गांधी जी द्वारा 12 मार्च 1930 से 6 अप्रेल 1930 तक ‘दाण्डी यात्रा’ सम्पन्न कर, नमक बना कर,  नमक पर लगाए कर के विरोध को भारी जन समर्थन मिलने पर अमेरिकी समाचार पत्रिका टाइम ने लिखा था कि उसने अंग्रेज़ शासकों को ‘गहरे तौर पर बेचैन’ कर दिया है’। इससे अंग्रेजों को महसूस हो गया था कि अब भारत पर अधिक दिनो तक शासन नहीं किया जा सकता है, और भी सायमन आयोग, जिसने वर्ष 1928 में भारत का भ्रमण किया था, की संस्तुतियों का अनुसरण करते हुए ब्रिटिश सरकार ने अक्तूबर 1930 में भारतीय प्रतिनिधियों, ब्रिटिश सरकार तथा ब्रिटिश राजनैतिक दलों का एक सम्मेलन बुलाया। जिसे गोलमेज़ सम्मेलन के नाम से जाना जाता है, जिसका उदेश्य भारतीयों की मांगों को पूरा करते हुए एक संविधान का निर्माण करना था। पहला गोलमेज़ सम्मेलन लंदन में 12 नवम्बर 1930 को आरम्भ हुआ। उस सम्मेलन में कुल 89 प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था। जिसमें भारत से कांग्रेस दल ने भाग नहीं लिया। उस सम्मेलन में दलितों के हितों की सुरक्षा के लिए डॉ. अम्बेडकर ने संविधान में शामिल करने के लिए अल्पसंख्यक उपसमिति के समक्ष एक योजना प्रस्तुत की।

जिसके अनुसार :

(1) दलितों को अन्य भारतीयों के बराबर नागरिकता का अधिकार दिया जाये।
(2) अस्पृश्यता और उस पर आधारित अनहर्ताओं को समाप्त किया जाये। उसमें यह मांग भी की गई :
(क) दलितों को विधान मण्डल में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाये और उन्हें पृथक निर्वाचन द्वारा अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया जाये।
(ख) सरकारी सेवाओं में दलितों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाये।
(ग) दलितों की सरकारी सेवा में भर्ती हेतु एक लोक सेवा आयोग की स्थापना की जाये।

प्रथम गोलमेज़ सम्मेलन की अनुवर्ती कार्रवाई के रूप में दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन 7 सितंबर, 1931 को शुरू हुआ। इस सम्मेलन में कुछ अल्पसंख्यकों और दलित व अन्य अल्पसंख्यकों के राजनैतिक हितों को रखते हुए गांधी जी ने कहा- “कांग्रेस ने हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख गुत्थी को सुलझा कर विशेष अधिकारों को स्वीकार कर लिया है, क्योंकि इसके एतिहासिक कारण थे किन्तु कांग्रेस इस सिद्धांत को अन्य समुदायों के लिए किसी भी रूप में स्वीकार नहीं करेगी। जहां तक दलित श्रेणियों का प्रश्न है, मुझे यह कहना है कि दलित श्रेणियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने की कांग्रेस भी डॉ. अम्बेडकर के साथ ज़िम्मेदारी निभाएगी। दलित श्रेणियों के हित कांग्रेस को उतने ही प्रिय हैं जितने अन्य किसी व्यक्ति या समूह को। इसलिए मैं और अधिक विशेष प्रतिनिधित्व का प्रबल विरोध करूंगा।”

गांधी जी के भाषण से डॉ. अम्बेडकर समझ गए थे कि वह न केवल दलितों बल्कि भारतीय ईसाइयों, एंग्लो भारतीयों, यूरोपियन एवं अन्य अल्पसंख्यकों का विरोध करेंगे। इस लिए 21 सितंबर 1931 की अल्पसंख्यक समिति की बैठक में डॉ. अम्बेडकर ने कहा- “जो लोग वार्ता में शामिल हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि उन्हें समिति ने समस्या का हल करने के लिए पूर्णाधिकारी नियुक्त नहीं किया है। श्री गांधी और अन्य दलों के प्रतिनिधित्व का स्वभाव चाहे जो हो, वे हमें निश्चित रूप से बाध्य नहीं कर सकते। मैं यह बात इस बैठक में बलपूर्वक कह रहा हूं। दूसरे, मैं यह कहना चाहता हूं कि एक अल्पसंख्यक वर्ग और कांग्रेस के मध्य जो समझौता होता है, वह मेरे लोगों पर बाध्यकारी नहीं हो सकता। मेरा इस प्रश्न पर कोई विवाद नहीं है कि किसी समुदाय विशेष को महत्व मिलना चाहिए या नहीं, किन्तु मैं यह बलपूर्वक कहना चाहता हूं जो कोई भी किसी वर्ग के महत्व का दावा करता है या जो कोई भी किसी वर्ग को महत्व देता है, उसे वह मेरे हिस्से से नहीं दे सकता। मैं यह बात पूरी तरह स्पष्ट कर देना चाहता हूं।”

