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तीन तलाक पर फैसला और आगे का रास्ता

कुछ दिन पहले देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक के अति चर्चित विषय पर 3:2 के बहुमत का निर्णय दिया। जिसका अलग-2 पक्षों ने अपने-2 हितों को ध्यान में रखते हुए भिन्न-2 व्याख्याएं की हैं जिसका सिलसिला अब भी जारी है। कुछ लोगों, जिसमें मीडिया भी शामिल है, ने तो इसे ऐतिहासिक, युगान्तरकारी घटना तक करार दिया है। मेरी समझ के अनुसार इस फैसले पर न तो खुश होने वालों को अधिक उछलने आवश्यकता है और न ही दुखी होने वालों को भारी आंसू बहाने की जरूरत है। वैसे भी फैसला सर्व सम्मत का भी नहीं है और बिना शर्त भी नहीं है। एक तो फैसला 3:2 के बहुमत का फैसला है और दूसरा उसमें अन्य कई शर्तें भी शामिल हैं। इस फैसले के अनुसार 6 महीने तक तीन तलाक पर रोक लगा दी गई है। साथ ही केन्द्र सरकार से कहा गया है कि 6 माह के अंदर इस विषय पर विधान लाये। आगे भी कहा गया है कि नए विधान में मुस्लिम व्यक्तिक विधान (रिवाज-ए-आम) का ध्यान अवश्य रखा जाये। जब से यह मामला न्यायालय में गया था कम से कम मेरा जैसा तो जानता था कि निर्णय यही आना है, न इससे कुछ अधिक न इससे कुछ कम। क्योंकि सर्वोच्च निर्णायक न्यायालयों के निर्णयों पर देश के समकालीन सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक हालातों और दबाबों का प्रभाव अवश्य पड़ता है। बहुत ही विरल प्रकरणों में ही कालजयी या एतिहासिक फैसले आते हैं और उन फैसलों को करने वाले भी विरले ही होते हैं। इस फैसले में भी उत्सव या मातम मनाने जैसा कुछ भी नहीं है और न ही यह किसी के लिए एतिहासिक निर्णय है। वैसे भी दुनिया के अन्य कई देशों के मुस्लिम समाजों में तीन तलाक का विषय ही खत्म है। इस देश में इसे सिर्फ राजनैतिक कारणों से अस्तित्व में रखा हुआ था।

इस 3:2 के बहुमत के फैसले में महत्वपूर्ण है तो वह है न्यायधीशों द्वारा निर्णय देने के आधार और क्षेत्र। बहुमत वाले इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश और एक अन्य न्यायधीश ने तलाक को संवैधानिक माना है, क्योंकि उसे उन्होंने भारतीय संविधान की धारा 13 (3)(a) के तहत 1937 के शरीयत अधिनियम का अंग नहीं माना है। जबकि न्यायधीश कुरियन जोजेफ ने तलाक को असंवैधानिक माना है। उसके अतिरिक्त अन्य दो न्यायधीशों ने तीन तलाक को पुरुष की एक सत्ता मान कर इस पर रोक लगाने की बात की है। इस फैसले में अलग-2 न्यायधीशों ने अपने निर्णयों के आधार अलग-2 बनाए हैं। यह भी ठीक है कि इस केस के बेंच में देश में प्रचलित अलग-2 पांच धर्मों में विश्वास रखने वाले न्यायधीशों को लिया गया था। इस निर्णय में रिवाज-ए-आम के महत्व को भी स्थान दिया गया है, संविधान को ध्यान में रखा गया है और मूल धर्म तथा शरीयत में अन्तर करके उन्हें भी उचित स्थान दिया गया है।

माननीय कोर्ट ने देश को दिशा देने की कोशिश की है कि सत्ता में बहुमत होने पर बहुसंख्यकों की मनमानी नहीं चलनी चाहिए। यह सही है कि इस तत्काल तीन तलाक पर बेंच ने 6 माह के लिए रोक लगा दी है, लेकिन इसके साथ ही सरकार को इस विषय पर विधान बनाने का आदेश भी दिया है। मुस्लिम समाज में इस तत्काल तीन तलाक के अलावा भी तलाक के अन्य तरीके भी चलन में है जिन्हें न्यायालय ने नहीं छूआ है। यह कह देना कि तत्काल तीन तलाक पर रोक लगा देने से और उस पर कानून बना देने से मुस्लिम समाज की महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में बराबरी का अधिकार मिल ही जायेगा यह कहना बहुत कठिन है। क्योंकि देश में कई अन्य इसी प्रकार के सामाजिक बुराइयों के विरूद्ध बनाए गए विधान लंबे समय से आज भी लगभग मृत अवस्था में पड़े हुए हैं। कई बार तो उन विधानों का मज़ाक भी उड़ाया जाता रहा है। इसका उदाहरण है सती प्रथा के विरूद्ध अंग्रेजों द्वारा बनाया गया विधान। आज भी देश में कई स्थानों में तो कानून के रक्षकों की उपस्थिति में सती किए जाने की वारदातें होती हैं। सिर्फ वारदातें ही नहीं अपितु उस अवसर और कार्य को खूब महिमामंडित भी किया जाता है। उसके अलावा भी छुआछूत के विरूद्ध पारित विधान आदि कितने ही कानून ऐसे हैं जिन पर आज भी धूल जमी हुई है।

यही नहीं यदि महिलाओं के अधिकारों की बात की जाए तो इस देश में कई समाज, समुदाय और समूह ऐसे हैं जिनकी करोड़ों महिलाओं को आज तक पैतृक सम्पति पर अधिकार नहीं दिये जा सके हैं। बेटियों के नाम शजरा-नसब या पीडिग्री टेबल से काट दिये जाते हैं। इस प्रकार के कार्यों के लिए उस समाज के रिवाज-ए-आम या व्यक्तिक क़ानूनों को हथियार बनाया जाता है। इस मुद्दे पर भी देश भर में आदिवासी महिला अधिकारों के लिए संघर्ष किया जा रहा है। जिसका उदाहरण जनजातीय दलित संघ द्वारा जुलाई, 2016 में राज्यपाल हिमाचल प्रदेश को एक प्रतिवेदन भी दिया गया था। इसके साथ ही इस विषय पर एक अपील सर्वोच्च न्यायालय में निर्णय की प्रतीक्षा कर रही है।

इसके अतिरिक्त भी इस देश में ऐसे समाज, समुदाय और समूह भी हैं जिनमें पैतृक सम्पति सिर्फ बड़े पुत्र को ही मिलती है शेष सबको उससे बेदखल कर दिया जाता है। यह सब किया जाता है अनुसूचित जनजातीय रिवाज-ए-आम के नाम पर।

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