9 अक्तूबर, 2017 के दिन ‘ट्रावणकोर देवस्वम बोर्ड’ जिसे केरल सरकार के खर्चे पर चलाया जाता है, ने बोर्ड के मंदिरों के लिए 62 पुजारियों का चयन किया। जो कि भर्ती के नियमों के अंतर्गत नियोजित व स्थापित प्रक्रिया से किया गया। जिसमें लिखित परीक्षा के अतिरिक्त साक्षात्कार भी शामिल था। चयनित 62 पुजारियों में 5 पुजारी अनुसूचित जाति से हैं। केरल में सरकार के द्वारा चलाये जाने वाले सार्वजनिक मंदिरों में आरक्षण के प्रावधान रखे जाने के बावजूद यह पहली बार हुआ है कि अनुसूचित जातियों से पुजारी आरक्षण के आधार पर लिए गए हैं।
वैसे तो केरल हर मामले में देश का एक अग्रणी राज्य रहा है। फिर वह चाहे शिक्षा हो, नारी अधिकार हो, भूमि सुधार हों, सामाजिक-आर्थिक समानता की बात हो, केरल सदा आगे रहा है। मंदिरों में समानता के अधिकार को भी केरल सरकार ने महत्व दिया और मंदिरों को सार्वजनिक करने के साथ-2 सरकार के अधीन भी किया और मंदिरों के आय-व्यय की ज़िम्मेदारी भी ली। सरकार द्वारा इतना करने के पीछे केरल की जागरूक जनता की भूमिका बहुत बड़ी रही है। एक समय था जब केरल में जन्माधारित जातीय भेदभाव अति पर था इसलिए उसके विरुद्ध भी समय-2 पर आवाज़ें उठती रहीं। कई आंदोलन हुए, जिसमें जनसाधारण की बड़ी भागीदारी रही।
इस मामले में पहला व्यवस्थित आंदोलन ‘वैकम सत्याग्रह’ नाम से 1924 में हुआ, इसके परिणामस्वरूप ट्रावणकोर राज्य ने सार्वजनिक सड़कें सब जातियों के लिए खोल दी। उससे पहले दलितों (अनुसूचित जाति) को इन मांगों पर चलने पर पाबंदी थी। इस प्रकार के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए लोग अपने अधिकारों के प्रति सचेत भी होते गए और आंदोलन भी करते रहे। इसी कड़ी में 1936 में दलितों और अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार प्राप्त हुआ। जिसको पाने के लिए देश के कई क्षेत्रों में लोग आज भी लड़ रहे हैं। देश में आज भी बहुत से स्थान हैं, जहां पर मंदिरों में दलितों का प्रवेश निषेध है। इसके उदाहरण हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में बहुतेरे मिल जाते हैं। हिमाचल प्रदेश के कई स्थानो में मंदिरों से पर्याप्त दूरी पर दलितों वहां से आगे न जाने के नोटिस लगाए हुए मिल जाते हैं, जहां से आगे जूते और अछूत नहीं जा सकते। इसके अतिरिक्त देवता के रथ या मंदिर को यदि कोई दलित छू देता है तो उसके साथ मारपीट के अलावा जुर्माना भी भरना पड़ता है।
यहां यह बताना आवश्यक है कि केरल में 1970 में 10 अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों को मंदिर का पुजारी बनाया गया था। लेकिन 23 साल बाद 1993 में जाकर उन्हें मंदिर में प्रवेश दिया गया। क्योंकि उच्च जातियों के द्वारा इसका बहुत विरोध किया गया। इन 10 पुजारियों का चयन तो ट्रावणकोर देवस्वम बोर्ड द्वारा कर लिया गया, लेकिन मंदिर प्रवेश में सवर्ण जातियों का कड़े विरोध के बाद उनके पदनाम को बदल कर क्लर्क करना पड़ा था। यह विषय न्यायालय तक पहुंच गया और अंत में 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने उनके मंदिर प्रवेश और पुजारी बनने का रास्ता साफ किया।
अभी चयनित 5 दलित पुजारी 10 से 22 वर्ष तक अलग-2 निजी मंदिरों में सहायक के रूप में सफलतापूर्वक कार्य कर चुके हैं। इसलिए यह कहना थोड़ा ज्यादा हो जाएगा कि सरकार का यह आदेश क्रांतिकारी है। लेकिन यह आदेश इसलिए युगांतरकारी हो सकता है कि इसने संविधान के सामाजिक न्याय के सिद्धांत को आगे बढ़ाने का कार्य किया है। जिससे कि मंदिरों या धार्मिक स्थानों पर भी समानता का सिद्धांत लागू हो और इसके चलन में विस्तार हो।
