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पार्टी का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ होता है, घोषणापत्र

हिमाचल प्रदेश विधान सभा चुनाव-2017, जो 9 नवम्बर 2017 को होने हैं, के लिए नामांकन दाखिल करने की अन्तिम तारीख आज समाप्त हो चुकी है। लेकिन प्रदेश की दोनों पार्टियों ने अभी तक चुनाव घोषणापत्र जारी नहीं किये हैं। दोनों पार्टियां अभी तक नाराज नेताओं को मनाने में व्यस्त हैं। अभी तो एक पार्टी के रूठे हुए दूसरी पार्टी के प्रत्याशी बन बिगड़ रहे हैं। भाजपा तो किसी तरह अनिल शर्मा जैसे अपरिहार्य को टिकट दे चुकी है और अब कई स्थानों पर ‘डेमेज कंट्रोल’ करने में जुटी हुई है। दूसरी ओर वीरभद्र सिंह ने कौल सिंह ठाकुर की अध्यक्षता में कांग्रेस की घोषणापत्र समिति के गठन की घोषणा कर दी है। उनसे तो चुनावों के बाद ही घोषणापत्र तैयार हो पायेगा, क्योंकि अभी तक तो वे अपनी बेटी के टिकट की व्यवस्था में व्यस्त थे। अब अपनी और बेटी की दो-दो सीटों की चुनाव व्यवस्था संभालनी पड़ेगी।

चुनाव घोषणापत्र की बात है तो बरबस ही कांग्रेस के 2012 चुनाव घोषणापत्र याद आ जाती है। जिस पर कांग्रेस के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह मुकर गए थे। वह तो कांग्रेस नेता व वर्तमान में सांसद राज्य सभा ने बीच बचाव करते हुए कहा था कि ‘घोषणा पत्र पार्टी का होता है, व्यक्तिगत नहीं’। इस ईमानदार स्वीकारोक्ति के लिए बधाई के पात्र हैं, पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा। उन्हों ने कम से कम इतना तो माना कि वह और कांग्रेस उस घोषणापत्र के प्रति जिम्मेदार हैं। यहां तो अपने मुख्यमंत्री, इस बात से ही मुकर गए थे कि बेरोजगारी भत्ता 2012 के विधान सभा चुनाव के कांग्रेस के घोषणापत्र में शामिल भी था। जबकि वे उस कमेटी के सदस्य थे। उनका कहना है कि बेरोजगारी भत्ता देने से युवा आलसी हो जाएंगे और मेहनत करना छोड़ देंगे। उसके बदले उन्होंने 100 करोड़ रुपये कौशल विकास के लिए आबंटित किए हैं।

यह एक और बहस का विषय है कि कौशल विकास के नाम पर क्या-2 गुल खिलाये जा रहे हैं, और उसके पात्र कौन हैं। जैसा कि मैं पहले कई लेखों में इस बात को उठा चुका हूं कि इस प्रकार चुनाव के घोषणापत्रों में पार्टियां भविष्य की अपनी-2 नीतियों, कार्यक्रमों का खुलासा भी करती हैं और वादे भी। उसी को आधार मान कर मतदाता वोट करता है। अब यदि वह पार्टी अपने चुनाव पूर्व वादों से मुकर ही नहीं बल्कि उसका प्रतिवाद ही कर दे तो उससे न सिर्फ उस पार्टी, घोषणापत्र और चुनाव की अपितु देश के लोकतन्त्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे….?

