कोरोना और उसका उत्पाद लॉकडाउन कुछ कभी न मिटने वाली यादें छोड़ जायेगा। लगभग 45 सालों में पहली बार लगातार 33 दिनों तक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ नहीं पढ़ पाया। कल 34वें दिन जाकर उसके दर्शन हुए। 1975 के करीब से रिश्ता जुड़ा था इस बेहतरीन अखबार से। यहां तक कि इसका और मेरा साथ मेरे जीवन संघर्ष के लिए दी गई प्रतियोगिताओं की तैयारियों के समय भी जुड़ा रहा। 1979 की सिविल सेवा में सफलता के लिए इस की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। क्योंकि मेरे जैसे कमजोर सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति के लिए मंहगे कोचिंग सेंटर से दिशानिर्देश ले पाना संभव नहीं था। इस लिए इस तरह के सस्ते सूचना साधनों का महत्व काफी रहता है।

इस अखबार ने 1975-77 के आपातकाल के दौरान जब अधिकतर मीडिया रेंग रहा था  उस समय भी इस ने अपनी अलग पहचान बनाए रखी, जो आज तक बरकरार है। आज के इस अंधे युग में टीवी के समाचार चेनलों और पत्रकारों में एनडीटीवी और रवीश का मेरे लिए जो महत्व है वही महत्व ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ का है। एक अटूट विश्वास कायम किया है इस अखबार ने। मैं इसकी हर खबर, संपादकीय और लेख की कद्र करता हूं। इस पेपर ने पत्रकारिता के सिद्धांतों और मूल्यों को आज तक भी एक सीमा तक बनाए रखा है।

मार्च 22 के दिन को ‘जनता कर्फ़्यू’ के रूप में मनाया गया और शाम को तालियां पीटी गईं, थालियां बजाई गईं। 25 मार्च से तालाबंदी व लॉकडाउन शुरू हो गया। मैं कुल्लू कस्बे से 6 किमी दूर गांव बाशिंग में रहता हूं। गांव में अभी तक आधारभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। अखबार तो क्या मुझे स्वयं को अंदर बंद कर दिया गया। 33 दिन तक टीवी के अतिरिक्त समाचार का कोई साधन नहीं था।

You May Also Like  जानिये “सद्प्रयास” असल में है क्या

क्योंकि मनुष्य के अंदर अनुकूलन की प्रवृति और क्षमता असीमित है, मैंने बिना अखबार और बाहर गए गुजारा कर ही लिया। मैंने तो देश से किया गया वादा निभाया, लेकिन दिल्ली यानि सरकार ने क्या, यह भी पूछा जाएगा? कल श्रीमती जी 40 दिनों के बाद कुल्लू गई और वापसी पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को लेकर आई। देख कर मुझे कितनी खुशी हुई इसे बताना बहुत कठिन है।