भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के लम्बे इतिहास के दौरान हुए संघर्ष को ऊर्जा प्रदान कर गतिशील बनाये रखने वाले नारे, जिन्होंने उस पूरे दौर में देश को न केवल संगठित ही किया अपितु एकजुट और आंदोलित भी किये रखा। ये नारे जिन्हें हम (विशेषत: युवा) भूलते जा रहे हैं, को याद रखा जाना चाहिए। ये नारे राष्ट्रीयता की भावना पैदा करने के लिए भी आवश्यक हैं। न कि आज के बिखंडतावादी विचारधारा पर आधारित राष्ट्रवाद के नारे। ये वे नारे हैं जिन्हें हमारे देश के महापुरुषों ने समय-2 पर बुलंद किया और देश ने जिन्हें दोहराया और जिन पर अमल किया। इन नारों से प्रेरित होकर लाखों लोग फांसी के फंदे पर झूल गए, गोलियों व गोलों के सामने तन कर खड़े हो गए। देश की स्वतन्त्रता के लिए हंसते-2 मौत को गले लगा लिया, दुनिया का सर्वोच्च बलिदान दिया।
यह इस लिए भी आवश्यक है क्योंकि आज के युवा वर्ग को गुलामी क्या होती है यह नहीं पता। इस लिए उन्हें आज़ादी के महत्व का ज्ञान भी नहीं हो सकता। जब उनके साथ बैठने का मौका मिलता है और देश की स्वतन्त्रता के किए गए संघर्ष की चर्चा करते हैं ऐसा लगता है उन्हें इससे कुछ लेना देना ही नहीं है। हद तो एक दिन हुई जब मेरे पास कुछ अच्छे पढ़े लिखे युवा बैठे थे। कुछ पीने-पिलाने का कार्यक्रम भी चल रहा था। इस बीच देश की दशा पर चर्चा होना स्वाभाविक था। बात जब देश के स्वतन्त्रता संग्राम में शहीदों पर पहुंची तो उन में एक युवा जिसने उच्च शिक्षा प्राप्त कर रखी थी ने ‘शहीद-ए-आज़म’ सरदार भगत सिंह के सर्वोच्च बलिदान को ‘साहसिक कार्य’ करार दिया। बहुत बुरा लगा लेकिन…..। इस लिए भी उन प्रेरणाओं, प्रेरणा स्रोतों और प्रेरकों की यादें दिल के करीब रखी रहनी चाहिए। उन नारों में कुछ हाज़िर हैं:
‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा’ सुभाष चन्द्र बोस
‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ बाल गंगाधर तिलक
‘जय हिन्द’ सुभाष चन्द्र बोस
‘इन्क़लाब जिंदाबाद’ भगत सिंह
‘दिल्ली चलो’ सुभाष चन्द्र बोस
‘हम एक थे, एक हैं, एक रहेंगे’ सुभाष चन्द्र बोस
‘करो या मरो’ महात्मा गांधी
‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ राम प्रसाद बिस्मिल
‘हू लिव्स इफ इंडिया डाइज़’ जवाहर लाल नेहरू
‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ इकबाल
‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ इकबाल
