साथियो! मेरा एक सपना है,
एक अदद मकान बनाना चाहता हूं,
जिस की चार दीवारें-
स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र-
न्याय की होंगी,
और छत होगी संविधान की।
दरवाजे, खिड़कियां, रोशनदान-
सब खुले होंगे,
कि चारों दिशाओं की आज़ाद हवाओं की
महक, बेरोकटोक अंदर आये।
फिर उसके अंदर
स्थापित होगा ‘समानान्तर-सह-अस्तित्व’;
और होगी एक वाटिका,
‘समाज-विविधता’ के फूलों-
से लदी हुई
तब ‘वह’ मकान का घर बन जाएगा,
साथियो! मेरा एक सपना है।

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