Sadprayas

देश के गौरव-3: जो भारत आज़ादी के शहीद हुए, पर उनके नाम कभी पुकारे नहीं गये

राष्ट्र एवं समाज को समर्पित संस्था ‘सद्प्रयास’ का उदेश्य भी और वादा भी रहा है कि हम सदा देश और समाज के हाशिये पर रखे गए लोगों के हित में प्रयासरत रहेंगे। जो सत्य भी है और शाश्वत भी, जिसके लिए हमने कीमतें भी चुकाई हैं, भविष्य में भी तैयार रहेंगे। क्योंकि समर्थों के साथ तो सब कुछ होता है, सब खड़े होते हैं परन्तु असमर्थों, लाचारों का साथ तो उनका साया भी नहीं देता। हर जगह, हर पल उन्हें तिल-2 गलना होता है। हाशिये का आदमी अपनी दैहिक मृत्यु तक कई-2 बार, हजारों-लाखों बार मरता है या मरना पड़ता है या मारा जाता है। उसका कोई अपना अस्तित्व नहीं होता, उसे किसी की परछाई बन कर जीना होता है। वह दूसरों के लिए अपने वजूद को मिटाता चला जाता है। गरीब कहीं देश की सीमा पर, कभी कारखाने में, कहीं खेत मेँ, कभी कहीं राजपथ, कोई नहर, किसी भवन को बनाते हुए जान गंवाता है। लेकिन वह अपने बलिदान को ढोल पीट-2 कर प्रचारित नहीं करता। उसकी कुर्बानियों को भुना कर अपने महल बनाने संदिग्ध चरित्र के लोग तो अन्य ही होते हैं।

जैसे कि हमने वादा किया था कि ‘सद्प्रयास’ देश के उन हजारों देश भक्त वीर सपूतों के बारे में भारत के आम आदमी को संक्षिप्त जानकारी देगा, अपना वादा निभाते हुए ‘देश के गौरव’ स्तम्भ की दूसरी कड़ी अत्यंत हर्ष एवं गौरव सहित समर्पित एवं प्रस्तुत है।

(साभार, हू’ज हू, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार)।

देश के गौरव शीर्षक के नाम से शुरू किए गये इस स्तम्भ की तीसरी कड़ी प्रस्तुत है:
12. अब्दुल सलाम: पिता का नाम श्री गफ्फार। श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर में 1904 में पैदा हुए। दर्जी। नेशनल कांफ्रेस के सक्रिय कार्यकर्त्ता। जम्मू-कश्मीर राज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना के आंदोलन में भाग लिया। निरंकुश शासन के विरुद्ध हुए प्रदर्शन जलूस में भाग लिया। 1941 में गदियार मस्जिद के निकट, जैना कादल, श्रीनगर में जलूस पर पुलिस द्वारा लाठी चार्ज में गंभीर रूप से घायल हुए और उसी दिन शहीद हो गए।

13. अब्दुल सलाम: पिता का नाम श्री गुलाम मोहम्मद। नाई। 1910 में श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर में पैदा हुए। नेशनल कांफ्रेस के सक्रिय कार्यकर्त्ता। जम्मू-कश्मीर राज्य में उत्तरदायी सरकार की स्थापना के लिए चले राजनैतिक आंदोलन में भाग लिया जिसे नेशनल कांफ्रेस ने चलाया। साफ़ाकादल, श्रीनगर में 1946 में निरंकुश शासन के विरुद्ध प्रदर्शन में हिस्सा लिया उस दौरान हुए पुलिस फाइरिंग में शहीद हुए।

14. अब्दुल्ला उर्फ सुखाए: सुपुत्र श्री गोबरी, गांव राजधानी, ज़िला गोरखपुर उत्तर प्रदेश। कृषक। असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया (1920-21)। माल तथा कर न देने के लिए मीटिंग तथा प्रदर्शन का संगठन करने के लिए कांग्रेस के स्वयंसेवी कॉर्प्स में शामिल हुए। एक स्वयंसेवक श्री भगवान अहीर को पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा पीटे जाने के विरोध में चौराचौरी पुलिस स्टेशन के अधीन क्षेत्र में हड़ताल के लिए 24 फरवरी 1922 को लोगों को संगठित किया। परिणामस्वरूप 5,000 लोगों की भीड़ पर पुलिस के गोली चलाने से बुद्धू पाली, खेलावन भर व भगवान तेली मारे गए। भीड़ ने इसके बदले में रेलवे लाइन पर पथराव किया और पुलिस स्टेशन में आग लगा दी। दो उपनिरीक्षक, चौदह सिपाही और छ: पुलिस चौकीदार इस झगड़े में मारे गए। पुलिस ने 273 व्यक्तियों को पकड़ा। श्री अब्दुल्ला को उनके सतरह साथियों के साथ दंगे और हत्या का दोषी ठहराकर मौत की सज़ा दे दी और वे सब फांसी पर चढ़ा दिए गए।

15. अभय राम: गांव बरसाणा, ज़िला जींद, हरियाणा। भारतीय सेना के प्रथम बहावलपुर पैदल सेना में सिपाही थे। आज़ाद हिन्द फौज के तृतीय गुरिल्ला रेजीमेंट में सिपाही भर्ती हुए। बर्मा में शहीद हुए।

16. आचार्य परशुराम: पिता का नाम निवास आचार्य। गांव परतागले, गोवा में 1913 में पैदा हुए। गोवा के स्वतन्त्रता-सेनानियों के खुफिया संगठन आज़ाद गोमांतक दल में शामिल हुए। 19 सितंबर 1956 को परतागले में एक मंदिर पर हमले के दौरान पुर्तगीर्ज पुलिस ने गिरफ्तार किया और यंत्रणाएँ दी। पुलिस के द्वारा शारीरिक यंत्रणा के परिणामस्वरूप उसी दिन शहीद हुए।

 

 

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