कुछ दिन पहले डॉ. सत्य पाल सिंह केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री, ने डार्विन के उद्विकास के सिद्धांत को अमान्य घोषित कर दिया है, क्योंकि किसी ने भी बंदर से मनुष्य बनते हुए नहीं देखा। यह बिलकुल सही कथन है। यह भी उतना ही सच है कि मनुष्य भी उतने लंबे समय तक जीवित नहीं रहता, जितने समय में एक प्रजाति का उद्विकास होता है। तब तो यह भी सच है कि डॉ. सत्य पाल सिंह, शिक्षा मंत्री साहब की आयु यदि दस लाख या एक करोड़ साल की होती तो अवश्य ही उन्होंने ऐसा होते हुए देखा होता। एक बात समझ में नहीं आती कि जिस किसी घटना या वस्तु को देखा न गया हो या जिसका प्रमाण न हो तो उसे झूठा घोषित कर देना क्या 21वीं सदी के मानव के बुद्धि विकास के साथ मेल खाता है? वह भी एक ऐसे मनुष्य जो कि इस धरती पर एक सौ तीस करोड़ मनुष्यों की शिक्षा के लिए सीधा जिम्मेदार हो। मेरी आयु पैंसठ वर्ष की है, लेकिन मैंने अपने दादा से पहले के पीढ़ी के किसी व्यक्ति को नहीं देखा, तो क्या मेरे लिए उनका होना झूठ हो सकता है? इस तरह तो बहुत बहुत सी घटनाओं, वस्तुओं यहां तक रिश्तों का अस्तित्व भी शक के दायरे में आ जाता है। यह समस्या तब और भी विकट हो जाती है जब इनको प्रमाणित करने के तरीकों को ही अमान्य घोषित कर दिया जाता है।

मंत्री महोदय इस देश के कई राजनेताओं की तरह अशिक्षित व कम शिक्षित हों ऐसा भी नहीं है। बताया जाता है वह विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं और रसायन शास्त्र में एमएससी, एमफिल और पीएचडी की उपाधियां प्राप्त किए हुए हैं। इसके अतिरिक्त भी वह इस देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में एक अखिल भारतीय सेवा के महाराष्ट्र केडर के आईपीएस हैं और राजनेता बनने से पहले पुलिस आयुक्त के पद पर आसीन थे।

इस प्रकार से डार्विन के सिद्धांत को गलत करार देने के बाद उस सिद्धांत का विकल्प उन्होंने क्या दिया है, यह तो हाल तक ज्ञात नहीं। वे क्योंकि देश की उच्च शिक्षा के लिए भी जिम्मेदार हैं इसलिए डार्विन के सिद्धांत का कोई तर्क संगत विकल्प देना भी आवश्यक होगा। इतना जिम्मेदार किस्म का व्यक्ति बिना किसी आधार के कोई बयान दे दे यह तो संभव नहीं लगता। इस लिए उनकी इस घोषणा को हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन यहां मेरे मन में एक अन्य प्रश्न खटकता है, मंत्री महोदय इतने विद्वान व्यक्ति हैं कि अब भी चार पुस्तकें लिखने की परियोजना पर कार्यरत हैं। यदि उनकी आईपीएस की प्रतियोगिता में डार्विन के सिद्धांत पर कोई प्रश्न आया तो क्या होता? और भी यदि उसी या किसी अन्य प्रतियोगिता या परीक्षा में डार्विन के उद्विकास के सिद्धांत पर प्रश्न आ जाये और मंत्री जी पेपर का मूल्यांकन करने वाले हों तो उन सब प्रतियोगियों और परीक्षार्थियों के परिणाम के बारे में अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा।

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उन्होंने इस घोषणा के कारणों में इसके ऐतिहासिक प्रमाण न होना ही एक मात्र कारण नहीं माना है अपितु यह भी दावा किया है इस बात का जिक्र न तो किसी धर्मग्रन्थ व किसी महाकाव्य में मिलता है और न ही किसी मिथक में। इसका सीधा अर्थ है उनका यह मानना है कि महाकाव्य आदि में भी इसे स्थान प्राप्त नहीं है। इस प्रकार का दावा करने का उनका उद्देश्य यह है कि संसार में मानव के पैदा होने का कारण उद्विकास नहीं अपितु धर्मग्रन्थों की व्याख्या आधारित शक्ति यानि भगवान ही है।

