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बदल गया है मेरा गांव

  पिछले तीन वर्षों में अपनी मातृक-पैतृक भूमि जहालमा नहीं जा पाया था। कारण था खेती और जमीन की व्यवस्था छोटे भाई के हवाले थी जो दिल्ली में बड़ी नौकरी भी करता है और यहां पर रिमोट से खेती की व्यवस्था भी। उसने किन्हीं गोरखों को मकान समेत खेत संभालवा रखे थे। इसलिए नहीं जा पाया था। यद्यपि लाहौल तो आना जाना होता रहा, लेकिन अपने घर न जा सका। क्योंकि मकान गोरखों के हवाले था, इसलिए रात काटने की समस्या भी थी। हालांकि अन्य लोग गांव जाकर रेस्ट हाऊस आदि में काट कर या किसी अन्य के मेहमानबाजी में गुजारा कर आ जाते थे। लेकिन मैं इस प्रकार गुजारा नहीं कर सकता। इस वर्ष मई के 15 तारीख को जाकर पता चला कि गोरखे नहीं आए हैं। अब लोगों ने तो अप्रैल माह से ही बिजाई करनी शुरू कर दी थी। अपने खेत अभी जुते तक नहीं थे। लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि जमीन बिना जुते ही रह जाएगी।

आनन-फानन में 18 मई को श्रीमति जी और बेटी को लाहौल भेजने का फैसला किया। ताकि कम से कम खेत तो जुत जायें। कई गुणा कीमतें चुका कर खाद-बीज और अन्य आवश्यक वस्तुओं को लिया और किसी तरह लगभग असमय की बिजाई कर दी। फिर मेरा लाहौल जाने का कार्यक्रम बना और 8 जुलाई को बेटी के साथ चले किसी तरह शाम चार बजे जहालमा में उतरे।

जहालमा बस स्टॉप पर उतरते ही लगा कि मैं कहीं और पहुंच गया हूं। जिस जहालमा को मैं जानता था वह इससे बिल्कुल अलग था। पूरी की पूरी सड़क बड़ी-2 कारों से भरी पड़ी थी और मेरे घर के लिए जहां से सड़क जाती थी, के पास सड़क पर ज़िले के सरकारी अफसर हाथों में फूलों की मालायें और विदेशी फूलों के गुलदस्ते लेकर खड़े किसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। सबके चेहरों पर चमक साफ दिखाई दे रही थी, जो गांव के किसानों के चेहरे पर कभी नहीं आती। बाद में पता चला कि हिमाचल प्रदेश विधान सभा की कोई समिति दौरे पर थी और उस समय वहां आगमन था। हम लोग चुपके से अपने रास्ते निकल गए।

रात कट गई। दूसरे दिन गांव के बाजार जहां पर बस ठहराव के साथ-2 कुछ चाय-पानी की दुकानें आदि हैं, की तरफ गया तो पाया कि गांव बिल्कुल बदल चुका है। पांच साल पहले जो था वह सब नहीं था, यहां तक कि तब के अधिकतर दुकान वाले भी बदल चुके थे। बिना कहीं बैठे या चाय पिये वापस चला गया घर। जबकि पहले ‘दवा भाई’ की चाय की दुकान पर घंटों तक बैठा करता था, चाय पर चर्चा अनेकों विषयों पर, राजनीति से गांव के लोगों की व्यक्तिगत मसलों तक की चर्चा होती थी।

लोग गोभी, मटर, आलू, फूलों के बीच झूल रहे थे। मेरा लाहौल बहुत बदल चुका है। कुछ दिनों के प्रवास के दौरान पता चला कि लोग गोभी के चक्कर में पगला से गये हैं। न खाने-पीने का होश न सोने की सुध, कुछ उखाड़ रहे हैं, कुछ लगा रहे हैं….? कुछ लोग गोभी उखाड़ कर मटर लगा रहे थे तो कुछ मटर के खेत को गोभी में बदल रहे थे। कुछ गोभी की फसल काट रहे थे तो कुछ मटर तोड़ रहे थे। खैर! मेरी तो अभी निराई-गोड़ाई ही हो रही थी।

एक ही व्यक्ति जितनी बार मिला, उसने हर बार वही सवाल किया- ’कब आये थे’? मेरे गांव की सड़क (राज्य राज मार्ग), जो लगभग 1.5 किलो मीटर लम्बी है, के दोनों तरफ लम्बी-2 कारें खड़ी रहती हैं। सुबह 4 बजे चलने वाली जहालमा-रिकांगपियो बस को मुड़ने के लिए 3 कि मी से भी ज्यादा दूर दूसरे गांव तक जाना पड़ा। बाद में पता चला कि बस प्रस्थान बिन्दू भी बदला गया है।

लाहौल की कृषि उपजों की क़िस्मों, व्यवस्था आदि में आमूलचुल परिवर्तन आ चुका है। गोभी की पनीरी को खेतों में लगाने के कुछ दिनों बाद ‘ग्रोथ’ की स्प्रे की जाती है ताकि पौधा जल्दी बढ़े और गोभी भी साईज़ में बड़ी हो और जल्दी तैयार हो। रसायनिक खादों और दवाइयों का आवश्यकता से अधिक प्रयोग किया जाता है। लोगों में खाद डालने और पेस्टिसाईड, इन्सेक्टिसाइड तथा फंगीसाइड के अतिरिक्त टॉनिक की स्प्रे का मुक़ाबला चल रहा लगता है। अशिक्षित या अल्पशिक्षित महिलाओं तक को दर्जनों रासायनिक खादों, बीजों, कीटनाशक दवाइयों तथा फसलों की बीमारियों और उनके इलाज और टॉनिकों के नाम जुबानी याद हैं। यह सब लाहौल में चल रही व्यावसायिक खेती के कारण सम्भव हुआ है। यहां तक कि मेरी पत्नी जो कई वर्षों के बाद इसी साल वहां गई थी, को भी ‘ग्रोथ’ की स्प्रे आदि का पता चल चुका था।

