हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य के कुछ नये क्षेत्रों, जिनमें ज़िला कुल्लू का मलाणा, पंद्रह-बीस, शिमला का पंद्रह-बीस, डोडराक्वार, ज़िला सिरमौर का गिरिपार तथा कई अन्य क्षेत्र शामिल हैं, को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय के पास भेजा है। यद्यपि इससे पहले भी इस प्रकार का प्रस्ताव भारत सरकार ने अस्वीकृत कर दिया गया था।

यदि उपरोक्त मांग मान ली जाती है और ये क्षेत्र ‘अनुसूचित’ घोषित कर दिये जाते हैं तो राज्य की अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या में लगभग 2.5 लाख की वृद्धि हो जाएगी यानि 2003 से पूर्व की अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या के दो गुणा हो जाएगी। इसका राज्य के सम्पूर्ण अनुसूचित जनजाति के ऊपर जो प्रभाव पड़ेंगे वह अलग रहने दिये जायें और सिर्फ अनुसूचित जनजातीय दलितों या वर्तमान के इन नये क्षेत्रों के अनुसूचित जाति के लोगों के हितों पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ेंगे। इस चिंता को लेकर जनजातीय दलित संघ ने एक विस्तृत प्रतिवेदन के द्वारा इस घोषणा को तब तक स्थगित करने का निवेदन किया था, जब कि इन अनुसूचित जाति के लोगों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती।

यह प्रतिवेदन भारत सरकार के जनजातीय कार्य तथा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालयों के मंत्रियों, हि.प्र. सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्षों, भारत सरकार के महापंजीयक तथा हि.प्र. के जनजातीय विकास विभाग के सचिव को 6.10.16 को भेजे गए थे। अभी तक जिनमें से राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के द्वारा इस पर कार्यवाही की जानकारी प्राप्त हुई है। उन्होंने इस मामले को केंद्र सरकार के गृहसचिव व सचिव जनजातीय कार्य मंत्रालय से उठाया है। अन्य विभागों/ मंत्रालयों को अनुस्मारक भेजे जा रहे हैं।

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प्रतिवेदन में सरकार के ध्यान में लाने का प्रयास दिया गया है कि अनुसूचित जनजाति या ‘शिड्यूल्ड ट्राइब’ और जनजाति या ‘ट्राइब’ के बीच में समुचित अंतर है। अनुसूचित जाति समुदाय नहीं है, अपितु एक समाज है जिनमें हिन्दू समाज की समस्त विशेषताएं विद्यमान हैं। जिनमें जन्माधारित जाति विभेद भी शामिल है। लेकिन सरकारी अभिलेखों और आम जन में यह भ्रांति है कि अनुसूचित जनजाति एक समजातीय (होमोजीनियस) समुदाय है। राज्यसभा में सांसद श्री अली अनवर अंसारी के एक तारांकित प्रश्न के उत्तर में जनजातीय कार्य मंत्री ने बताया है कि अनुसूचित जनजातियों में दलित वर्ग नहीं है। इस उत्तर का आधार ही यह भ्रांति है।

यह भी प्रार्थना की गई है: कि इन क्षेत्रों के अनुसूचित क्षेत्र घोषित हो जाने के बाद जो आज वहां के साधारण वर्ग या सवर्ण हैं वे अनुसूचित जनजाति के हो जाएंगे। लेकिन आज के अनुसूचित जाति के लोग जिन्हें स्वत: ‘अनुसूचित जनजातीय अनुसूचित जाति’ का हो जाना चाहिए, उसमें परिवर्तन नहीं होगा और वह ‘ओपन’ के अनुसूचित जाति के ही रहेंगे।

कि वर्तमान के अनुसूचित जनजाति के लोगों की सुरक्षा एवं सुविधार्थ बनाए गए तीनों अधिनियमों का मतलब भी अनुसूचित जनजातीय दलितों का शोषण ही है।

(1) पहला, पंचायत-उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1996 अनुसूचित जनजातीय दलितों के हितों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।
(2) दूसरा, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 इन पर लागू ही नहीं होता।
(3) तथा तीसरा, वनाधिकार अधिनियम-2006 में वनाधिकार कमेटियों में जनजातीय दलितों के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान नहीं है और न ही भूमि के दावों में किसी प्रकार की प्राथमिकता का। उपरोक्त क्षेत्रों को अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर दिया जाए तो उनका भी उसी प्रकार से शोषण होगा।

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इसलिए निवेदन किया जाता है कि उपरोक्त क्षेत्रों को अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने से पहले इन परिस्थितियों एवं समस्याओं और उन क्षेत्रों के दलितों के हितों को ध्यान में रखा जाये। अन्यथा उनको भी वर्तमान के ‘अनुसूचित जनजातीय दलितों’ की तरह भुगतान पड़ेगा। ध्यान दें ‘अनुसूचित जनजातीय दलितों’ की समस्याएं, अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अनुसूचित जाति (एससी) की समस्याओं का योग हैं। इसलिए जब तक ‘अनुसूचित जनजातीय दलितों’ की सुरक्षा, सुविधा एवं हितों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाती तब तक उपरोक्त घोषणा स्थगित की जाये। जिसके लिए हमारे निम्न सुझाव हैं:-

क.      राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जनजातीय दलितों (अनुसूचित जाति) की अलग से जनगणना की जाये।
ख.      राष्ट्रीय स्तर पर उनके सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक स्थिति का सर्वेक्षण किया जाये।
ग.      राष्ट्रीय स्तर पर उनके लिए, उनकी जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जनजाति के अंदर (7.5%) ही अलग से सुरक्षा और सुविधा का संवैधानिक प्रावधान किया जाये।