मानव उत्पति के दो सिद्धांत हैं एक उद्विकास (क्रम विकास) और दूसरा गढ़ना (सृजन)। आज के दिन भी इस बात पर बहस चल रही है कि इन दो सिद्धांतों में किसे पढ़ाया जाये और किसे छोड़ा जाये या फिर दोनों को साथ-2 पढ़ाया जाये? क्योंकि 20वीं सदी के पूर्वार्ध में अमेरिका के टेनेनसी के ‘डेटन’ में एक स्कूल अध्यापक जॉन टी स्कोप को मानव के उद्विकास के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए 100 डॉलर का जुर्माना किया गया था। अमेरिका में मानव उद्विकास के सिद्धांत को पढ़ाना बटलर एक्ट के अधीन बंद किया गया था। इस लिए मंत्री साहब ने ब्यान देकर इस बहस को यूं ही नहीं छेड़ा है इसके पीछे बड़ा उदेश्य छुपा हुआ है।

जैसे कि हर धर्म और परंपरावादी व्याख्याओं में कहा गया है कि किस प्रकार भगवान ने धरती बनाई और किस प्रकार उसमें मानव जाति को पैदा किया। इस प्रकार की मिथक व्याख्याएं सिर्फ स्थापित और संगठित धर्मों में ही विद्यमान हो ऐसा नहीं बल्कि वे तो हर आदिवासी या अन्य समूह में गहरे बसा हुआ है। मेरे ही एक छोटे से समुदाय जिसके सदस्यों की संख्या 2011 की जनगणना के अनुसार मात्र ढाई हजार है और जो हिमाचल प्रदेश के दूरस्थ और कठिन क्षेत्र लाहौल में निवास करता है, में भी मानव उत्पति की पारम्परिक कथा है। यद्यपि यह कहानी मौखिक रूप से एक से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाई जाती रही है और एक क्लासिक गीत, ‘घूरे’ के रूप में।

‘घूरे’ (गीत) की बानगी:

इशरू महादेव-ए क्या धोर कीति जी ओ।———(2)
जाला उपर-ए महादेवेरि जाटे जी ओ————–(3)
तेता ऊपर-ए कन्या कुमारी जी ओ—————(4)

उपरोक्त पंक्तियां, लाहौल में बोली जाने वाली एक समुदाय की भाषा में गाये जाने वाले गीत की हैं। जिसमें प्रलय के बाद ईश्वर द्वारा पृथ्वी की रचना तथा मनुष्य की उत्पति के बारे में वर्णन किया गया है। इसकी पहली पंक्ति का अर्थ है- (प्रलय के दिन) जल और स्थल मिल कर ‘जल कुम्भ’ बन गया (था)। दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि (इस स्थिति में) भगवान महादेव ने क्या उपाय किया? तीसरी पंक्ति में बताया गया है कि जल के ऊपर महादेव की जटाएं (डाली) गई। चौथी पंक्ति में कहा गया है कि उस (महादेव की जटाओं) के ऊपर कुवांरी कन्या (शक्ति) को लिटाया गया। इसी प्रकार उसके ऊपर गुगुल खंबा फिर बैल उसके ऊपर तांबे की धरती और अंत में पत्थर-मिट्टी की धरती। इस प्रकार इशरू महादेव (ईश्वर) ने धरती बनाई और मन्वाणी (संसार) की रचना की। उसके बाद फिर मानव का निर्माण शुरू किया:
इशरू महादेव-ए क्या धोर कीति जी ओ———(1)
सोना खइरेरा मनुख घड़ाई जी ओ—————(2)
सोनेरे मनुखेरा कन छाडी बिसरी जी ओ——–(3)
दुरा जाई-ए हक लगा देणे जी ओ—————(4)
न कीति हूं-ए न की हुंकारे जी ओ————–(5)
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इशरू महादेव-ए गोबूरा ढो जी ओ—————(6)
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छारा खइरेरी मनुख घड़ाई जी ओ—————(7)
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छारेर मनुख-ए हुंकार धारी जी ओ————–(8)

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इस तरह संसार की रचना करने के बाद महादेव ईश्वर ने क्या उपाय किया (पहली पंक्ति का अर्थ)? दूसरी पंक्ति में यह बताया गया है कि खनिज सोने का मनुष्य बनाया। तीसरी पंक्ति का मतलब है कि सोने के आदमी के कान लगाना भुला दिया था। चौथी लाइन में कहा गया है कि (ईश्वर) दूर जाकर आवाज देने लगा। (परन्तु सोने के मनुष्य ने) कोई जबाव नहीं दिया (पांचवीं पंक्ति)। तत्पश्चात भगवान ने कई अन्य धातुओं से मानव बनाये लेकिन किसी न किसी कमी के रह जाने के कारण पूर्ण मानव नहीं बनाया जा सका। ईश्वर ने (सूखा) गोबर एकत्रित किया (छट्टी पंक्ति का अर्थ) और धूनी रमाई तथा उससे राख बनाई। उस राख से मनुष्य बनाये, सातवीं पंक्ति अर्थ। राख से बनाये मानव ने उसकी आवाज़ का जबाव दिया और इस प्रकार भगवान के द्वारा दुनियां में मानव उत्पन्न किया गया।

