Ladakh MP Silent on UT BJP
सत्व और मोह दो शब्द हैं, जो बुद्ध (Buddha) धर्म के लिए अत्यधिक महत्व रखते हैं। जो लोग अध्यात्मवाद के विद्यार्थी हैं वे यह भी जानते हैं कि इन दोनों का प्रयोग भी दो अर्थों में किया जाता है व्यक्तिगत और सामूहिक। तब दोनों के दोनों रूपों के अर्थ विरोधाभासी हो जाते हैं। Ladakh BJP President Resigns, इन में मोह का होना भी और उसका भंग होना भी दुखदायी होता है। व्यक्तिगत और सामूहिक मोह भंग होना कोई नई बात नहीं है।

कभी-2 किसी व्यक्ति या समाज का किसी बात, वस्तु या व्यक्ति से जल्दी ही मोह भंग हो जाता है। जैसे कि छेरिंग दोरजे, प्रदेशाध्यक्ष, भाजपा, लद्दाख का भाजपा के साथ हुआ (Ladakh BJP President Resigns)। कारण कुछ भी हो सकता है, व्यक्तिगत या सामाजिक। अब कारण चाहे जो भी रहे हों, उनकी व्यक्तिगत राजनैतिक इच्छाओं की पूर्ति न होना हो या कुछ और। यद्यपि उन्होंने इस का कारण भाजपा की केन्द्रीय सरकार द्वारा लद्दाख की अनदेखी करना बताया है। लेकिन यदि यह सामूहिक मोह भंग है तो अवश्य ही चिंतनीय विषय है।

वैसे तो लद्दाख (Ladakh) को जम्मू-कश्मीर से अलग करके केन्द्र शासित राज्य बनाए हुए अभी एक साल भी नहीं बीता है। उस समय तो वहां के सांसद नमग्यल साहब (Jamyang Tsering Namgyal) ने संसद में कुछ मिनटों का प्रभावशाली भाषण दिया था, जिस पर भाजपा और उसके समस्त संगठन कुटिलता से मुस्करा रहे थे, जब कि लद्दाखी नेतागण इसे अपनी विजय मान कर आत्मविभोर हो रहे थे। छेरिंग दोरजे (Chering Dorjay) का भाजपा (Ladakh BJP) के प्रदेशाध्यक्ष पद से ही नहीं भाजपा (Ladakh BJP) की प्राथमिक सदस्यता से भी त्यागपत्र देना कुछ तो मायने तो रखता ही है। भले ही कुछ समय के लिए नुकसान की पूर्ति कर ली जाये लेकिन यह साफ है कि यहां सब कुछ ठीक नहीं है।

यह भी कि लद्दाख के सांसद ने अभी तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन इतना अवश्य है कि लद्दाख (Ladakh) को अलग करने से पहले जो सब्ज बाग दिखाये गए थे और उसके बाद के 8-9 महीनो में लद्दाख ने जो देखा, समझा होगा, उससे उसकी आंखें अवश्य खुली गई होंगी। वैसे तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से निदेशित राजनीति में ऐसा होना कोई बड़ी हैरान करने वाली बात नहीं है। क्योंकि छेरिंग दोरजे ने राजनीति कांग्रेस (Congress) से शुरू की थी और टुकड़ों को सूंघते-2 यहां तक पहुंच गए थे। एक बड़ी उपलब्धि केन्द्र शासित प्रदेश के सत्तासीन पार्टी के अध्यक्ष पद पर ताजपोशी।

खैर! लद्दाख के अति उत्साही लोगों ने, भले ही एक धार्मिक संगठन के माध्यम से से हो, आधे हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) पर दावा जताते हुए उन क्षेत्रों को लद्दाख में मिलाने के आशय का पत्र तक केंद्रीय गृहमंत्री (Amit Shah) को लिख डाला था। दावा किए गए क्षेत्र में मेरा जन्म स्थान लाहौल (Lahaul Spiti) भी शामिल था। उस समय भी उस मांग व दावे पर मैंने कुछ लिखा था।

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संदर्भवश जिस के कुछ अंश एक बार फिर दिये दे रहा हूं। ताकि लद्दाखियों को भी और देश को स्मरण रहे। सद्प्रयास में ही एक लेख इधर जम्मू-कश्मीर के चंगुल से छूटे, उधर हिमाचल पर दावा ठोका’ लिखा था। जिस में मैंने कहा था, ‘………इधर बेचारे लद्दाख को जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) से अलग किए हुए दो महीने भी नहीं हुए थे कि लद्दाख के अति उत्साही नेतृत्व (धार्मिक) ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये हैं।……….. इतने दिनों में तो परिंदों के भी पर नहीं निकलते, लद्दाखियों ने तो उड़ना शुरू कर दिया है।’ उसी लेख में लद्दाख के अति उत्साही नेताओं को सुझाव देते हुए लिखा था, ‘……… यदि उठाये जाने की मजबूरी हो तो यह समझ होनी चाहिए कि यह एक राजनैतिक प्रश्न है, धार्मिक नहीं। धार्मिक संस्थाओं को इससे दूर रहना चाहिए।……….आठवीं बात जो बहुत महत्वपूर्ण है, लद्दाखी अति उत्साही नेताओं को यह भी ज्ञात होना चाहिए कि भारत के बौद्धों (Buddhism) की जनसंख्या का 90% दलित (धर्मांतरित) हैं’।

