20 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय के अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को कमजोर करने वाला निर्णय आने के बाद, 2 अप्रैल का दलितों की अपील पर भारत बंद (जिसमें सात जाने भी गई) की प्रतिक्रिया में आरक्षण के विरोध में भारत बंद। तीन मंत्रियों एवं भाजपा के पांच दलित सांसदों तक ने प्रधानमंत्री से नाराजगी जताई। जिस पर आज तक भी समाचार पत्रों तथा अन्य स्थानों पर लिखा-पढ़ा व सुना जा रहा है और चर्चा हो ही रही है। 19 अप्रैल की ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में फैज़ान मुस्तफ़ा, वाईस चांसलर, नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद ने अपने एक लेख में लिखा है कि सर्वोच्च न्यायालय के, कमजोर वर्गों के हितों को प्रतिकूल प्रभावित करने वाले निर्णय के विरुद्ध केंद्र सरकार को ‘अध्यादेश’ जारी करना चाहिए। जिसके लिए उन्होंने कई वैधानिक तर्क दिये हैं। साथ में यह भी लिखा है कि संसद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को बदल सकती है।

इसके साथ ही चारों तरफ से आलोचना से घिरी सरकार, जिसे इस निर्णय के राजनैतिक परिणामों के बारे में भी चिंता है, ने फैसले पर पुनर्विचार के लिए अपील दाखिल कर दी है। अपील के दो आधार दिये गए हैं पहला सरकार का मानना है कि फैसले ने समाज में बहुत असामंजस्य की स्थिति पैदा की हैं और दूसरा निर्णय में ‘शक्ति के बंटवारे’ के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है।

इसके अलावा भी कुछ राज्य सरकारों ने भी अपने-2 राज्यों में इस निर्णय पर अमल न करने के सरकारी आदेश भी जारी कर दिये हैं और साथ ही फैसले पर पुनर्विचार के लिए अपील भी कर दी है। जिसमें केरल सरकार भी शामिल है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आश्वासन दिया है कि उक्त कानून को कमजोर होने नहीं दिया जाएगा। जिसका बड़ा कारण तो यह था कि यह समझा जा रहा था कि मोदी सरकार दलित विरोधी है।

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वैसे भी सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला इसलिए भी उचित नहीं था क्योंकि देश ही नहीं दुनियां के अंदर में भी जितने भी कानून हैं। सबका किसी न किसी हद तक दुरुपयोग तो हुआ ही होता है। अपने देश में ही संविधान, भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) तथा अनेकों अन्य विशेष अधिनियमों का दुरुपयोग समय-2 पर होता ही रहा है और होता है। तो सिर्फ इस अधिनियम को कमजोर करने की आवश्यकता क्यों? इस देश में तो संविधान के प्रावधानों का भी मनचाहा प्रयोग या धुर दुरुपयोग हुआ है। जिसके चलते आज तक संविधान में सौ से अधिक  संशोधन करने पड़े। संविधान के प्रावधानों के दुरुपयोग की बानगी देखनी हो तो मेरी पुस्तक ‘संविधान के सामाजिक अन्याय’ को अवश्य पढ़ें। पुस्तक में यह बताया गया है कि किस तरह एक ही व्यक्ति को एक ही समय में एक ही  स्थान पर तीन-2 संवैधानिक प्रस्थितियां प्राप्त हैं, वह भी अवैधानिक तरीके से।

इस फैसले की व्यापक आलोचना भी हुई और प्रतिक्रिया स्वरूप विरोध प्रदर्शन भी हुए। 2 अप्रैल के दलितों की अपील पर भारत बंद पर मैंने भी लिखा था जिसके अंश दे रहा हूं। “आज मालूम हो गया है कि बाबा साहब अम्बेडकर देश को जगा गए हैं। एक बार फिर अम्बेडकर के सिपाहियों को जिंदावाद के नारे के साथ– याद करें संविधान सभा में दिया गया 1949 का बाबा साहब का वक्तव्य, जिसमें उन्होंने कहा था-‘‘26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हमें समानता होगी और सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में हमें असमानता मिलेगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट एवं एक मूल्य के सिद्धांत को स्वीकार करेंगे। सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में हम अपने सामाजिक तथा आर्थिक ढांचे के कारण एक व्यक्ति, एक मूल्य के सिद्धांत को अस्वीकार करते जायेँगे। हम कब तक अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता को अस्वीकार करेंगे? यदि हम एक लंबे समय तक इसे अस्वीकार करेंगे तो हम अपने राजनीतिक लोकतन्त्र को जोखिम में डाल कर ही ऐसा करते रहेंगे। हमें अवश्य ही जल्द से जल्द इस अंतर्विरोध को दूर करना चाहिए अन्यथा जो इस असमानता से पीड़ित हैं, वे राजनीतिक लोकतन्त्र के ढांचे को उड़ा देंगे जिसे संविधान सभा ने इतनी मेहनत से निर्मित किया है।’’

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इस फैसले का बड़े स्तर पर विरोध हुआ, कई कारणों से। फैज़ान मुस्तफा जैसे कानून और संविधान के ज्ञाता तक ने इसे अनुचित माना है। लेकिन मेरे क्षेत्र के पूर्व विधायक, जिसे ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग’ का उपाध्यक्ष भी बनाया गया था, ने नसीहत दी कि कोर्ट का फैसला ठीक है। उक्त फैसले पर सिर्फ उनकी व्याख्या सबसे अलग और निराली थी। वह सही भी थे क्योंकि वह स्वयं ठाकुर हैं और स्वतन्त्रता पूर्व लाहौल के जागीरदार परिवार से हैं इस लिए उन पर अत्याचार होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, तो भला उन्हें क्या पता कि ‘जातीय’ अत्याचार होता क्यों और क्या है? वैसे भी अनुसूचित क्षेत्रों में यह अधिनियम लागू भी नहीं होता। ठाकुर साहब जैसे लोगों के लिये दलित सिर्फ ‘वोटर’ हैं और उनकी याद सिर्फ चुनाव के समय ही आती है। वैसे भी क्षेत्र में उनका आना जाना तो बतौर ‘कारपोरेटर’ या ‘पर्यटक’ ही होता है।

4 अप्रेल के अमर उजाला में छपे समाचार के अनुसार उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक्ट में बड़ा बदलाव नहीं किया है। राजनैतिक दल आरक्षित वर्ग के लोगों को उकसा कर दंगे करवा रहे हैं। सवाल यहां यह है क्या कांग्रेस पार्टी का मत भी यही है? दूसरा, उनका कहना है कि जनता को पहले न्यायालय के आदेश की मूल भावना को समझना चाहिए। इस तरह के वक्तव्य देने से पहले उन्हें मालूम कर लेना चाहिए था कि देश के कितने विशेष एक्ट ऐसे हैं जिनके अन्तर्गत एफआईआर से पहले जांच करने का प्रावधान है?

ठाकुर साहब सही फरमाते हैं, उनके लिए तो इस एक्ट का होना न होना बराबर है क्यों कि उन्हें ‘दलितों एवं आदिवासियों’ की इस प्रकार की तकलीफ़ों से दो चार होना नहीं पड़ता। वे तो मुफ्त में एक नहीं कई-2 फायदे उठाते हैं। उनकी अपनी कई ‘प्रस्थितियां’ हैं, जैसे ‘ठाकुर’, ‘अनुसूचित जनजाति’ और बौद्ध होने के कारण ‘अल्पसंख्यक’ भी।

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