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तब मेरे लाहौल के गांव से कुल्लू आठ दिन में पहुंचते थे- यात्रा वृतांत

बात अधिक पुरानी नहीं है, आज से 50-60 साल पहले की है। तब लाहौल के बहुत से गरीब परिवार जिनमें अधिकतर दलित ही होते थे, सर्दियों में नीचे कुल्लू की और चले जाते थे और कुल्लू में सर्दियों में मजदूरी आदि करके अपना व अपने बच्चों का पेट पालते थे और बसंत ऋतु के आरंभ होते ही वापस लाहौल की तरफ यात्रा करना शुरू करते थे। लाहौल का तब का जीवन बहुत ही कठिन और कठोर था। पूरे साल में अप्रेल से अक्तूबर तक का सीजन खुला रहता था। इस दौरान यहां के कम ऊंचाई के क्षेत्रों में दो फसलें नंगा जौ (थंङज़त) और काठू (भ्रेस) ‘बकव्हीट’ होती थीं, लेकिन अधिक ऊंचाई के क्षेत्रों में सिर्फ एक ही फसल होती थी। उसके अतिरिक्त भी लाहौल में मौनसून की बरसात नहीं के बराबर होती है शायद चारों तरफ ऊंचे पहाड़ मौनसून की नमी वाले बादलों को रोक लेते हैं और लाहौल के कठोर जीवन को कठोरतम बना कर लाहौल के निवासियों के सामने एक चुनौती पेश करते थे। मानव के इस ‘अस्तित्व के लिए संघर्ष’ का ही परिणाम था प्रवास-अप्रवास का निरंतर चलने वाला यह सिलसिला। इस अप्रवास की यात्रा को मैंने भी जीवंत अनुभव किया है। मुझे भी अपने बड़े दादा जी (स्व. चेत राम) तथा बुआ जी (स्व. शूंकि) के साथ शरद ऋतु में कुल्लू की तरफ आना होता था और सर्दियां कुल्लू में काट कर बसंत ऋतु में लाहौल की ओर जाना होता था। आना-जाना पैदल का था।

जाहलमा मेरा गांव था, वहां से कुल्लू (तब छोटा सा कस्बा) पहुंचने में पूरे आठ दिन लगते थे। अक्तूबर के मध्य में लोग कुल्लू की ओर चलना शुरू कर देते थे और प्रयास रहता था कि समूहों में प्रस्थान हो। पीठ पर खाने-पीने, खाना-पीना पकाने के वर्तन, हल्के बिस्तर, जिसमें भेड़ों और बकरों की ऊनसहित खालें होती थी पैरों में लगाने के लिए विशेष घास (खाश) के पूले आदि लदा  होता था, मेरे जैसे स्कूल जाने वाले बच्चों के पीठ पर उनके पुस्तकों के झौले लदे होते थे। ये समूह बच्चों व महिलाओं के साथ चलते थे इसलिए पड़ाव भी कम दूरी के होते थे।

जाहलमा से कुल्लू की दूरी आज मोटर मार्ग से 170-175 किलो मीटर बनती है तब पैदल का रास्ता करीब 120-125 कि.मी. का रहा होगा। पहला पड़ाव जाहलमा से वर्तमान घुशाल पुल के पास एक गुफा (छुरपक), दूसरे दिन का पड़ाव ख्बगलिङ (सिस्सु) सराय या फिर वर्तमान की नर्सरी मैदान में खुले आसमान के नीचे, क्योंकि तब वह एक खाली मैदान होता था। तीसरे दिन ग्रंफुक, जिसे आज कोखसर के नाम से जान जाता है, में। आज जिसे कोकसर कहते हैं असल में वह ग्रंफुक है और जिसे ग्रंफुक कहते हैं वह कोकसर गांव के सामने पड़ता है। चौथे दिन सुबह सत्तू और घी खाकर वहां से चलते थे और धार (रोहतांग) पार करके राहला पहुंचते  थे।

कुल्लू और लाहौल के बीच की सीमा था रोहतांग जिसे हमारी भाषा में ‘कूएर धार’ कहते हैं राहला क्योंकि कुल्लू ज़िला में पड़ता है । राहला पहुंचने पर ऐसा लगता था जैसे हम स्वर्ग में पहुंच गये हों, रोहतांग इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा को पार करने की आपार खुशी। अब लोग लकड़ी की कमी वाले स्थान से जंगलों से भरे स्थान पर पहुंचते जाते थे। यानि कि ठंडे रेगिस्तान से समशीतोष्ण क्षेत्र में प्रवेश करते थे। जहां लकड़ी की कमी नहीं थी। इसलिए काफी लकड़ियां एकत्रित करके वहां पर जश्न मानते थे। हर उस व्यक्ति से जो पहली बार रोहतांग पार करता/ती था/थी, से आमतौर पर बच्चे कुछ नकद योगदान लेते थे और सब लोग प्रति व्यक्ति के हिसाब से बराबर के योगदान से संभव हो तो भेड़ या बकरा खरीदते थे और उसकी दावत होती थी। इस योगदान को ‘रङवल’ के नाम से जाना जाता था। रात को पुरुष लोग चख्थि (स्थानीय नशीला पेय जो गेहूं, चावल या जौ से बनता था) का आनंद लेते थे तो महिलाएं व बच्चे कुल्लू (ज़िला) जैसे गर्म और खुली जगह पहुंचने की खुशी मनाते थे। रात को मीट बनाया जाता था बचा हुआ मीट आपस में बांट लिया जाता था।

