अब, जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तक सारे स्टार प्रचारकों का ‘चढ़ाव’ खत्म हो चुका है, मुलायम सिंह यादव से लेकर मुरलीमनोहर जोशी तक प्रदेश की राजनीति के उन धुरंधरों पर एक नजर डालना भी बेहद दिलचस्प है, जो इस चुनाव में अलग-अलग कारणों से बेभाव होकर हाशिये पर चले जाने या वनवास अपनाने को अभिशप्त हो गये.
इनमें सबसे पहले मुलायम की बात करें तो 1989 के बाद प्रदेश का यह पहला चुनाव है, जिसमें उनकी औपचारिक उपस्थिति भी नहीं है. उन्हीं के बनाये उनके मुख्यमंत्री बेटे अखिलेश यादव द्वारा सपा व सरकार दोनों में किये गये अप्रत्याशित तख्तापलट से पहले शायद ही किसी को अंदेशा रहा हो कि उनके जैसे डबल ट्रिपल गेमों के पहलवान ने ‘धरती पुत्र’ और ‘धर्मनिरपेक्षता के सिपहसालार’ के रूप में जिस राजनीतिक साम्राज्य को बड़े मन से खड़ा किया था, उनके परिजनों के बीच छिड़ा सत्तासंघर्ष उसमें उनकी पारी को ऐसे करुण अंत तक पहुंचा देगा. लेकिन पांच दशकों तक फंरटफुट पर खेलते रहे इस महारथी ने राजनीति के मैदान से जाते-जाते भी एक रिकार्ड अपने नाम कर लिया. बिना सदस्यता लिये ही अपनी पुरानी पार्टी लोकदल का स्टार प्रचारक नम्बर वन बनकर!
लेकिन विडम्बना की गाज उन पर कुछ ऐसी गिरी कि ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए वे पुराने गिले-शिकवे भुलाकर बेटे के प्रत्याशियों के प्रचार के लिए तैयार भी हुए तो बेटे ने इस काम के लिए उन्हें पूछा ही नहीं और उनकी भूमिका छोटे भाई शिवपाल और छोटी बहू अपर्णा के प्रचार तक सीमित हो गयी.
शिवपाल की तो उनसे भी बुरी गत बनी क्योंकि जिस झगड़े ने बाप-बेटे को जुदा किया, वह वास्तव में चाचा भतीजे का ही था. भतीजे ने अनुग्रह करके जसवंतनगर की पैतृक सीट से चाचा का टिकट नहीं काटा, लेकिन वहां प्रचार करने गया तो उनका खूब मजाक उड़ाया. इतना ही नहीं, उन्हें किसी और सीट की ओर झांकने तक नहीं दिया.
उसके एक और चाचा बेनी प्रसाद वर्मा कांग्रेस व सपा दोनों में स्टार प्रचारक रहे हैं. वे सपा से ही कांगे्रस में गये थे और कुछ महीने पहले राज्यसभा की सदस्यता के लिए पुराने घर में वापस आये तो उसका कांगे्रस से गठबंधन हो गया. घरवापसी का कारण बताते हुए वे कहते थे कि कांगे्रस में रहकर भतीजे का विरोध नहीं करना चाहते थे. पर बदले हुए समीकरणों ने उनकी किस्मत का ताला ऐसा बंद किया कि वे उसे खोल ही नहीं पाये. उन्हें अपने बेटे के लिए मनचाही सीट से एक अदद टिकट के भी लाले पड़ गये. जिस भतीजे का विरोध नहीं करना चाहते थे, वह उनके गृहनगर बाराबंकी में सपा प्रत्याशियों का प्रचार करने आया तो भी उन्हें नहीं पूछा. तोहमत लगा गया सो अलग कि अपने स्वार्थों के लिए बाप-बेटे में झगड़ा कराने वालों में वे भी थे. तब तक बेचारे बेनी के पास कोई मंच ही नहीं बचा था, जिस पर जाकर वे जवाब देते. इसलिए बाराबंकी में भीतरघात कर सपा प्रत्याशियों को हराने में ही लगे रहे.
भतीजे का कहर एक अन्य चाचा अमर सिंह पर भी बरपा. बार-बार ‘बाहरी’ और ‘दलाल’ कहने के बाद उसने सपा से उनकी छुट्टी की तो वे ‘छुट्टा सांड’ होकर इधर-उधर मुंह मारने लगे. यह उनके खुद के ही शब्द हैं, जो उन्होंने अपने लिए कहे. फिर तो वे पूरे चुनाव न्यूज चैनलों में मुंह मारते और कभी आजम, कभी अखिलेश तो कभी रामगोपाल यादव पर बरसते रहे. पहले खुद को ‘मुलायमवादी’ बताते थे पर अब बेटे के साथ मिलीमार करने के लिए उनको भी कोसते हैं. कहते हैं कि भाजपा में जाने के अनुकूल अवसर का इंतजार कर रहे हैं.