चुनाव से पहले देश की तमाम राजनैतिक पार्टियां अपना-2 ‘घोषणापत्र’ लेकर मतदाताओं के पास जाती हैं और उस पर उनका मत व समर्थन मांगती हैं। यही घोषणापत्र उन पार्टियों का सुशासन का दिशा निदेशक तथा देश की जनता से एक वादा व एक समझौता होता है।

मैं यह भी मान कर चलता हूं कि मतदाता उस घोषणापत्र को आधार बनाकर ही मतदान करता है, भले ही बीच में कई अन्य परिस्थितियों का समावेश हो जाता है। लेकिन पार्टियां देश-प्रदेश की सत्ता पा लेने के बाद उस घोषणापत्र को भूल जाती हैं। ऐसी एक घटना हाल में तब सामने आई जब हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने उनकी पार्टी के 2012 के चुनाव के घोषणापत्र में किए गए ‘बेरोजगारी भत्ते’ के वादे को असंभव बताते हुए न सिर्फ इसे देने से इन्कार ही किया अपितु वह तो यह भी कह गए कि वह उस घोषणापत्र कमेटी के सदस्य अवश्य थे परंतु उन्हें इस बारे में पता नहीं है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव घोषणापत्र का बहुत महत्व है और होना भी चाहिए। भले ही चुनाव आयोग भी इस विषय को अधिक महत्व नहीं देता। चुनाव सुधारों में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान रहना चाहिए। अन्यथा चुनावों, तथा मतदान का महत्व भी कम हो जाएगा। हिमाचल प्रदेश में उठा यह मुद्दा अंजाम तक पहुंचना चाहिए। इसके लिए सब की दखल की दरकार है..। यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि दबाब के चलते प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं वित्तमंत्री को इस मांग को मानना भी पड़ा और 2017-18 के बजट में 150 करोड़ रुपयों कि राशि का प्रावधान भी करना पड़ा। यद्यपि इसी बजट में सरकारी कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और पेंशन के लिए 14578 करोड़ रुपयों यानि कि कुल बजट व्यय के 41% का प्रावधान किया गया है। फिर भी जीत तो जीत होती है।

यह विषय कितना महत्वपूर्ण है इस बात का प्रमाण तब मिल गया जब कुछ समय पहले ‘निर्वाचक विषयों के संदर्भ में आर्थिक सुधारों’ पर भारतीय विधि महासंघ द्वारा आयोजित सेमिनार में बोलते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर ने कहा था कि चुनावी वादे आम तौर पर बिना पूरा किए रह जाते हैं और ‘घोषणापत्र’ कागज के टुकड़े बन जाते हैं, जिसके लिए राजनैतिक पार्टियां अनिवार्यत: जिम्मेदार ठहराई जानी चाहिए।

इसके अतिरिक्त भी देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश को यह भी कहना पड़ा कि देश की राजनैतिक पार्टियों को चुनावी ‘घोषणापत्र’ के प्रति ईमानदार होना चाहिये तो मानना चाहिये कि समस्या अवश्य ही गंभीर व ध्यान दिये जाने योग्य है।

इस बात पर मैं बहुत समय से लिख–पढ़ रहा था। इससे पहले भी सोशल मीडिया के माध्यम से लिख चुका हूं। यहां हमारे हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री भी 2012 के कांग्रेस के घोषणापत्र से न केवल मुकर गए थे, वह तो यहां तक कह गए थे कि घोषणापत्र बनाने वाले लोग अयोग्य थे जिन्हें शासन चलाना नहीं आता। लेकिन तब हम आप के प्रयासों ने रंग लाया और मुख्यमंत्री को घोषणापत्र को न केवल मानना पड़ा अपितु उस मद पर बजट प्रावधान भी करना पड़ा।

मुझे आज बहुत खुशी हो रही है कि चुनाव सुधारों पर मेरे विचार देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के विचारों से मेल खाते हैं। स्थिति कितनी गंभीर है इस का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है जब उनको कहना पड़ा है कि ‘घोषणापत्र’ को लागू करवाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। यह तो हमारा भी मानना रहा है कि मतदाता पार्टी या प्रत्याशी को घोषणापत्र के आधार पर ही अपना मत देता है। अब यदि जीतने के बाद राजनैतिक पार्टी अपने घोषणापत्र से मुकर जाये तब तो यह चुनावों और प्रजातन्त्र का मज़ाक बन जाएगा और कल कोई कुछ भी वादा कर सकेगा क्योंकि उसके चुनाव के साथ और बाद  उसका कोई लेना-देना नहीं होता।

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