उसके कुछ दिन बाद सुबह-2 एक उत्तराखंडी मित्र जो दिल्ली में रहते हैं, का फोन आया, बधाई दे रहे थे और कारण था लद्दाख का केन्द्र शासित क्षेत्र घोषित किया जाना। उन्हें लग रहा था कि मैं भी बौद्ध क्षेत्र का हूं इस लिए अपने पड़ौसी के जम्मू-कश्मीर (Jammu And Kashmir) से अलग किये जाने पर अवश्य ही खुश हुआ हूंगा। यद्यपि ऐसा नहीं था, क्योंकि मैं लद्दाख और करगिल (जिसका कहीं जिक्र ही नहीं हो रहा है) के भविष्य को लेकर आज भी आशंकित हूं। क्योंकि विकास की चाबी बाज़ार के हाथ में है इस लिए कीमत भी बाज़ार ही तय करेगा। एक बात और भी विकास के लिए ‘मेज़बान क्षेत्र’ व ‘मेजबान लोगों’ को कीमत चुकानी ही पड़ती है।

हैरानी तो लद्दाख (Ladakh) के नेताओं, प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रियाओं पर हो रही है। सब एक ही सुर में गा रहे हैं- ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो……..’। माना जा सकता है कि केंद्र शासित क्षेत्र होने से शासन-प्रशासन सीधे दिल्ली से होगा। लेकिन दिल्ली (Delhi) इतनी आसान भी नहीं है। वित और संसाधन सीधे अपने पास हों तो हो सकता है भ्रष्टाचार कम हो और विकास के कार्य अधिक। फिर भी एक संशय तो बना रहेगा कि सत्ता की नज़दीकियां और संसाधनो तक सीधी पहुंच का लाभ कुछ ही लोग लपक लें। शेष पूरा लद्दाख (करगिल सहित) क्षेत्र छतीसगढ़ और झारखंड के रास्ते निकल पड़े।

यह भी देखा गया है कि आज तक विकास के नाम पर जितनी लूटपाट और शोषण हुआ है उतना अन्य किसी बहाने नहीं हुआ है। विकास की अपनी एक कीमत है जिसे तय करना भी उसके हाथ में नहीं है। क्षेत्र और व्यक्ति को कीमत चुकानी पड़ेगी और यह लद्दाख (Ladakh) -करगिल (Kargil) के अस्तित्व, अस्मिता और पहचान भी हो सकते हैं।

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इस मामले में लद्दाख (Ladakh) के लोगों विशेषकर अत्योसाहित युवा सांसद नमग्यल को ज्ञात हो कि देश में ऐसे क्षेत्र भी हैं जिन्हें अनुसूचित क्षेत्र (Scheduled Area) कहा जाता है, जिनका शासन-प्रशासन संविधान के अनुच्छेद 244(1) के भीतर चलाया जाता है। 5वीं अनुसूची के इन क्षेत्रों के आर्थिक, राजनैतिक हितों तथा सांस्कृतिक व प्रजातीय अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों को संरक्षित करने के उद्देश्य से भूरिया समिति की सिफ़ारिश पर 1996 में देश की संसद ने एक कानून बनाया था, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 (PESA), (Extension to Scheduled Areas, Act, 1996) जिसे बाद में देश के सभी राज्यों ने भी अपने यहां कुछ कांट छांट के बाद लागू किया। हि.प्र. में इसे 1997 में पंचायत राज अधिनियम के संशोधन के रूप में लागू किया गया। इस अधिनियम से शासित होने वाले क्षेत्रों में एक क्षेत्र ज़िला लाहौल-स्पिति भी है। यहां इस एक्ट का किस प्रकार से दुरुपयोग किया जाता है, इसके उदाहरण स्वरूप आप बीती सुना रहा हूं।

