इधर बेचारे लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग किए हुए दो महीने भी नहीं हुए थे कि लद्दाख के अति उत्साही नेतृत्व (धार्मिक) ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये हैं। 28 सितंबर को छपे समाचारों के अनुसार लद्दाख के बुद्धिस्ट एसोसिएशन ने क्षेत्रफल के हिसाब से आधे के करीब हिमाचल प्रदेश पर अपने अधिकार का दावा ठोका है। एसोसिएशन ने केंद्रीय गृहमंत्री से लिखित मांग की है कि लाहौल-स्पिती और ज़िला चम्बा के पांगी उपमंडल को लद्दाख में मिलाया जाये।
इतने दिनों में तो परिंदों के भी पर नहीं निकलते, लद्दाखियों ने तो उड़ना शुरू कर दिया है। ये वही लोग हैं जो दो महीने पहले तक जम्मू-कश्मीर से अलग होने के लिए संघर्ष करते रहे हैं। कारण बताया जाता था जम्मू-कश्मीर द्वारा दूर स्थित लद्दाख का शोषण, देश-दुनिया के बहुत लोग इस बात से सहमत भी थे। यह भी इंसानी फितरत ही है कि जो लोग दूसरे लोगों के आधिपत्य से निकलने के लिए संघर्ष करें, वही लोग समय आने पर बड़ी बेशर्मी से दूसरे क्षेत्रों पर अपने प्रभुत्व का दावा भी करे। यह कितना उचित या अनुचित है’ यह तो बाद की बात है, लेकिन यह उनकी सोच को अवश्य दर्शाता है।
लाहौल के एक विशेष सांस्कृतिक एवं भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय से संबन्धित होने के नाते, दिल्ली में सिखाये गए लद्दाख के अति उत्साही धार्मिक नेताओं और युवा सांसद नम्ज्ञल से कुछ सवाल करना व कुछ सुझाव देना आवश्यक समझता हूं।
पहली बात यह कि इस प्रकार का मुद्दा उठाना ही नहीं चाहिए था। यदि उठाये जाने की मजबूरी हो तो यह समझ होनी चाहिए कि यह एक राजनैतिक प्रश्न है, धार्मिक नहीं। धार्मिक संस्थाओं को इससे दूर रहना चाहिए।
दूसरी बात लद्दाख वालों को याद रखना चाहिए कि मुगल और डोगरा काल की बातें बहुत पुरानी हो चुकी हैं। इस प्रकार के ऐतिहासिकता के दावे करते रहें तो कुछ का कुछ हो जाएगा।
तीसरी बात न तो लाहौल-स्पीति और पांगी का पहरावा व रहन-सहन और न ही संस्कृति लद्दाख के साथ एक समान है। विशेषकर यहां के आर्य प्रजाति के लोगों का।
चौथी बात इसके अतिरिक्त भी भगवान बुद्ध के अनुयायी होने की बात भी सच नहीं है। लाहौल-स्पिती के 40% से अधिक तथा पांगी के 95% से अधिक लोग अपने को हिन्दू कहते हैं।
पांचवीं बात इन क्षेत्रों में रहने वाले आर्य प्रजाति एवं हिन्दू धर्म मानने वाले बहुत से लोगों की भाषा भी ‘संस्कृत परिवार’ की है न कि ‘भोटी परिवार’ की।
छटी बात इस प्रकार की मांग करने वाले लद्दाखी नेतृत्व और विद्वानों की विद्वता पर शक किए बिना यह पूछने का मन करता है कि क्या उन्हें किलाड़, केलंग, उदयपुर और काजा तथा लेह के बीच की भौगोलिक दूरी नज़र नहीं आती ? जो यहां के प्रशासन को पंगु बनाने के लिए काफी है। या फिर उनका मकसद केलंग को लेह के रास्ते में ‘ट्रांज़िट केंप’ के रूप में विकसित करने की योजना का रहा है ?
सातवीं बात जुमे-2 केंद्र शासित राज्य का दर्जा क्या मिला चले बड़े-2 सपने देखने। इन लद्दाखी नेताओं को हिन्दी टीवी सीरियल ‘मुंगेरी लाल के सपने’ अवश्य देखना चाहिए।
आठवीं बात जो बहुत महत्वपूर्ण है, लद्दाखी अति उत्साही नेताओं को यह भी ज्ञात होना चाहिए कि भारत के बौद्धों की जनसंख्या का 90% दलित (धर्मांतरित) हैं।
नौवीं बात इन नये क्षेत्रों को लद्दाख में मिलाने की मांग करने से पहले अपने साथी एवं पड़ौसी ‘करगिल’ के बारे में सोचना चाहिए।
लद्दाखी मित्रों को एक सलाह देना चाहता हूं, उन्हें अपने नये अस्तित्व व प्रस्थिति को सुदृद करते हुए अपने को स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए न कि इस प्रकार के धर्म राज्य स्थापना का बचकाना सपना देखना।
बता दिया जाये कि इस प्रकार के किसी भी कदम का माकूल जबाव दिया जाएगा।
