राष्ट्रपति चुनाव के लिए हुए मतदान में कुल 77 वोट अवैध घोषित किए गए। इनमें 21 वोट सांसदों के थे। पश्चिम बंगाल विधानसभा से 10, दिल्ली से 6, मणिपुर तथा झारखंड से 4-4 और उत्तर प्रदेश विधानसभा से 2 वोट अवैध पाये गए। अवैध वोटों का कुल मूल्य 20,942 है।
जहां एक और लोकतंत्र में एक-एक वोट को एहम माना जाता है। वहां इस तरह से गैरज़िम्मेदाराना तरीके से हमारे नेताओं का वोट को बर्बाद कर देना एक सवाल निश्चित तौर पर खड़ा करता है। देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद के नेता को चुनने वाले ये वही नेतागण हैं जिन्हें हमने अपने वोटों से जीता कर संसद या विधानसभाओं में भेजा है।
वोट की बर्बादी किसी एक पार्टी विशेष के नेताओं द्वारा नहीं की गयी है। सभी से ये गलती हुई है सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए।
अब सवाल ये है कि क्या निर्वाचन आयोग ने चुनावों से पहले नेताओं को मतदान के तरीके की जानकारी नहीं दी थी। अगर इसमें ढील हुई है तो सिर्फ 4109 विधायकों और 771 सांसदों तक जानकारी ठीक तरीके से नहीं पहुंच रही तो देश की इतनी बड़ी जनसंख्या में आम चुनावों के दौरान कैसे जानकारी पहुंचाई जाती होगी, ये समझा जा सकता है।
एक सवाल और भी खड़ा होता है कि 4109 में से 4083 विधायकों ने वोट दिया 771 में से 768 सांसदों ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया। इन सांसदों और विधायकों की गैरमौजूदगी की वजह क्या पूछी जाएगी कि देश के इतने एहम चुनावों में 26 विधायकों और 3 सांसदों ने अपनी उपस्थिति क्यों नहीं दी। या फिर कोई और वजह रही हो। खबर तो ये भी है की इनमें से कुछ जेल में सजा भी काट रहे हैं। बहरहाल वजह कुछ भी हो हर एक वोट का हिसाब देश की जनता को दिया जाना चाहिए।
कोविंद को सबसे अधिक- 400 वोट उत्तर प्रदेश से मिले और केरल से सबसे कम वोट मिले। मीरा कुमार को आंध्र प्रदेश में कोई वोट नहीं मिला। उन्हें सबसे अधिक वोट-273 पश्चिम बंगाल से मिले।
एलेग्जेंडर ढिस्सा