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वोट की राजनीति के परिणाम हैं ये ‘बाबे’

इस देश के एक और भगवान का कारनामा देश के सामने है। बाबा राम रहीम पर बलात्कार का आरोप साबित हो गया और सीबीआई कोर्ट के जज ने पंचकुला हरियाणा में उसे दोषी घोषित करते हुए सजा तय करने के लिए 28 अगस्त की तारीख तय की है। 3 बजे के करीब अदालत ने फैसला सुनाया और सात बजे सांय तक चार घंटे के अंदर ही सिर्फ पंचकुला में बाबा के धर्म और अध्यात्म के शिष्यों के गुंडई के चलते कम से कम 28 व्यक्तियों की मौत तथा सौ से अधिक वाहनों को आग के हवाले किया जा चुका था। अभी अन्य स्थानों पंजाब, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हिमाचल से रिपोर्ट आनी शेष है। सरकारी और निजी सम्पति का नुकसान कितना होगा, उसका हिसाब-किताब लगाने का जिम्मा खट्टर साहब ने किसी को दे दिया होगा ताकि इस देश व समाज हित के कार्य करने वालों को उचित मुआवज़ा दिया जा सके (हो सकता है शहीद घोषित कर दिया जाए)।

आज से दो दिन पहले भी मैं लिख चुका हूं कि यह सब करके हम देश या लोकतन्त्र का भला नहीं कर रहे हैं। बल्कि किसी न किसी तरह इस प्रजातन्त्र को राजनैतिक ‘ब्लैक होल’ की तरफ धकेल रहे हैं। जैसे कि पहले कहा था ऐसी घटना पहली बार नहीं घटी है। इस देश के हर कौने में ऐसे बाबे और प्रभु भरे पड़े हैं। धुर दक्षिण से उत्तर और पूर्व से पश्चिम तक। एक से बढ़कर एक धर्म गुरु, एक से बढ़कर एक आध्यात्मिक गुरु भरे पड़े हैं और यदि नहीं भी हों तो उनका अविष्कार किया जा रहा है, पैदा किये जा रहे हैं ऐसे धर्म व आध्यात्मिक गुरू ताकि देश और प्रजातन्त्र को कठपुतली बनाकर नचाया जा सके।

इस देश में जाने ऐसे कितने ‘कल्कि अवतार’ मिल जायेँगे। जो इस देश की भूखी-प्यासी जनता के अज्ञानता और अंधविश्वास का लाभ उठाकर उनका मनमाने तरीके से प्रयोग करते हैं। दुर्भाग्य से देश के राजनेता भी उन गुरुओं को अपने राजनैतिक लाभ के लिए प्रयोग करने से गुरेज नहीं करते। जिसके लिए वे दोनों एक दूसरे की न सिर्फ मदद ही करते हैं अपितु एक दूसरे का प्रयोग भी खुले आम करते हैं। पंजाब, हरियाणा और अन्य स्थानो में हुए आज के इस कांड का मुख्य कारण भी यही है। बताया गया है कि सिर्फ पंजाब तथा हरियाणा राज्यों में करोड़ों वोटर इस बाबा के अनुयायी हैं। इसलिए कोई भी नेता या राजनैतिक पार्टी बाबा को नाराज करने की हिम्मत नहीं कर सकती। इस देश में कितने ही बाबा ऐसे होंगे जो एक साथ इतने वोट अपने नियंत्रण में रखते होंगे और हर एक बाबा के ऐसे कांड सामने आयें और उस पर अपराध सिद्ध हो जायेँ और फिर उसके श्रद्धालू भक्तगण कानून व्यवस्था की धज्जियां इसी तरह उड़ाएँ तो क्या होगा इस देश का?

