बौद्ध विधा संरक्षण सभा, जिस्पा के अध्यक्ष डॉ. टशी पलजोर के आमंत्रण पर, ज़िला किन्नौर के मुख्यालय, रिकांगपिओ में बौद्ध जगत में खुनु लामा, नेगी रिम्पोछे के नाम से प्रसिद्ध, सुमनम गांव, किन्नौर में जन्मे लामा के जीवन तथा बुद्ध धर्म पर एक चार दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार में भाग लेने के लिए जाना हुआ।

सेमीनार में जाना इसलिए भी स्वीकार किया क्योंकि मैं किन्नौर के दलित लोगों के प्रतिनिधियों शोभा राम आदि से एक बार फिर से मिलना चाह रहा था और इस आंदोलन के बारे में और अधिक विस्तार से बताना चाहता था। इसके साथ ही भविष्य का कार्यक्रम, जिसमें जदस के विस्तार के साथ-2 पुस्तक ‘संविधान के सामाजिक अन्याय’ के अन्य खंडों के प्रकाशन, पिछली पुस्तक का वितरण तथा स्थानीय मुद्दों को उठाते रहने के कार्यक्रम के बारे में चर्चा करनी थी। उसके अतिरिक्त हि.प्र. सरकार के द्वारा भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय को भेजे नए क्षेत्रों के अनुसूचित क्षेत्र घोषित किए जाने को रोकने तथा नए क्षेत्रों के दलितों के हितों को सुनिश्चित करने के बारे में यहां पंद्रह-बीस नामक क्षेत्र के लोगों से मिलना था। इस क्षेत्र का यह (पंद्रह-बीस) नाम जो 14वीं-15वीं सदी से लेकर चला आ रहा है। यह क्षेत्र तत्कालीन रामपुर, रोहडू, किन्नौर के प्रभुत्व क्षेत्र में शामिल था। जिनको खण्ड, खुण्ड, परगना या घोरी कहते थे। आज इस नाम के क्षेत्र ज़िला शिमला और कुल्लू में हैं। जिनमें ज़िला कुल्लू में चार पंचायतें तथा शिमला में 9 पंचायतें है। ये खण्ड, परगना या घोरी आठ वर्ग के थे। दस-सौ, अठारह-बीस, पंद्रह-बीस, बारह-बीस, पंद्रह-सौ, छ:-बीस, बीस-सौ तथा नौ-बीस। इनके नामकरण के अलग-2 मत हैं। एक मत के अनुसार यह राजस्व निर्धारण पर आधारित था। दूसरे मत के अनुसार घोरियां जनसंख्या के आधार पर बनाए गए थे। यद्यपि दोनों मतों को प्रमाणित करने के ठोस साक्ष्य नहीं हैं। इस क्षेत्र के दलित लोगों से मिलना चाहता था और उन्हें आगाह करना चाहता था कि इस क्षेत्र के अनुसूचित क्षेत्र घोषित होने के बाद उनकी दशा भी आज के अनुसूचित क्षेत्रों के दलितों जैसी हो जाएगी, इसलिए उससे पहले जाग जायें।

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15 नवंबर,2016 के 4 बजे प्रात:बिस्तर छोड़ा, एक कप चाय पी और श्रीमति जी और बिटिया मुझे पहुंचाने 5 बजे रोड़ तक आई, 5 बजे पंजाब रोड़वेज़ की बस मिली और 5:15 पर कुल्लू बस अड्डा पहुंचा। 5:30 पर कुल्लू से बागीपुल जाने वाली बस ली और चला। घ्यागी पहुंचकर नाश्ता किया और 2 बजे रामपुर पहुंच गया। वहां पता चला कि मुझे 8 किलो मीटर वापिस जाना पड़ेगा, जहां पर शोभा राम, हरी सिंह और दीवान चंद किन्नौर से आकर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। वापस 3 बजे नोगली पहुंचा, वहां पर एक नए व्यक्ति मोहन जोशी से मुलाक़ात हुई, जो पंद्रह-बीस क्षेत्र से हैं और पुलिस की नौकरी करते हैं। उनके घर उनसे अच्छी बातचीत के बाद 7 बजे के करीब फिर रामपुर की ओर चल पड़े। हरी सिंह का मकान रामपुर शहर के ठीक सामने सतलुज के पार ऊपर टीले पर स्थित है। आधे रास्ते तक ऑटो फिर पैदल पहुंचे। अनुसूचित जनजाति दलित मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई, रात को लगभग 12 बजे तक चर्चा चलती रही। तय हुआ कि किन्नौर में वनाधिकार लागू करवाने से पहले हर कृषक परिवार को 5 बीघा ज़मीन दिये जाने की मांग की जाये, वनाधिकार कमेटिओं में अनुसूचित जनजातीय दलितों का प्रतिनिधित्व और वनाधिकार अधिनियम के अंतर्गत ज़मीनों के दावों में उन्हें प्राथमिकता को लेते हुये कार्य किया जाये। लेकिन तात्कालिक तौर पर किन्नौर के नौतोड़ के केस को जो उपायुक्त किन्नौर के पास पेंडिंग हैं, उन पर की गई कार्यवाही के बारे में पता किया जाये।