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दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में गांधी जी तथा डॉ. अंबेडकर द्वारा दलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध तथा पक्ष में निम्न दलीले दी गई।

पृथक निर्वाचिका पर गांधी जी के विचार

गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी ने दमित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिका प्रस्ताव के खिलाफ अपनी दलील पेश करते हुए कहा था:
“अस्पृश्यों” के लिए पृथक निर्वाचिका का प्रावधान करने से उनकी दासता स्थायी रूप ले लेगी… । क्या आप चाहते हैं कि “अस्पृश्य” हमेशा “अस्पृश्य” ही बने रहें? पृथक निर्वाचिका से उनके प्रति कलंक का यह भाव और मजबूत हो जाएगा। ज़रूरत इस बात की है कि “अस्पृश्यता” का विनाश किया जाए और जब आप यह लक्ष्य प्राप्त कर लें तो एक अड़ियल “श्रेष्ठ” वर्ग द्वारा एक “कमतर” वर्ग पर थोप दी गई यह अवैध व्यवस्था भी समाप्त हो जाएगी। जब आप इस अवैध प्रथा को नष्ट कर देंगे तो किसी को पृथक निर्वाचिका की आवश्यकता ही कहां रह जाएगी?

पृथक निर्वाचिका पर डा. अम्बेडकर के विचार

दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिका के प्रस्ताव पर महात्मा गांधी की दलीलों के जवाब में डा. अम्बेडकर ने लिखा था : ‘हमारे सामने एक ऐसा वर्ग है जो निश्चय ही अस्तित्व के संघर्ष में खुद को कायम नहीं रख सकता। जिस धर्म से ये लोग बंधे हुए हैं वह उन्हें सम्मानजनक स्थान प्रदान करने के बजाय कोढ़ियों की तरह देखता है जिनके साथ सामान्य संबंध नहीं रखे जा सकते। आर्थिक रूप से यह ऐसा वर्ग है जो दो वक्त की रोटी के लिए सवर्ण हिंदुओं पर पूरी तरह आश्रित है; जिसके पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है। न केवल हिंदुओं के सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण उनके सारे रास्ते बंद हैं बल्कि समग्र इतिहास में हिन्दू समाज ने उनके सामने खुलने वाली हर संभावना को बंद कर दिया है जिससे दलित वर्गों को जीवन में ऊपर उठने का कोई अवसर न मिल सके।

इन परिस्थितियों में सभी निष्पक्ष सोच वाले व्यक्ति इस बात पर सहमत होंगे कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि ऐसे अपंग समुदाय के पास संगठित निरंकुशता के विरुद्ध जीवन के संघर्ष का एकमात्र रास्ता यही है कि उसे राजनैतिक सत्ता में हिस्सा मिले जिससे वह अपनी रक्षा कर सके…..।‘

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अब क्योंकि गांधी जी और डॉ. अम्बेडकर के बीच मतभेद के कारण सम्मेलन में गतिरोध पैदा हो गया था इसलिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने 1 दिसम्बर, 1931 के सम्मेलन स्थगित कर दिया। क्योंकि डॉ. अंबेडकर ने गांधी जी का विरोध किया था, इसलिए वह भारत में सब से अधिक घृणित व्यक्ति बन गए। उन्हें असभ्य, अत्यधिक अशिष्ट, अभद्र और मानवीय भावनाओं से रहित व्यक्ति कह कर उनकी निंदा की गई। उन्हें शैतान और अंग्रेज़ी सरकार का पिट्ठू, देशद्रोही और हिन्दू धर्म का विनाशकारी व्यक्ति कहा गया।

यहां बता दिया जाये कि उससे पहले 1919 में डॉ. अम्बेडकर ने साऊथबोरो समिति के सामने वक्तव्य देते हुए भी पृथक निर्वाचन की मांग रखी थी। यद्यपि दलित श्रेणियों के अन्य नेताओं ने भी साऊथबोरो समिति के समक्ष पृथक निर्वाचन की मांग रखी थी। लेकिन 1919 के अधिनियम में ब्रिटिश सरकार ने जानबूझ कर दलित श्रेणियों के पृथक निर्वाचन की मांग को अनदेखा कर दिया। हालांकि 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम में प्रांतीय राज्यपालों को दलित श्रेणियों के प्रतिनिधियों को राज्य विधानमंडलों में नामांकित करने का अधिकार दिया था, किन्तु दलित श्रेणियों में शिक्षित व्यक्ति उपलब्ध न होने के कारण गैर दलितों को उनके प्रतिनिधि के रूप में नामांकित किया गया।

गांधी जी ने 11 मार्च, 1932 को भारत सचिव सैम्यूल होर को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि दलित श्रेणियों कि राजनैतिक अधिकारों की मांग को दूसरे गोलमेज़ में उनके द्वारा बताए गए कारणों से स्वीकार न किया जाये। गांधी जी ने अपने पत्र में यह भी लिखा- “अछूतों का मामला भिन्न प्रकार का है। मैं विधानमण्डल में उनके प्रतिनिधित्व के विरुद्ध नहीं हूं। मैं इस हक में हूं कि उन्हें शिक्षा और सम्पति की शर्तों के पूरा किए बिना भी मताधिकार प्रदान किया जाए। चाहे ये शर्ते अन्यों पर लागू रहें, परंतु मैं मानता हूं कि पृथक निर्वाचन उनके लिए व हिन्दू धर्म के लिए हानिकारक होगा।” इस से साफ लगता है कि गांधी जी को दलित हितों की कम हिन्दू धर्म में विच्छेन की अधिक चिंता थी।

