देश में राष्ट्रवाद उफान पर है जिसका एक उदाहरण ‘असम’ और ‘एनआरसी’ है। विषय चिंतन और चिंता का है। इस विषय में ‘सद्प्रयास’ जनवरी, 2003 के अंक में नव वर्ष पर छपे ‘नए वर्ष पर विशेष’ प्रासंगिक लगा, प्रस्तुत है:

महानायकों की कतार में एक और महानायक है हिटलर। लोगों के सरकार और व्यवस्था विरोधी रुख के बढ़ते जाने से सिर-माथों पर बैठे बेहद चिंतित थे। जर्मनी स्थित ही नहीं बल्कि अमेरिका तक स्थित फोर्ड, जनरल मोटर्स, आईबीएम कम्पनियों के चेयरमैनों-मैनेजिंग डायरेक्टर-जनरलों ने लोगों को नाथने, लोगों की नकेलें कसने के लिए जर्मनी में जमीन तैयार की। तब ‘मुसलमानों’ को नहीं बल्कि ‘यहूदियों’ को मार भगाओ को समस्यायों के सरल समाधान के तौर पर पेश किया गया था। सिर-माथों पर बैठे हुओं के सच और झुठ में कोई फर्क नहीं होता, दोनों एक ही हैं की हक़ीक़त को हिटलर के नेतृत्व में नई बुलंदियों पर पहुंचाया गया। जर्मनी सरकार के संसद भवन को सरकार के मुखिया हिटलर की पार्टी ने आग लगाई और विरोधियों को उस अग्निकांड के लिए जिम्मेदार ठहरा कर हिटलर महानायक बना। ‘संसद पर हमला’ आज से 70 साल पहले जर्मनी में लोगों को नाथने में काम आया।

‘शुद्ध जर्मन’, ‘शुद्ध आर्य’ और राष्ट्रहित और देशभक्ति के हिटलरवादियों के बवंडर ने 1939-45 के कत्लेआम में चर्चिलवादियों, स्तालिनवादियों और रूज़वेल्टवादियों के संग अग्रणी भूमिका अदा की। लेकिन अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जर्मनी सरकार की फौजें मोर्चों पर लड़ रही थी तब जर्मनी स्थित कारखानों में मजदूरों ने सरकार के प्रोपेगंडा और अति सख्ती को अंगूठा दिखा कर उत्पादन 35 प्रतिशत कम कर दिया, ….और युद्धरत हर देश की फौज में ऐसे सैनिकों की संख्या भी लाखों में रही जिन्हों ने मार-काट से परहेज किया … अन्यथा 5 करोड़ के बजाय 50 करोड़ कत्ल हुए होते।

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