उसके अतिरिक्त पुस्तक ‘संविधान के सामाजिक अन्याय-1’ में दी गई किन्नौर की समाज व्यवस्था को सत्यापित किया गया। जिसमें दलितों को मोटे तौर पर दो वर्गों में विभाजित किया गया है। पहला वर्ग है डमङ जिसमें डोम (लुहार), ओरेस (बढ़इ) तथा सुनार शामिल हैं। दूसरा वर्ग है चमङ जिसमें कोली (जुलाह), चनाल तथा सोइ (दर्जी) आदि शामिल हैं। नगाड़ा, ढ़ोल आदि बजाने का काम आमतौर पर डमङ करते हैं, लेकिन जहां डमङ न हों वहां चमङ भी इस काम को करते हैं।

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वर्तमान स्थिति यानि संवैधानिक सुविधाओं का लाभ चमङ ने अधिक उठाया, डमङ काफी पीछे रह गए। जनसंख्या भी डमङ की चमङ के मुक़ाबले बहुत कम है। प्रतिकात्मक रूप से चमार के कार्य पुले आदि चमङ बनाते थे। ड्रेस कोड भी लागू था जिसके अनुसार छोटी जाति के लोगों की टोपी पर काली पट्टी लगी होती थी।

16 नवंबर, 2016 को 12 बजे दिन को शोभा राम अध्यक्ष और हरी सिंह सचिव के साथ रामपुर से रिकांगपिओ की तरफ चले। कड़छम तक उन्होंने साथ दिया वहां पर वे दोनों उतर गए और सांगला अपने घर चले गए। सांगला जोकि भोटी शब्द है का अर्थ है संगे (पौ फटना) तथा ला (पहाड़ की चोटी) यानि रोशन जगह। स्पिती की तरह यह घाटी भी पानी के नीचे की रही है। सांगला की उत्पति के बारे में एक कहानी प्रचलित है। एक समय था जब यह घाटी पानी से भरी हुई थी। तब यहां एक चूहे और बिल्ली का खेल हुआ, चूहे ने बिल्ली से बचने के लिए रातों रात रोक बने पहाड़ को छेद दिया और पानी बाहर निकल गया और पूरा क्षेत्र खाली हो गया और लोग यहां पर बस गये। सांगला की स्थलाकृति कटोरे की तरह है।

रास्ते में बातचीत के दौरान शोभा राम ने बताया कि चौरा और निगुलसरी के बीच सामने सतलुज के पार पड़ने वाले क्षेत्र बड़ी और छोटी कम्बा के मध्य में रास्ता इतना कठिन और भयंकर था कि बाहर से जाने वाले को वहां किसी स्थानीय व्यक्ति के कंधे पर चढ़ कर जाना होता था और शोभा राम जिनकी पैदाइश 1958 की ने यह भी बताया कि 1972 तक उनके लोग भेड़-बकरी के साथ आज के गद्दियों की तरह सर्दियों में उत्तर काशी जाया करते थे। जो किन्नौर के आर्थिक विकास तथा शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति के चलते आज बंद हो चुका है। सांगला के रहने वाले शोभा राम ने बताया कि उत्तर काशी में उनके भेड़-बकरी चराने का स्थान विश्व प्रसिद्ध पर्वतारोहिणी (एवरेस्ट) बछेंद्री पाल का गांव नाकुरि था। उन्होंने बताया कि सांगला से भेड़-बकरियों तथा आदमी के आने-जाने के तीन रूट थे।

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पहला रूट था सांगला-कड़छम-स्युटी, रामपुर-नोगली-बहाली-मूंगरी, रोहडू-टयूनी-मोहरी-रामा सराईं-नाकुरि (उत्तरकाशी) यह रास्ता भेड़-बकरी के साथ डेढ़ माह में तय किया जाता था।
दूसरा रूट था सांगला-रक्षम-छितकुल-दुमति-रानी कंडा-हर सितये-गंगोत्री और नाकुरि यह तीन-चार दिन का रास्ता था (आम तौर मनुष्य का रास्ता)।
तीसरा रूट था सांगला-गणासयास-डोडराक्वार-नेटबाड़-मोहरी-नाकुरि। मोहरी से दो रास्ते अलग होते थे। यहीं से हरिद्वार और देहरादून भी पहुंचा जाता था तथा नाहन-पौंटा साहब भी।
शाम के 3:30 पर रिकांगपिओ पहुंचा और वहां से सराये भवन और सराये भवन के कमरा नं. 12 में छेरिंग दोर्जे के साथ। रात के 8:30 पर दोर्जे सो गए हैं मैं लिख रहा हूं।

 

लाल चन्द ढिस्सा
(सामाजिक कार्यकर्ता)