कुछ समय पहले देश के पर्दे के पीछे के बादशाह अंबानी (Mukesh Ambani) साहब ने देश के अन्य क्षेत्रों की तरह ही लाहौल क्षेत्र में भी ‘जियो’ (Jio Tower) के कई दर्जन टॉवर लगाने का निर्णय सुनाया और हिमाचल प्रदेश की सरकार जैसा कि विदित है उसके सामने बिछ गई। इस महान व्यक्ति का एक टावर मेरे गांव में भी लगना था। जिसके लिए मेरा एक खेत चुना गया। मैं भी तैयार हो गया। समस्त औपचारिकताएं पूरी करके समझौते (एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर होने के लिए कोर्ट तक पहुंच गया। उसी पल मुझे न जाने क्यों कुछ शक हुआ और मैंने समझौते की प्रति को पढ़ने की इच्छा प्रकट की। बड़ी न नुकर के उपरान्त प्रति मिली तो पाया कि वह 12 जुडीशल साइज कागज में था। पढ़ा तो पाया कि (1) वह कोई एग्रीमेंट था ही नहीं बल्कि वह एक अधिग्रहण था। क्योंकि ज़मीन का मासिक किराया उन्होंने (अंबानी) पहले ही तय कर रखा था। (2) जहां अन्य जगहों पर 520 वर्ग फुट का किराया 15000/- रुपये (विज्ञापन के अनुसार) था यहां 2420 वर्ग फुट का मासिक किराया मात्र 4500/- रुपये तय था। (3) शक तब और भी गहरा हुआ जब पता चला कि एक टावर ऐसी जगह (घाटी) पर लगना तय है जहां पूरे क्षेत्र (घाटी) की आबादी मात्र 275-300 है। यह भी बताया गया कि एक टावर पर कम से कम एक करोड़ रुपये का खर्चा बैठता है। इस सब को देखते हुए मैंने समझौते पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। वह इसलिए भी कि मैं अपने क्षेत्र के लूट खसूर में भागीदार नहीं बनना चाहता था।

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यद्यपि प्रधानमंत्री (Narendra Modi) समेत सरकार, और शासन-प्रशासन ने सीधे भी और अन्य माध्यमों के द्वारा भी लद्दाख के लोगों से कहा है कि उनकी ये शंकाएं निर्मूल हैं। साथ में उनके हितों और प्रजातांत्रिक अधिकारों को सुरक्षित रखने का आश्वासन भी दिया है। लेकिन समय ने यह भी बताता रहा है कि राजनीति अपने वादों पर अधिक देर तक नहीं टिका करती।

इस मामले में देश के सामने कई अन्य उदाहरण भी हैं जहां सरकारें हाशिये के लोगों के हितों और अधिकारों को सुरक्षित रख पाने में असफल रही हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण है अनुसूचित जनजातियों (अनुसूची 5) के लोगों के हित रक्षा के उद्देश्य से बनाए गए कानून ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर) अधिनियम-1996 का नाकाफी होना। जिसके चलते अनुसूची-5 क्षेत्र के लोगों ने 2013 में अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) पर बनी उच्च स्तरीय समिति (खाखा) को प्रतिवेदन देकर उससे बड़े और सख्त कानून बनाने का आग्रह किया था। या फिर संविधान की 6टी अनुसूची की तरह अनुच्छेद 244(2) और 275(1) के अधीन शासित करने का। या फिर अनुच्छेद 371 का उनके सम्बंध में विस्तार किये जाने का। जेडीएस (जनजातीय दलित संघ) ने भी अनुसूचित जनजातीय दलितों के अस्तित्व, अस्मिता और अधिकारों के लिए उपरोक्त समिति में एक याचिका दायर की थी।

इसके अतिरिक्त भी देश के समस्त राज्यों ने अपने स्थायी निवासियों के ज़मीनों और अन्य तरह के हितों को सुरक्षित करने के लिए अपने यहां कानून बना रखे हैं। हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में भी एक ऐसा ही कानून है- हि.प्र. काश्तकारी एवं भू-सुधार अधिनियम-1972, जिसकी धारा-118 गैर-कृषक व गैर-हिमाचली को प्रदेश में जमीन खरीदने के अयोग्य बनाती है। इस धारा को बार-2 खींचा/नापा जाता रहा है। अभी कुछ दिन पहले अनुच्छेद 370 (Article 370) और 35A को संविधान से हटा देने के बाद हि.प्र. भाजपा (BJP) के उपाध्यक्ष ने इस धारा-118 में संशोधन का मामला उठा दिया है। प्रदेशाध्यक्ष को जिसका खंडन करना पड़ा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मामला खत्म हो गया है, बस कुछ समय के लिए दबा है।

himsatta 1991 jansatta

आज से 23 साल पहले 1996 में जनसत्ता समाचार पत्र द्वारा धारा-118 पर एक लम्बी बहस चलाई गई थी। जिसमें बहुत से लेख छपे थे। लेकिन मुझे अपने साथ दो अन्य लोगों के लेख याद हैं। मेरे अतिरिक्त एक लेखक इसे हटा देने के पक्ष में थे, जबकि दूसरे जोकि कुल्लू से थे और जिन्हों ने इस तरह की स्थिति को देखा और महसूस किया था, इसमें संशोधन की बात कर रहे थे। जबकि मैं तो धारा-118 का समर्थन ही नहीं अपितु इसे अधिक सख्त बनाने के पक्ष में था (लेख को दिया जा रहा है)। यहां, यह बता दूं कि वर्तमान की व्यवस्था में वे दोनों (लेखक) अच्छे से स्थापित हो चुके हैं और मैं….. ?