पचड़े में न पड़कर सीधा कार्यक्रम रखा गया था। जहां मेहमानों को बिठाया जाना था उस कमरे में एक कौने पर एक टेबल पर पिताजी की फोटो, कुछ फूल, अगरबती माचिस रख दी गई थी, साथ में कबीर के दोहे का ऑडियो चलाया गया था। बिना किसी कर्मकांडी उलझन के एक सीधे कार्यक्रम की शुरुआत।
(6) अंत में इस अवसर पर लोगों को आमंत्रित करने के लिए कार्ड का प्रयोग किया जाना। जो कि सफ़ेद रंग के कार्ड पर काली सिहाई से प्रिंट था। उस कार्ड के प्रयोग पर भी लोगों ने विरोध प्रकट किया, क्योंकि अभी तक उस क्षेत्र में विवाह के निमंत्रण के लिए भी कार्ड का प्रयोग शुरू नहीं हुआ था। उपरोक्त समस्त निर्णयों पर मेरे समुदाय के लोगों तथा अन्यों ने खूब से चर्चा की और हर तरह मुझे गलत साबित करने और मेरे इस कार्य को असफल बनाने के प्रयास किए गए। हर गांव में इस प्रकार की नई, पहली व लीक से हटने की बात को परम्पराओं के विरुद्ध जाने की बात कह कर इसका विरोध किया गया।
नियत 23.8.2002 का दिन आ गया। मैंने कुछ युवाओं को लेकर नाश्ता, खाना आदि बनाने का कार्य शुरू करवा दिया। 11 बजे अपरान्ह तक एक भी रिश्तेदार नहीं पहुंचा तो पत्नी को चिन्ता होने लगी और मेरे पास आकर शिकायत भरे लहज़े में अपनी बात रखी। मैंने जवाब दिया कि अव्वल तो हमारे सब रिश्तेदार आएंगे यदि न भी आ पाये तो निकट ही दुमका (झारखंड) के मजदूरों का डेरा था, जिसमेँ 200 के करीब मज़दूर थे, उन्हें खिला दिया जाएगा। खैर! एक बजते-2 लगभग सब बुलाये गए मेहमान आ गए। खाना-पीना खाकर शाम के 5 बजे तक वर्तन आदि साफ करके सब लोग यहां तक कि गांव वाले भी अपने-2 घरों को चले गए।
मेरे निर्णय और पहल आशा से बढ़ सफल हुई। उस पहल के पीछे जो सोच थी और जो उद्देशीय निर्धारित किए गए थे, समस्त सफलता से प्राप्त कर लिए गये। भले ही मेरे लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया, विशेषकर बाबुओं ने। इसमें उनका दोष नहीं है, क्योंकि अभी तो उन्हें एक संदर्भ रेखा और पार करनी है। जो उनके हर प्रकार के विकास के सामने एक अवरोध बने खड़ा है। और वह है उनका सवर्ण बनने का सपना, जो मिथक है, एक मृगतृष्णा भर है। लेकिन उनको उसके पीछे दौड़ना है……..?
लेकिन यह एक समय से बहुत पहले उठाया गया कदम था, शायद ? जो लोगों की समझ में नहीं आ पाया, कुछ उसे पचा नहीं पाये तो कुछ को उसके विरोध के लिए विरोध करना था। समय निकल गया, उसके कुछ महीनों के बाद मेरे ही गांव में मेरे एक संबंधी, जो कि सरकारी सेवा में थे और अत्यंत जुगाड़ू होने के कारण चर्चित भी, के पिता जी का सामो किया गया, लेकिन उसमें वही पुराना ढर्रा अपनाया गया, चार दिन की बर्बादी, सवर्णों की अलग व्यवस्था, शराब, वर्तनदारी आदि-2। मेरे लोगों ने तो मेरी पहल को नकार दिया, लेकिन उसके पांच साल बाद निकट के गांव में जो सिर्फ सवर्णों का गांव है और क्षेत्र में प्रगतिशील गांव के रूप में प्रसिद्ध है, ने मेरी परिपाटी को अपनाया।
हां! उस समय मैं एक मासिक पत्रिका सद्प्रयास निकाला करता था, उस पत्रिका के लिए गांव के एक बुद्धिजीवी ठाकुर शमशेर ने मेरे उस कार्य पर लिखा था कि इस कार्य को विद्रोह न समझ कर नवीनता की तरफ एक कदम के रूप में देखा जाना चाहिए।
कल (28.6.2017) को मेरे ससुर साहब का सामो भी पूरी तरह मेरी तरह तो नहीं लेकिन उस लाइन पर ही सम्पन्न किया गया। अच्छा लगता है, की गई पहलें कभी न कभी तो जमीन पर उगती ही हैं और एक पेड़ बनती हैं। लेकिन उस पेड़ को भी गिरना होता है और गिरना भी चाहिए ताकि उस जगह नया पेड़ उग सके।