दूसरे के घर को लगाई आग की लपटें अपने घर तक भी पहुंचती हैं
इस देश में कोरोना को भी धार्मिक आधार देने से नहीं बक्शा गया। यहां तक कि सरकारी प्रवक्ता और सरकार के द्वारा भी कोरोना मरीज़ों की संख्या भी तब्लीगी या जमाती और अन्य में बताई जाने लगी। इसी प्रकार से पालघर, महाराष्ट्र में कुछ दिन पहले सैंकड़ों लोगों की भीड़ ने तीन व्यक्तियों को पीट-2 कर जान से मार डाला, जो अमानवीय, घृणित और अति निंदनीय था। परन्तु जितना निंदनीय वह कार्य था, उससे अधिक निंदनीय उस पर राजनीति करना है। इस देश में एक वर्ग ऐसा है जिसका पूर्णकालिक काम यह है कि हर चीज और हादसे को धार्मिक रंग दिया जाए और उसका राजनैतिक लाभ उठाया जाए। यह मामला भी कानूनी अपराध का है, क्योंकि कुछ लोगों की भीड़ ने तीन व्यक्तियों की हत्या कर दी। लेकिन उस प्रचार ब्रिगेड ने उसे धार्मिक रंग दे दिया। अब मामला तीन व्यक्तियों का ‘लिंचिंग’ का नहीं रह गया, बल्कि हिन्दू-मुस्लिम का बन या बना दिया गया। मुसलमानो ने हिन्दू साधुओं की लिंचिंग की है, हो गया, यद्यपि उस पूरे मामले में मुसलमानों का कुछ लेना देना ही नहीं है। हिन्दू धर्म और हिन्दू संत खतरे में हैं, का हो गया। मारे गए लोग आदमी नहीं साधू-सन्यासि और मौत हिन्दू धर्म की बन गई।
राज्य सरकार जिसके जिम्मे राज्य की कानून व्यवस्था है, की तरफ से मुख्यमंत्री तक हर स्तर से सफाईयां दी गई और कार्यवाही के आश्वासन दिये गए, 100 से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया गया, फिर भी नफरत की प्रोपेगंडा ब्रिगेड कहां मानने वाली थी। भाजपा का आईटी सेल पूरा का पूरा जुट गया, ट्विटर पर ‘महाराष्ट्र में सन्यासी’ आदि कई जुमले ट्रेंड करवाए गए। मुख्यधारा का प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया का एक वर्ग पूरी ताकत के साथ हिन्दू-मुस्लिम की इस मुहिम में शामिल हो गया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। उन लोगों ने अपने से अलग विचारधारा के लोगों से तरह-2 के प्रश्न करने शुरू कर दिये। जैसे कि हिन्दू धर्म और साधू संतों व सन्यासियों के लिंचिंग किए जाने पर वे चुप क्यों हैं? यहां तक कि उन्हें गालियां दी जाने लगी। यहां तक कि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री को लिंचिंग में शामिल लोगों की नाम सहित लिस्ट जारी करनी पड़ी, तब कहीं रोका जा सका उन घृणा फैलाने वालों को।
इस सन्दर्भ में कुछ दुर्घटनाएं याद आ जाती हैं, जिनको सांझा करना चाहता हूं। पहली घटना आज से कुछ साल पहले की है। मेरे पड़ोस के ज़िले में दो युवाओं (लड़का और लड़की) ने शादी कर ली, लेकिन दुर्भाग्य से उनका धर्म एक नहीं अलग-2 था। अब क्योंकि विशेष वर्ग के लोग इसी तरह की घटनाओं के इंतज़ार में रहते हैं, उन्हों ने तत्काल मामले को लपक लिया और उसका पूरा फायदा उठाने की योजना बनाई। इस मामले में भी लड़का मुस्लिम और लड़की हिन्दू थी इस लिए शादी लड़का लड़की की न हो कर हिन्दू मुसलमान की हो गई और पूरे क्षेत्र का माहौल बिगाड़ दिया गया।
