आज मैं और मेरी जीवन संगनी ने साथियों साथ देते हुये एक दिन यानि सूर्योदय से सूर्यास्त तक का उपवास रखने का निर्णय लिया है। जिसका उदेश्य बेबस बनाये गए लाखों मजदूरों और उनके श्रम के प्रति सम्मान और साथियों के साथ पूर्ण एकता प्रकट करने के अतिरिक्त इस व्यवस्था और सरकार द्वारा मेहनत से कमा कर खाने वाले मजदूरों को असहाय बना देने के विरुद्ध प्रदर्शन का प्रतीक होगा।

सरकार की कोरोना से निपटने की कोई ठोस नीति न होने, विशेषकर गरीबों, मजदूरों, किसानों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों तथा हाशिये के लोगों का मज़ाक बनाये जाने को अस्वीकार करने का भी प्रतीक होगा।

आज इस कठिन समय में व्यवस्था, शासन-प्रशासन, मुख्य धारा का मीडिया, सोशल मीडिया, गैर सरकारी संगठन, व्यक्ति तथा अन्य सभी अभिकरण इन गरीब लोगों को प्रवचन देने, देशभक्ति और बलिदान की सीख देने में व्यस्त हैं। उनके लिए कुछ ठोस करने के बजाय, उनकी मदद के लिए, उनकी भूख के नाम पर बड़े-2 घोटालेबाजों, लुटेरों से भीख मांगी जा रही है। जो अपनी मेहनत व खून पसीने के बल पर इस देश को चलाने वाले मेहनतकशों और बहादुरों का अपमान और उन्हें परजीवियों के एहसान मानने को मजबूर करने का कार्य भी है।
पूरी की पूरी व्यवस्था गरीबों के नाम पर भीख मांग रही है। उन स्वाभिमानी मस्तकों, उन मेहनती हाथों का अपमान क्यों ? वे इस देश की देनदारियां नहीं, परिसम्पतियां हैं।
वे इस देश का पेट भरते हैं, तन ढकते हैं, सिर छिपाने को छत डालते हैं, देश को लूट कर भागते नहीं।
उन्हें दया और भीख नहीं, अधिकार चाहिए।

एक बार फिर याद करें:
हम लड़ेंगे कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता,
हम लड़ेंगे कि अब तक लड़े क्यों नहीं?- पाश (पाश के आस पास)
जय भीम, सतरंगी सलाम।

‘मजदूर दिवस’ पर हर रंग के झण्डे उठाने वाले मजदूरों को ‘सतरंगी सलाम’

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