दूसरे खेमे की ओर मुंह करें तो जनसंघ के वक्त से अब तक लम्बा राजनीतिक अनुभव रखने वाले भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डाॅ. मुरलीमनोहर जोशी की हालत इस मायने में मुलायम से बेहतर रही कि जहां मुलायम अपने संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ में भी प्रचार करने नहीं जा सके, जोशी ने अपने संसदीय क्षेत्र कानपुर में भाजपा प्रत्याशियों के लिए वोट मांगे. हां, स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल करने के बावजूद भाजपा ने अन्यत्र कहीं भी उनका इस्तेमाल नहीं किया. उनसे भले तो बड़बोले विनय कटियार ही रहे, जिनका नाम पहले स्टार प्रचारकों की सूची से ही नदारद था, लेकिन बाद में सूची में आया तो उन्होंने कई क्षेत्रों में राम के नाम पर वोट मांगे.
उनके उलट सुलतानपुर के युवा भाजपा सांसद वरुण गांधी परिदृश्य से पूरी तरह बाहर रहे. पार्टी ने उन्हें दूसरे व तीसरे चरण के लिए स्टार प्रचारक बनाया था, लेकिन उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र के प्रत्याशियों तक के लिए कोई सभा नहीं की. उनकी मां मेनका गांधी भी केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद अपने संसदीय क्षेत्र पीलीभीत से बाहर नहीं गयीं. पिछले चुनाव में भड़काऊ बयानों से ख्याति अर्जित करने वाले वरुण चाहते थे कि भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाये. उन्होंने इसके लिए जनसेवा के काम और लाबीइंग भी शुरू की थी. पर कुछ भी उनके काम नहीं आया.
वैसे ही जैसे केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी लोकसभा चुनाव में राहुल को करारी टक्कर देने के क्रेडिट पर भी इस चुनाव में भाजपा के लिए प्रचार का काम नहीं पा सकीं. उनकी रहस्यमय गैरहाजिरी अमेठी में उसी तरह चर्चित रही, जैसे कांगे्रस की स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी का थोडी देर के लिए राहुल के साथ रायबरेली की एक सभा में दिखना और नेपथ्य में चली जाना. अलबत्ता, उनकी अनुपस्थिति से ज्यादा चर्चा उनकी उस भूमिका की रही जो उन्होंने कांगे्रस व सपा के किसी वक्त नामुमकिन दिख रहे गठबंधन को संभव करने में निभायी. यों, चर्चा यह भी थी कि वे अखिलेश की सांसद पत्नी डिम्पल यादव के साथ मिलकर जगह-जगह प्रधानमंत्री को घेरेंगी, मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.
कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बारे में तो खैर लोगों को पहले से पता था कि वे बीमार हैं और इस कारण प्रचार अभियान में शामिल नहीं हो सकेंगी. इसकी क्षतिपूर्ति करते हुए उन्होंने बाद में रायबरेली के वोटरों को एक बेहद इमोशनल पत्र भी लिखा.
भाजपा में कई स्टार प्रचारकों को इसलिए भी मौका नहीं मिला कि पार्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ही निर्भर करती रही, लेकिन उसके सहयोगी अपना दल के दो सांसदों में से एक हरिवंश सिंह इसलिए प्रचार में भागीदार नहीं हो पाये कि उनकी पार्टी में मां-बेटी की लड़ाई में वे किसी के भी वफादार नहीं बन सके. क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी होने के कारण उन्हें उम्मीद थी कि ठाकुर वोटरों को रिझाने के लिए भाजपा उन्हें जरूर प्रचार में लगायेगी. पर उनकी मुराद पूरी नहीं हुई. मुराद तो खैर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भी पूरी नहीं हुई, जो एक समय इस चुनाव में ‘निर्णायक भूमिका’ निभाने की तैयारी कर रहे थे.
प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी राजस्थान की राज्यपाली के चक्कर में अपने अरमान नहीं निकाल सके. उनके उलट खुद को ‘चुनावों का डाॅक्टर’ कहने वाले बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कुछ चुनाव सभाओं में ‘कम्पाउंडर’ नरेन्द्र मोदी की जमकर बखिया उधेड़ी.
-कृष्ण प्रताप सिंह (वरिष्ठ पत्रकार)