यद्यपि उपरोक्त गीत (घूरे) उस समय की उत्कृष्ट काव्य कृति यानि अति उत्तम क्लासिकल गीत रहा होगा। जिसमें की गई कल्पना तब के हिसाब से बहुत आगे की सोच रही होगी। लेकिन उस समय की काबिलियाई सोच की अपनी एक सीमा थी और वह थी ज्ञान और सूचना की सीमा। कुछ क्षेत्रों, समुदायों तथा व्यक्तियों के लिए आज भी हालात बहुत बदले हुए हों ऐसा नहीं लगता। इस बात के उदाहरण बहुतायत मिल जाते हैं। आज भी बड़ी संख्या में लोग, अच्छे पढ़े लिखे भी सन्तान को भगवान की देन मानते हैं। हर जीवन मरण को भगवान की मर्ज़ी समझा जाता है। जबकि सब जानते हैं कि किसी के जन्म की पूरी प्रक्रिया में उसके माता-पिता की तो कोई भूमिका हो सकती है लेकिन भगवान की कोई भूमिका नहीं होती।

इस प्रकार हमारे मंत्री महोदय भी मजबूर थे अपने हालातों से क्योंकि वह जिस विचारधारा के सदस्य हैं उस पार्टी के पास इसके अतिरिक्त लोगों के पास जाने और वोट लेने के लिए कोई भी कार्यक्रम और मुद्दे नहीं हैं। यह वह पार्टी है जिसने रथ यात्रा शुरू की थी। यह वही पार्टी है जो हर पुराने मंदिरों और परम्पराओं के चारों तरफ अपने अस्तित्व को तलाशती है। मंत्री जी भी उसी वर्ग से आते हैं जिसने 2003 में त्रिशूल बांटने का कार्यक्रम शुरू किया था। वह उन्हीं में से हैं जो दावे करते हैं कि विदेशियों के आने से पहले ही उनके पूर्वजों के पास आज तक के विज्ञान के समस्त आविष्कारों का ज्ञान था। वही हैं जो हर ‘पद्मावती’ को ‘पद्मावत’ बनवाने के लिए उत्पात मचाते हैं और अंत में आत्म समर्पण कर देते हैं यहां तक कि हर खड़े ढांचे के नीचे मंदिर होने का दावा करना भी इनकी मजबूरियों में शामिल है। इनकी बुरी नजर तो देश की शान ‘ताजमहल’ पर भी पड़ चुकी है।

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इस प्रकार के विचारों का आना कोई नई बात नहीं है। क्योंकि धर्म के ठेकेदारों ने कभी भी वैज्ञानिक सोच का समर्थन नहीं किया है। धर्म तथा विज्ञान ने सदा ही एक दूसरे के सामने विरोधियों के रूप में खड़े रहने का प्रयास किया है। यह भी सच है कि धर्म कुछ अधिक ही विज्ञान को चुनौती देने की फिराक में रहता है। सदा से होता आया है कि कई मामलों में धर्म ने विज्ञान का विरोध किया है। इसका एक उदाहरण है कुछ समय पूर्व चलाये जा रहे परिवार नियोजन के कार्यक्रम। एक समय था कि धर्म ने इस विचार का कड़ा विरोध यह कह कर किया था कि यह ईश्वर के विधान को चुनौती है। इस मामले में आज पश्चिमी देशों में चर्चों में आने जाने का रिवाज कुछ कम हो रहा है। एक समय था जब हर प्रकार के विचार विमर्श, शिक्षा, ज्ञान आदि का कार्य अधिकतर चर्च से ही चलता था। लेकिन अब चर्च में आना जाना कम हो गया और शिक्षा संस्थानों में आना जाना अधिक हो गया। इसलिए इस प्रकार की चर्चाओं का स्थान चर्च की जगह शिक्षा संस्थान हो गए हैं।

लेकिन भारत जैसे देशों में अभी तक इस प्रकार के परिवर्तन कम हुए हैं। इसलिए इस प्रकार की चर्चाएं कहीं से भी शुरू हो जाती हैं। यहां ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि समस्त धर्म सदा ही विज्ञान के विरोधी रहे हैं। जहां पर विज्ञान के विरोध की बात होती वहां सब धर्म एक साथ हो जाते हैं। अन्यथा सदा ही आपस में लड़ते हुए दिखते हैं। हर धर्म अपने मानने वालों की संख्या बढ़ाने के लिए अत्यधिक चिंतित, तत्पर और प्रयासशील रहता है। इसके लिए तो अलग-2 धर्मों के अनुयायी आपस में मार काट तक पहुंच जाते हैं।