‘कलम की ताकत से तलवार की ताकत से अधिक है’, ‘पेन इज़ मईटियर देन द स्वोर्ड’ जैसे कलम व लेखन की प्रशंसा के लिए प्रयुक्त कहावतें और लोकोक्तियां सुनाई देना बन्द हो जायेँगी। जब कलम या पेन का प्रयोग ही बन्द हो जाएगा तो कौन किसकी तारीफ करेगा? उससे भी बढ़ कर सुलेख या खूबसूरत लिखावट तो सिर्फ पुस्तकों और रिकार्ड का मामला भर रह जायेगा। आज के इस इलेक्ट्रानिक व कंप्यूटर, सोशल मीडिया तथा आइपेड़ के युग में हाथ से लिखने का रिवाज़ ही खत्म होता जा रहा है। संचार माध्यमों, संदेशों के लेन देन, रिकार्ड, प्रलेखन व संरक्षण में हर स्थान पर टंकण कला का ही प्रयोग हो रहा है हस्तलेखन कला तेजी से पीछे छूट रही है। लोगों ने हाथों से लिखना ही छोड़ दिया है, वे पेन सिर्फ तब पकड़ते हैं जब उन्हें कहीं हस्ताक्षर करने होते हैं। विद्यार्थी सिर्फ परीक्षा में उत्तर लिखने के लिए पेन का प्रयोग व हाथों से लिखते हैं। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब लेख, सुलेख व लिखने की कला लुप्त हो जाएगी और सिर्फ टाइप व स्पीड रह जायेगी…..।

एक समय था जब स्कूलों में सुलेख पर बहुत ध्यान दिया जाता था। कई अध्यापक तो सबसे अधिक ध्यान सुलेख पर ही देते थे। विशेषकर प्राईमरी वर्ग की पांच कक्षाओं में तो सुलेख पाठ्यक्रम का  एक आवश्यक हिस्सा होता था। हर विद्यार्थी की लिखाई सुन्दर हो उसके लिए एक टिकाऊ व्यवस्था भी की गई थी। प्रत्येक विद्यार्थी के पास लकड़ी से बनी एक तख्ती होती थी। जो कभी-2 तो दो-2 पीढ़ी तक काम में लाई जाती थी। जिसकी बनावट आयताकार होती थी और सुविधा के लिए उसके चौड़ाई वाले एक किनारे पर पकड़ने के लिए दस्ता बनाया गया होता था। हर रोज शाम को घर जाकर तख्ती को धोना होता था और गीले में उस पर मिट्टी का लेप किया जाता था। उस मिट्टी को गाजिणी या गच्चि कहते थे। पीले रंग की मिट्टी को बहुत अच्छा समझते थे। फिर उसको सुखाने की प्रक्रिया में उसे हवा देते थे और मुंह से गाने की तरह लय में बोलते थे ‘सुक-सुक पट्टिये…’ तख्ती सुखाने के बाद पेंसिल (सिक्का) से उस पर लाइने लगाई जाती थी। एक तरफ सिर्फ लंबाई में और दूसरी तरफ लंबाई-चौड़ाई में आपस में एक दूसरी को काटती हुई लाइनें। एक तरफ लाइन वाले पहलू पर सुलेख लिखते थे और लंबाई और चौड़ाई में काटती हुई लाइनों से 100 आयताकार खाने बनाए जाते थे जिस पर 1 से 100 तक गिनती या आंकड़े लिखे जाते थे। सुलेख वाले हिस्से को गुरु जी जब चेक करते थे तो मेरे जैसे गन्दे लेख वाले को डंडे खाने पड़ते थे। मेरी कक्षाओं में भी ऐसे सहपाठी रहे हैं जिनका लिखना अति सुंदर होता था। ऐसा लगता था जैसे तख्ती पर मोतियों की माला बना दी गई हो। मास्टर जी उनकी खूब तारीफ करते थे और मेरे जैसे उनसे ईर्ष्या करते थे।

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अब सब कुछ बादल चुका है। न वह तख्ती है, न वे गुरु, न वे शिष्य, न वह परिपाटी, न वह सुलेख और न वह सुलेख की तारीफ। बात यहीं तक नहीं सीमित नहीं होती थी बल्कि परीक्षा के बाद भी जब परिणाम तैयार होता था, उस समय भी सुलेख को पुरस्कृत किया जाता था। कुछ नंबर सुलेख के लिए अलग निर्धारित रहते थे और सुंदर लिखावट वालों को खुश होकर दिये जाते थे। इस विषय में मुझ सा सदा ही नुकसान में रहता रहा।

ध्यान देना होगा कि अच्छा लिखना या सुघड़ अक्षर बनाना हर एक के वश की बात नहीं होती है। यह भी अन्य कलाओं की भांति एक कला है, जो किसी-2 के अंदर होती है। इसे एक प्राकृतिक देन कह सकते हैं। यह ठीक है कि इसे कुछ हद तक सुधारा अवश्य जा सकता है, यह नहीं कि हर व्यक्ति समान रूप में अच्छे अक्षर उकेरने की योग्यता रखता है। लेकिन आज के इस विकसित युग में इस कला के सामने अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है। अन्य कलाएं जो विलुप्त हो चुकी हैं या विलुप्ति के कगार पर हैं, उन्हीं की तरह यह कला भी विलुप्त होने जा रही है।

समाचारों की माने तो केम्ब्रिज विश्वविद्यालय गन्दे लिखावट के चलते परीक्षाओं में हस्तलेखन बन्द करने जा रहा है। परीक्षाओं में उत्तर पुस्तिकाओं को हाथ से लिखने का इतिहास 800 वर्ष पुराना है। इतनी पुरानी परिपाटी को खत्म किए जाने का कारण विद्यार्थियों में लेपटॉप के प्रयोग का बढ़ता प्रचलन है। विश्व विद्यालय का कहना है कि 15-20 साल पहले तक विद्यार्थी हर रोज कई घंटे हाथ से लिखते थे। लेकिन अब वे परीक्षाओं में उत्तर लिखने के अतिरिक्त वास्तव में हाथ से कुछ लिखते ही नहीं। कुछ हस्तलेख विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि इस प्रकार तो हाथ से लिखना ही बन्द हो जाएगा और यह एक ‘राइटिंग नोस्टालजिया’ हो जाएगा। इसलिए विश्व विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों को चाहिए कि वे विद्यार्थियों को अधिक से अधिक हाथों से लिखने के लिए प्रोत्साहित करें और कम से कम क्लासरूम नोट्स के मामले में तो यह होना ही चाहिए।

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ल. च. ढिस्सा

सामाजिक कार्यकर्ता