पांचवें दिन लोग वशिष्ठ (मनाली के पास) पहुंचते थे जहां गर्म पानी के चश्मे निकलते थे। क्योंकि वशिष्ठ में आम आदमियों के लिए गर्म पानी से नहाने के लिए स्त्रियों और पुरुषों के अलग-2 स्नानागार बने हुए थे। लाहौल में गर्म पानी के चश्में कहीं भी नहीं हैं। इसलिए लोग यहां पर आकर कपड़े आदि भी धोते थे और नहाते भी थे। नहाने के बाद राहला से बचे हुए मांस का सूप (छति) बनाई जाती थी और उसे बड़ी तसल्ली से पीते थे। एक दिन अतिरिक्त यहां आराम किया जाता था और नहाया जाता था। वहां से छटा पड़ाव सोलह मील या जेंडी (वर्तमान का पतलीकुहल)। सातवां पड़ाव द्वाड़ा बिहाल या नंगा बाग होता था। अंत में आठवें दिन कुल्लू के कस्बे में पहुंचते थे। रात को लोग या तो ‘ततापांई’ (छिम्बा बावड़ी) वर्तमान के गेमन पुल के निकट बने नए मार्किट के स्थान पर। जहां पर काफी समय बाद तक लाहौल के लोगों के रुकने के अवशेष भी मिलते थे। यहां पर उनके नाम शायद जमीने भी थी या फिर बेकर (टापू) जिसका आज नामो निशान नहीं है जबकि 1995 की बाढ़ द्वारा विनाश तक वहां पर एक छोटा मोटा बाजार बन गया था, बाढ़ में सब कुछ बह गया। टापू में हमारे लोग रुकते थे, कुछ लोगों के नाम जमीने शायद यहां भी थी।

खैर! रात इन दो स्थानों में से एक पर गुजारने के बाद दूसरे दिन से सर्दियां गुजारने के लिए डेरा तलाशने का काम शुरू हो जाता था। बाजार जिसे हमारी भाषा में ‘सहर’ (शहर, शायद) ‘अंदुर सहर’ (अंदर का बाजार) या सुल्तानपुर। कुल्लू उस समय छोटा सा कस्बा था और यह रामशीला की तरफ केन्द्रित था। कुछ दुकाने थी और बाजार रामबाग से काफी पहले ही खत्म हो जाता था। लोग अपने ठौर के लिए डेरों की तलाश में लग जाते थे, उस समय हमारे लोगों का केन्द्रीकरण आज के रामशिला के महंतों का ‘राउण’, दरिया किनारे ‘कोल्हू’ का क्षेत्र और कुछ अन्य स्थान जहां पर बड़े-2 हालनुमा कमरे होते थे। वहां पर हम लोगों के कई-2 कमरों में तो चार-2 परिवार भी चूल्हा जलाते थे और जीवन की गाड़ी को तेल देने का प्रयास करते थे। उसके बाद जहां एक तरफ मजदूरी की तलाश, दूसरी सर्दियों के लिए जलाने की लकड़ी एकत्रित करना, तीसरी ओर स्कूल जाने वाले बच्चे हों तो उनका दाखिले का प्रबंध करना आदि के संघर्ष में जुट जाते थे।

हमारे लिए स्कूल था सुल्तानपुर से लगते ‘मठ’ में राजकीय प्राइमरी विद्यालय। जहां पर हम लोगों को अक्तूबर-नवंबर में दाखिल करवाया जाता था फिर मार्च में वार्षिक परिक्षाएं और 31 मार्च को हर वर्ष की तरह परीक्षा का परिणाम और फिर 1 अप्रेल को स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट। अप्रेल का लगभग पूरा महिना कुल्लू में ही कट जाता था घूमते हुए या फिर दिन को राम प्रसाद के टॉकिज के सिनेमा के प्रचार के पोस्टर ढालपुर से लेकर रामशीला तक ढोते हुए और उसका मेहनताना मिलता था रात को सिनेमा देखने का सुनहरा मौका। यह काम और मौका भी किसी-2 को नसीब होता था। पूरी की पूरी सर्दियां मक्की की रोटियों के सहारे कट जाती थी। चावल कभी-कभार और गेहूं के आटे की रोटियां भी विशेष अवसरों पर मिलती थी। सब्जी के नाम पर ‘शुंशेर शाग’ जो कि कीचड़ वाली जगह पर जंगली रूप में उगता था, का सेवन करने का मौका मिलता था। मर्द लोग दरिया किनारे पत्थर तोड़कर उसे ढोने का काम करते थे तो महिलायें दियाडीदार मजदूरी करती थी। मीठी चाय के नाम पर पूरी सर्दियों में एक-दो बार गुड़ की बिना दूध की चाय बनती थी, जिसे पीने की होड़ में बच्चों की एक तरफ जीभ जल जाती थी और ऊपर से मार भी खानी पड़ती थी। यह था जीवन का संघर्ष या कहें अस्तित्व के लिए संघर्ष। (मेरी अप्रकाशित पुस्तक ‘मेरी जीवन यात्रा’ के एक अध्याय से)

ल.च.ढिस्सा

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