तब जो दशमी या दशहरा होता था, आज वही ‘अंतर्राष्ट्रीय लोकनृत्य उत्सव’ हो गया है। हां! बात हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में अतीत कल से मनाये जा रहे दशहरे की हो रही है। जो 30 सितंबर, 2017 को शुरू हुआ है और 6 अक्तूबर, 2017 तक चलेगा। इसकी शुरुआत दशहरे के मुख्य देवता रघुनाथ के रथ सवारी से होती है। रघुनाथ जी का मंदिर कुल्लू के पुरानी राजधानी सुल्तानपुर में बना हुआ है। जिसके साथ में कुल्लू के राजवंश का राज महल ‘रूपी महल’ भी बना हुआ है।
दशहरे के शुरू वाले दिन कुल्लू के राजवंश के आज के वारिस महेश्वर सिंह है जो हिमाचल प्रदेश विधान सभा के सदस्य भी हैं, तथा रघुनाथ के अन्य कारकून पालकी में रघुनाथ की मूर्ति को लेकर जलूस की शक्ल में चलते हैं। साथ में हजारों श्रद्धालु भी होते हैं। पालकी में मूर्ति को ढालपुर मैदान में खड़े लकड़ी के रथ में बदला जाता है और शाम को लगभग चार बजे रथ को रस्सों के सहारे खींचा जाता है। उस दौरान रथ के साथ मेले में आए हुए देवी-देवताओं के रथ भी चलते हैं। रथ को पहले दिन आधे रास्ते में ले जाकर खड़ा किया जाता है। क्योंकि यहां पर रघुनाथ का दशहरे के दौरान का कैम्प का स्थान नियत रहता है।
दशहरे की शुरुआत कुल्लू में कब से हुई इसका ठीक ज्ञान नहीं हैं। हां! कहा जाता है कि वर्तमान की रघुनाथ की मूर्ति को अयोध्या से लाया गया था। उसके पीछे भी एक कहानी सुनाई जाती है। रघुनाथ के यहां सुल्तानपुर में स्थापित करने के बाद यह दशहरे का मुख्य देव बन गया। लेकिन इस प्रस्थिति को देवी हिडिम्बा सांझा करती हुई दिखती हैं। बताया जाता है कि हिडिम्बा वर्तमान के राजवंश की कुलदेवी हैं। हिडिम्बा का दशहरे में बहुत अधिक महत्व है। क्योंकि दशहरे के अंतिम दिन जिसे कि लंका दहन के नाम से जाना जाता है। परम्परा के अनुसार दशहरे के अन्तिम दिन भैंसा सहित सात प्रजाति के पशुओं की बलियां दी जाती थीं। इन बलियों को स्वीकार करने के लिए देवी हिडिम्बा ही पात्र मानी जाती है और बली दिये जाने वाले स्थान तक वही जाती है। ध्यान दिया जाये कि पिछले कुछ वर्षों से हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के दखल के बाद इस प्रकार कि बलियां बंद कर दी गई हैं।
तब दशहरा अनौपचारिक होता था। इलाके के लोग अपने-2 खेती किसानी का काम खत्म करते थे और फसलों को समेट कर कुछ दिनों के लिए आराम करने, एक दूसरे से मिलने और फिर कुछ खरीद फरोख्त करने के उद्देश्य से कुल्लू में इकट्ठे होते थे। लोग सात दिनों तक गाते-बजाते और नाचते थे। एक तरह खुलकर मनोरंजन करते थे। तब सरकार या किसी अन्य औपचारिक एजेंसी का इस मेले से कुछ लेना देना नहीं होता था। अब तो यह मेला सरकारी मेला बन गया है और पूर्ण रूप से औपचारिक हो गया है। हर चीज की व्यवस्था दुकानों के प्लॉट अलाट करने से लेकर मनोरंजन के कार्यक्रमों का निर्धारण तक सरकार ही करती है। ज़िलाधीश की अध्यक्षता में दशहरा कमेटी के नाम से एक कमेटी बनाई गई है, जो मेले की समस्त व्यवस्था औपचारिक तरीके से करती है। दशहरे का उदघाटन जहां राज्यपाल करते हैं। वहीं समापन करने के लिए मुख्यमंत्री पहुंचते हैं। इस बीच इस इंटरनेशनल फोल्क डांस फ़ेस्टिवल, में स्थानीय कलाकारों को कम, बाहर के नामी कलाकारों के कार्यक्रमों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। बड़े-2 कलाकारों के नाम पर ‘नाईट’ चलती हैं।
तब इस मेले में स्थानीय के अतिरिक्त साथ लगते क्षेत्रों लाहौल-स्पीति, मंडी, कांगड़ा, भरमौर, शिमला, रामपुर यहां तक कि तिब्बत और जंखर तक का माल आता था और स्थानीय लोग ही नहीं अपितु व्यापारी लोग भी यहां खरीद फरोख्त करते थे। तब इस मेले में ऊन, ऊनी वस्त्र, पशमीना, मसाले, नमक, मेवे आदि का व्यापार होता था। लेकिन आज शायद हम कुछ अधिक ही विकसित हो गए हैं और हमने अधिक ही प्रगति कर ली है। लेकिन आज के खरीद फरोख्त की वस्तुओं में अधिकतर कबाड़ होता है। दशहरे मैदान में लगने वाली अधिक दुकानों में ‘सैकिंड हेंड’ कपड़ों की तथा जूतों की दुकाने होती हैं और इस बाज़ार में सबसे अधिक लोगों की भीड़ भी होती हैं। कहा नहीं जा सकता कि हमारे क्षेत्र में अधिक प्रगति के कारण ‘सैकिंड हेंड’ कपड़ों की मांग बढ़ी है या कि कुत्ते को हड्डी का स्वाद वाला विकास हो रहा है?