इससे पहले भी दलित पुजारी निजी मंदिरों में सहायक पुजारियों के काम कर रहे थे। अब उन्हें औपचारिक रूप से छोटे व गांव स्तर के मंदिरों का पुजारी नियुक्त कर दिया गया है। उपरोक्त आदेश का एक अर्थ यह तो है कि अब से यह पुजारी एक स्थापित चयन प्रक्रिया के अधीन नियुक्त किए जायेंगे न कि पुजारी का पद उत्तराधिकार में व दान में दिया जाएगा। हां! इस स्तर पर उनकी नियुक्ति का विरोध भी नहीं होगा। लेकिन बड़े मंदिरों में जाने पर उनका विरोध हो सकता है। इसका उदाहरण अन्य पिछड़ा वर्ग के एक पुजारी का है जिस का मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्ति का कड़ा विरोध हुआ और केरल उच्च न्यायालय के एक बेंच ने तो इस पर रोक लगा दी थी। लेकिन दूसरे बेंच ने इस रोक को हटा कर नियुक्ति के पक्ष में निर्णय दिया और सरकार के निर्णय का रास्ता साफ किया था। राकेश नामक इजावा जाति का व्यक्ति, जो कि आज वरिष्ठ पुजारी के पद पर कार्यरत है और 200 मंदिरों पर नियंत्रण रखता है का कहना है कि व्यक्ति अपने कर्मों से ब्राह्मण बनता है। हर हिन्दू ब्राह्मण बन सकता है, यद्यपि यह कोई नई बात नहीं है जो उसने कही है। यह भी बता दें कि इजावा जाति अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल है।
यहां पर एक अन्य महत्वपूर्ण सच यह भी है कि ब्राह्मण एवं अन्य उच्च जाति के लोग पिछड़ा वर्ग व दलितों के मंदिर में पुजारी नियुक्ति का अधिक विरोध नहीं करते, भले ही छोटे व गांव के मंदिरों के मामले में ही सही। क्योंकि आज की इस परिवर्तनशील दुनियां में हर चीज बदल रही है। लोगों की आर्थिकी बदल रही है, आर्थिक कार्यकलाप बदल रहे हैं, नए-2 आर्थिक क्षेत्र खुल रहे हैं। लोगों के सामाजिक ताने-बाने में परिवर्तन हो रहा है। आज ब्राह्मण युवा धोती लगा कर मंदिरों में पुजारी बनने के स्थान पर सूट-बूट लगा कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में और सरकार के अंदर ऊंचे प्रशासनिक पदों पर बैठना पसंद करते हैं। जहां उन्हें भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ-2 आर्थिक एवं सामाजिक आदर सम्मान और सत्ता भी प्राप्त होती है। वे मंदिर की चाकरी करने और गांव में रहने के बजाय शहरों में जाकर सुख-सुविधा युक्त जीवन जीना अधिक पसंद कराते हैं।
विशेषकर ब्राह्मण युवा पुजारी के धंधे को नापसंद कर रहे हैं। क्योंकि एक समय था जब मंदिर में रहना, पूजा करना ब्राह्मणों के लिए एक एकाधिकारिक धंधा था। सही कहें तो ब्राह्मणों ने इसे धंधे से कम अधिक कुछ नहीं माना। इसलिए यदि दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के युवा मंदिरों को न संभाले तो मंदिर खाली हो जायेंगे, यह बात कम से कम केरल के लिए सत्य है। विशेषकर गांव के छोटे और निजी मंदिर तो बंद हो ही जायेंगे। लेकिन बड़े और प्रसिद्ध मंदिरों के मुख्य पुजारी या ऊंचे पदों पर अब भी वे अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहेंगे। एक अन्य सच की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए वह है एक तरफ तो ब्राह्मण युवा वर्ग की पुजारी बनने की अनिच्छा तो दूसरी ओर अन्य पिछड़ा वर्ग तथा दलित युवाओं में इसके प्रति आकर्षण का बढ़ना।
लाल च ढिस्सा