एक अन्य घटना अप्रेल, 2007 की है। कुछ समय पहले अंतर्राष्ट्रीय थानेदार अमेरिका ने प्रजातन्त्र की रक्षा के नाम पर इराक पर आक्रमण कर दिया। तब इराक पर सद्दाम का राज था। शासकों के अलावा दुनिया के समस्त लोग इस बात से आहत हुए। हर कौने से इस कार्य की भर्त्सना हुई तथा विरोध प्रदर्शन हुए। कुल्लू में भी ‘विश्व समाज’ मंच की अगुआई में प्रदर्शन तथा देश के राष्ट्रपति को ज्ञापन देने का निर्णय लिया गया। क्योंकि मैं इस क्षेत्र में विश्व समाज मंच का जिम्मेदार व्यक्ति था इस लिए इसकी व्यवस्था मेरी ज़िम्मेदारी थी। मैंने क्षेत्र के समस्त संस्थाओं, सामाजिक व्यक्तियों आदि से संपर्क और चर्चा शुरू की। इस सिलसिले में एक दिन उस विशेष ब्रिगेड के एक जिम्मेदार व्यक्ति से मिलने का मौका मिला। जैसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा थी वही हुआ। जैसे ही उनसे इस बारे बात की उनका त्वरित उत्तर था, आप कश्मीर के पंडितों के पलायन पर क्यों नहीं बोलते? यह सही था कि मैंने कश्मीर के विषय पर कोई सक्रिय काम नहीं किया और न ही किसी ने उस से पहले इस मामले में मेरे से किसी तरह के सहयोग की बात की थी। इस लिए उस सज्जन से भी यही कहा कि यदि वह ऐसी कोई बात करते तो मैं अवश्य ही साथ देता।
पालघर मामले में एक बात नोट करने योग्य है कि जब पूरा विश्व कोरोना के खौफ में जी रहा है। हर तरफ मौत का तांडव है। वैश्विक महामारी है, इलाज है नहीं, हर तरफ हर तरह हर फील्ड के वैज्ञानिक इसके निदान के तरीकों की खोज में दिन रात एक किए हुए हैं। इससे निजात पाने के लिए अपने-2 स्तर पर और एक दूसरे के अनुभवो के आधार पर प्रयास किए जा रहे हैं। उन समस्त ज्ञात तरीकों में आज तक के सबसे कारगर तरीके यानि ‘दूरी बनाना’ या ‘सोशल डिस्टेन्सिंग’ पर पूरा ज़ोर दिया जा रहा है।
इसी लिए देश में तालाबन्दी’ या ‘लॉकडाउन’ का आज 37वां दिन चल रहा है। सारी दुनिया, मानव जीवन पूरा थम गया है। यहां तक कि लोग अपनों के अन्तिम क्रियाकर्म में भी शामिल नहीं हो पा रहे हैं। जिसका एक उदाहरण है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का, जो अपने पिता की अंतेष्टि में नहीं जा पाये। कारण था लॉकडाउन का पालन करना और पालन करने का नैतिक उत्तरदायित्व। यदि योगी लॉकडाउन का पालन कर सकते हैं तो पालघर में मारे गए साधुओं ने ऐसा क्यों नहीं किया? अपनी, देश, विश्व और मानवता की रक्षा के लिए इतनी उम्मीद तो इन विरक्त लोगों से भी की जा सकती थी। लेकिन नहीं किया गया, हादसा हो गया, राज्य सरकार बार-2 आश्वासन दे रही है कि कानून के तहत कार्यवाही होगी, सच सामने आएगा, अपराधियों को सजा दी जाएगी, न्याय होगा, फिर भी यह अवांछित हल्ला क्यों ?
जबकि इनके अपने मामले में कितने अखलाख, पहलू….काण्ड हुये? उनमें तो अपराधियों के जमानत पर छूटने पर मंत्रियों ने स्वागत किया, फूल मालाएं पहनाई। अब तो सुना है उनको सरकारी नौकरियां भी दी जा रही हैं। लगता है अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और सीमांतों की हत्या उनके शासन में सरकारी नौकरी के लिए एक अनिवार्य योग्यता बनाई गई है। धर्म के ठेकेदारों और धर्म की राजनीति करने वालों को यह अच्छे से याद रखना चाहिए, दूसरे के घर को आग लगाने से लपटें अपने घर तक भी पहुंचती हैं।