गरीब भूखों मर रहे हैं और चुनी हुई सरकार अपने गोदामों के चावल से अमीरों के लिए खुशबूदार ‘सेनीटाइजर’ बनबा रही है। शर्म से डूब मरना चाहिए।
याद करें, स्वतन्त्रता आंदोलन के आर्थिक चिंतक दादा भाई नौरोजी का यह कथन जो उन्हों ने तत्कालीन ब्रिटिश शासकों के शोषण के विरुद्ध कहे थे- “देशी शासक गरीबों के पीठ पर लात मारते थे, लेकिन अंग्रेज़ उनके पेट पर लात मार रहे हैं”।
आज के ये चुने हुए शासक तो गरीबों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और हाशिये के लोगों के पीठ और पेट दोनों पर लात मार कर अमीरों और सरमायेदारों की तिजोरियां भरने का काम कर रही है।
आज एक स्वाभिमानी व्यक्ति अपने को उस प्रजातन्त्र का हिस्सा होने पर भी अपमानित अनुभव कर रहा है, जो अपने गोदामों का अन्न भूख से मरते गरीबों की जन बचाने के लिए उपयोग करने के बजाय अमीरों के लिए खुशबूदार सेनिटाइज़र बनाने में प्रयोग करने का निर्णय ले चुकी है।
….हैरानी, अफसोस, दु:ख, तकलीफ, ग्लानि, अपमान ….।