दर्जनों तरह की रसायनिक खाद, मटर, गोभी और आलू के बीज, कीटनाशक, फफूंद नाशक और अन्य स्प्रे के साथ ही फसल की अधिक और जल्दी बढ़ौतरी के लिए अतिरिक्त स्प्रे के निदेश हैं। जिनको याद रखना भी मेरे जैसे के लिए असंभव है। वैसे तो किसी के पास आपसे मिलने और बात करने का समय ही नहीं है। लोगों के पास अपने, समाज और समुदाय के लिए तनिक भी समय ही नहीं है।

अब यह न तो गांव रहा और गांव की कविताओं और कहानियों की शांत जीवन की जगह। हर तरफ लोग विकास की हवा के पीछे बदहवास भाग रहे हैं। बातें भी सैंकड़ों या हजारों की नहीं लाखों की होती हैं। अब तो फूलों की खेती भी की जा रही है और दिल्ली के फूल व्यापारियों के हवाले से बताया जा रहा है कि एक बीघा यानि 809 वर्ग मीटर में फूल की खेती से तीन लाख रुपये कमाए जा सकते हैं। अब उसमें कृषि की आर्थिकी क्या है यह वे अभी बता नहीं पा रहे हैं। एक बार उनको पहले भी ठगा जा चुका है, ‘हाप्स’ की खेती का लालच देकर। अब फिर फूल की खेती के पेरोकारों द्वारा बताया गया कि पीछे फूल के एक बाल्ब यानि बीज की कीमत 40 रुपये तक बसूली गई।

जहां तक जीवन शैली की बात है तो मैं दावे से कह सकता हूं कि मेरे गांव ने शहर को मात दे दी है। पूरे गांव जिसमें 50 के लगभग परिवार हैं और उनमें कईयों के 2-2 मकान हैं, मेरे और एक आध अन्य के अतिरिक्त सबके मकान पक्के हो गए हैं यानि कि सीमेंट, प्लास्टर्ड और लेंटर वाले। अपने चारों तरफ ऊंचे-2 पक्के मकानों के बीच मेरा मकान झौंपड़ी सा लगता है।
एक अन्य बड़ा परिवर्तन देख रहा हूं कि गांव के पास सामूहिक जगह के नाम पर एक इंच भी नहीं है। बल्कि परम्पारिक सामूहिक/सामुदायिक व सार्वजनिक ज़मीनों और सम्पतियों को भी हड़प लिया गया है। हर तरफ तारें और बाड़ लगे हुए हैं।

बहुपयोगी बेली का पेड़ जो कभी पूरे लाहौल का ‘जीवन रेखा’ हुआ करता था, जिसका होना महत्वपूर्ण माना जाता था, जो भेड़-बकरियों और गाय, चुरुओं के चारे के साथ-2 ईंधन के रूप में काम आता था, आज उसके लगभग सब पेड़ सूख चुके हैं या सूख रहे हैं। इस मूल्यवान प्रजाति का अस्तित्व खतरे में है, इस पर प्राथमिकता से ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

अब लाहौल में अपवादों को छोड़ तमाम लोग व्यावसायिक खेती करते हैं। लोग चावल, आटा, दालें, अब तो सब्जियां भी बाहर से मंगवा कर खाते हैं। इसलिए परम्पारिक घराट भी बंद हो चुके हैं और उनकी पानी आपूर्ति करने वाली कुहलें भी सूख गई और उनका अस्तित्व भी खत्म हो चुका है। पीने के पानी की आपूर्ति राज्य सरकार के जन स्वास्थय एवं सिंचाई विभाग द्वारा की जाती है और बहुतों के तो वैयक्तिक कनेक्शन हैं लेकिन अधिकतर ने सार्वजनिक नल से पाईप लगा कर अपने-2 लिए पानी खींच रखा है।

प्रधान मंत्री मोदी के स्वच्छता अभियान का असर पड़ा है लगभग सबने अपने शौचालय (पानी वाले) बना रखे हैं। लेकिन उसमें बहुत से किन्तु परन्तु हैं। आधा अधूरा शहर बना दिया गया है। मेरा गांव जो चारों ओर के कई गांव का केंद्र स्थान है। कारणवश नाई, कसाई, मोची, सब्जी वाला और भी छोटे-मोटे व्यवसाय करने वाले अस्थाई तौर पर ही सही निवास करते हैं। उसके अतिरिक्त यात्री, आने जाने वाले, सीजन में व्यापारी आदि के स्वच्छता का क्या प्रबंध है, यह भी गांव के सामने बड़ा प्रश्न है।

हां! आधुनिक जीवन शैली और विकास ने यहां विशेषकर लाहौल की परम्पारिक मल निष्पादन की व्यवस्था प्रणाली को ध्वस्त कर दिया है। यहां पर परम्पारिक तौर पर ‘ड्राई लेट्रीन’ का चलन था, जो जलवायु, स्थलाकृति, स्थिति के अनुरूप दुनियां की बेहतरीन व्यवस्थाओं में एक हो सकता है। यद्यपि आज के दिन इस व्यवस्था को चला पाना कठिन हो सकता है, लेकिन वैज्ञानिक ढंग से इस में सुधार पर सोचा जाना चाहिये

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