जहां तक हरियाणा सरकार की बात है, चाहे 2014 का बाबा रामपाल काण्ड, 2016 का जाट आंदोलन हो या आज का बाबा राम रहीम के श्रद्धालुओं आतंकित करने वाले उपद्रभपूर्ण कार्य हों वह हर अवसर पर बुरी तरह असफल साबित हुई। फिर भी भाजपा या केंद्र सरकार को यह एहसास क्यों नहीं होता है कि शासन-प्रशासन का इस प्रकार असफल होना राजनैतिक दृष्टि से भी लाभदायक नहीं होता। इस बार तो इस देश के मीडिया, खुफिया तंत्र यहां तक कि उच्च न्यायालय ने भी बता दिया था कि इस बलात्कार के फैसले के बाद पैदा हुए हालातों से सही और उचित ढंग से निबटा जाये। कोर्ट ने हरियाणा सरकार से यहां तक साफ कह दिया था कि आवश्यकता पड़ने पर फायरिंग भी की जाये। लेकिन धारा 144 लागू किए जाने के बाबजूद सरकार ने पंचकुला में लाखों लोगों को एक स्थान पर एकत्रित होने दिया। यही नहीं उसके कई वरिष्ठ मंत्रियों ने तो यहां तक कह दिया कि वे तो बाबा के श्रद्धालू हैं उन पर धारा 144 लागू नहीं होती। आज सौ से अधिक वाहनों को आग के हवाले करने, 28 लोगों के मरने तथा करोड़ों रुपये की सम्पति को नष्ट कर दिये जाने के बाद भी राज्य के मुख्यमंत्री कहते हैं कि स्थिति पर हमारी नज़र है और देश के गृहमंत्री को ट्वीट कर दिया गया है। देश के अन्य कई राज्यों में भी यह आग फ़ैल रही है।

देश और संबन्धित राज्यों के शासन-प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि जिस तरह टीवी पर हालात को दिखाया जा रहा था, जो वातावरण बाबा के गुंडों ने बनाया था उससे अधिक आतंक क्या हो सकता है। सबसे बड़े आतंकवादी तो वे बाबा और उनके अनुयायी हैं जो धर्म, मत और अध्यात्म के नाम पर जब कभी शक्ति प्रदर्शन करके देश के लोगों को आतंकित करते रहते हैं। जिन्होंने अपने ‘भगवान’ को बलात्कार की सजा से बचाने के लिए इतना तांडव किया उनको आतंकी क्यों न माना जाये? यह व्यवस्था भी अपने शोषण के विरूद्ध लड़ने वालों पर तो सुरक्षातंत्र का बुलडोजर पूरी तरह से चलाने से हिचकिचाती नहीं है लेकिन धर्म व अध्यात्म की आड़ में राज्य सत्ता को खुली चुनौती देने पर भी न सिर्फ चुप्पी साध लेती है बल्कि लीपा-पोती करती है।

देश को इस प्रकार की स्थिति तक पहुंचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी देश की राजनीति की है। कुछ दिन पहले देश के चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा था- बिना नैतिकता के हर कीमत पर जीतना आज की साधारण राजनीति हो गई है। फिर वह चाहे ‘राईट’ की राजनीति हो या ‘लेफ्ट’ की या फिर ‘एनजीओ किस्म की राजनैतिक’ पार्टियों की हो। इस के लिए जितनी ज़िम्मेदारी दक्षिणपंथी राजनीति की है उससे अधिक वामपंथियों की है। इस देश में कभी भी पेट को प्राथमिक मुद्दा नहीं बनाया गया। सदा से भावनात्मक मुद्दों पर, नारों, दावों और वादों पर राजनीति चलती रही। आज ‘वाम’ हाशिये पर लकवाग्रस्त पड़ा है और दूसरे अपंग से मदद की उम्मीद किए बैठा है।

आज मैं टीवी स्क्रीन पर देख रहा था, बाबा भक्त सबके सब ऐसे वर्ग से आते हुए लगते हैं जो कि गरीब हैं, कुपोषित हैं। इस प्रकार के बाबाओं के झांसे में इस तरह के लोग ही आते हैं, उनको बाबा के अंदर अपना उद्धारक नज़र आता है। जब उनके चुने प्रतिनिधि उनके प्रश्नों को हल करने के बजाय उनके प्रश्नों के प्रश्न बन जाते हैं तो बाबा क, ख, ग पैदा होते हैं। राजनीति के बाबा, व्यवसाय के बाबा, धर्म के बाबा और अध्यात्म के बाबा।

इसके अतिरिक्त भी बाबा के समर्थन में सड़क के दोनों ओर खड़ी औरतें और सुरक्षा बलों पर पत्थराव करने वाली भीड़ और आगजनी करने वाली भीड़ में भी औरतें भागीदार थीं। क्या विडम्बना है एक औरत पर बलात्कार और औरतें ही बलात्कारी के समर्थन में चट्टान बन कर…..? और भी इस मामले में ‘अभ्या कांड’ के गैर सरकार संगठनों और महिला संगठनों की चुप्पी भी हैरान कर देने वाली है…?

अंत में शासन-प्रशासन, राजनैतिक पार्टियों, विशेषकर राजनीति में धर्म की अनिवार्यता की वकालत करने वालों के लिए यह एक चेतावनी है।

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