तत्पश्चात 8 सितंबर, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्ज़े मैकडोनाल्ड ने गांधी जी के पत्र के उत्तर में लिखा, “दलित श्रेणियों के विभिन्न संगठनों से प्राप्त याचनाओं के दृष्टिगत और जिन सामाजिक विकलांगताओं के चलते वे जीवन यापन करते हैं, जिसे आपने भी प्राय: स्वीकार किया है, हमने इसे अपना कर्त्तव्य समझा कि उनके अधिकारों की सुरक्षा हेतु इन श्रेणियों को विधानमंडलों में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाये। हमने यह भी ध्यान रखा है कि यह समुदाय हिन्दू समाज से विभक्त न हो। आपने अपने 11 मार्च, 1932 के पत्र में स्वयं ही स्पष्ट किया था कि आप उन्हें प्रतिनिधित्व देने के विरुद्ध नहीं हैं।

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सरकार की योजना के अनुसार दलित श्रेणियां हिन्दू समुदाय का हिस्सा रहेंगी और हिन्दू समुदाय के साथ बराबर रूप में मतदान करेंगी। किन्तु प्रथम 20 वर्ष तक वे मतदाता के रूप में हिन्दू समुदाय का हिस्सा रहते हुए उनके लिए सीमित संख्या में विशेष चुनाव क्षेत्र बनाए जायेँगे ताकि उनके अधिकारों और हितों की रक्षा हो, जोकि वर्तमान परिस्थितियों में बहुत आवश्यक है। जहां ये चुनाव क्षेत्र बनाए जायेँगे वहां दलित श्रेणियां सामान्य हिन्दू चुनाव क्षेत्रों में मताधिकार से वंचित नहीं होंगी, बल्कि उन्हें दो मत डालने का अधिकार होगा ताकि उनकी सदस्यता हिन्दू समाज में भी बनी रहे। हमने जानबूझ कर दलित श्रेणियों के लिए जिसे आप सांप्रदायिक निर्वाचन कहते हैं, की व्यवस्था नहीं की और उन्हें सामान्य चुनाव क्षेत्रों में भी मतदान का अधिकार दिया, ताकि उच्च जाति के उम्मीदवार भी उनसे समर्थन मांगें अथवा दलित श्रेणियों के उम्मीदवार उच्च जाति के लोगों से समर्थन मांगें। इस प्रकार हिन्दू समाज की एकता को बनाए रखा गया है।“

ब्रिटिश सरकार के उपरोक्त निर्णय के विरोध में एक तरफ गांधी जी ने अपनी घोषणा के अनुसार 20 सितंबर, 1932 को अपना आमरण अनशन शुरू कर दिया, जिससे पूरे देश में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। दूसरी ओर डॉ. अम्बेडकर अपने निश्चय पर अडिग थे। इस लिए मदनमोहन मालवीय ने इस नाजुक और परेशानी में डालने वाली स्थिति का मूल्यांकन कर, महान संवैधानिक वकील तेज़ बहादुर सप्रू से आग्रह किया कि वह एक ऐसी योजना तैयार करें जिससे गांधी जी के जीवन की भी रक्षा हो जाए और दलित श्रेणियों को ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए राजनैतिक सुरक्षा के उपाय भी बन रहें। क्योंकि मालवीय ने दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लिया था इसलिए वह दलित श्रेणियों की मांगों को जानते थे। तेज़ बहादुर सप्रू ने पहले और दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में दलित श्रेणियों के लिए पृथक निर्वाचन को सही ठहराया था। तेज़ बहादुर सप्रू न तो कांग्रेस के आदमी थे और न हिन्दू महासभा अथवा दलित श्रेणियों के सदस्य। वह अपने सार्वजनिक जीवन के आरंभ से ही भारत के उदारवादी दल के एक सवर्ण हिन्दू नेता थे।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिक पंचाट में एक व्यवस्था यह रखी थी कि यदि सवर्ण हिन्दू नेता और दलित नेता आपसी कोई समझौता कर लेते हैं तो सांप्रदायिक पंचाट में तदानुसार फेर बादल किया जा सकता है या उसे रद्द किया जा सकता है। इस प्रकार 24 सितंबर, 1932 को सांय 5 बजे डॉ. अंबेडकर और गांधी के बीच एक समझौता हुआ जो ‘पूना समझौता’ के नाम से जाना जाता है और जिसे इतिहास में दलितों के लिए ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाएगा। जो आगे चल कर स्वतंत्र के भारत संविधान में सामाजिक न्याय के प्रावधानों के रूप परिलक्षित हुआ।