भारत की बदलती हुई आकांक्षाओं का भाजपा ने किस तरह सफलतापूर्वक उत्तर दिया है उसका एक उदाहरण है भाजपा के शासन काल में लाहौल स्पिती के विधायक डॉ. राम लाल मारकंडे जब मंत्री बने थे तो उन्हों ने लाहौल-स्पिती के अनुसूचित जनजातीय दलितों को जनजातीय सलाहकार परिषद में उनका यथोचित स्थान दुबारा दिलवाया, अन्यथा जो लम्बे समय से उनसे छीन लिया गया था। यह दूसरी बात है कि वे लोग उसका कोई लाभ नहीं उठा सके।

लाहौल स्पिती के अनुसूचित जनजातीय दलितों ने एक लम्बे संघर्ष के उपरान्त पंजाब सरकार से इस परिषद में प्रतिधित्व प्राप्त किया था। इस संघर्ष का विस्तृत विवरण मेरी पुस्तक ‘संविधान के सामाजिक अन्याय, खण्ड-1’ के अध्याय 4, पृष्ठ 70-73 पर दिया गया है। संक्षेप में 1950 में ज़िला लाहौल स्पिती के अनुसूचित क्षेत्र घोषित किये जाने के बाद क्षेत्र के प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के उदेश्य से पंजाब सरकार द्वारा जनजातीय सलाहकार परिषद का गठन किया गया। लेकिन इस नवगठित परिषद में दलितों के प्रतिनिधित्व का कोई प्रावधान नहीं किया गया था। इस बात को स्पष्ट करते हुए उपरोक्त पुस्तक में लिखा है- ‘पंजाब ट्राइबल एड्वाइज़री काउंसिल में दलितों का कोई प्रतिनिधि नहीं था। शेष भारत में अनुसूचित जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सुविधा थी लेकिन इससे वे महरूम थे।‘ (संविधान के सामाजिक अन्याय, खण्ड-1; लाल चंद ढिस्सा)।

परिषद में प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के उदेश्य से लाहौल के जनजातीय दलितों ने संघर्ष करने का निर्णय लिया और ‘इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सन 1955 में….लोघट्टे (लोट नाले) में तमाम लाहौल के दलितों की मीटिंग बुलाई गई…. ।‘ (संविधान के सामाजिक अन्याय, खण्ड-1; लाल चंद ढिस्सा)। उसी कड़ी में ’28 जून, 1958 के दिन कैरों जी (सरदार प्रताप सिंह कैरों, तत्कालीन मुख्यमंत्री, पंजाब) के आने पर जनजातीय दलित समुदाय के काफी लोगों ने स्वागत द्वार पर खड़े होकर उनका स्वागत किया और मांगपत्र पेश किया।‘ (संविधान के सामाजिक अन्याय, खण्ड-1; लाल चंद ढिस्सा)। परंतु काफी समय की प्रतीक्षा के बाद जब कोई उत्तर नहीं मिला तो ‘उपरोक्त फैसले के मुताबिक एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली भेजा गया जिसमें नरंजन दस, धर्म चंद और शिव दयाल शामिल थे।‘ (संविधान के सामाजिक अन्याय, खण्ड-1; लाल चंद ढिस्सा)। अंत में उन लोगों का संघर्ष सफल हुआ और पंजाब सरकार ने टीएसी में लाहौल स्पिती के जनजातीय दलितों के एक प्रतिनिधि को नामांकित करने की मंजूरी दे दी। उन अशिक्षित, पिछड़े, शोषित, साधनरहित, उपेक्षित एवं सीमांत लोगों के संघर्ष की सफलता के बारे उपरोक्त पुस्तक में लिखा गया है- ‘इस मामले में लगभग दो साल बाद सफलता प्राप्त हुई और शिव दयाल को ‘पंजाब ट्राइबल एड्वाइज़री काउंसिल’ का मेम्बर बनाया गया। वह दस साल तक इस पद पर रहे। लेकिन खेद का विषय है कि वह इस दलित समाज के लिए कोई भी काम नहीं कर सके।‘ (संविधान के सामाजिक अन्याय, खण्ड-1; लाल चंद ढिस्सा)।

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इस तरह के कठिन संघर्ष के उपरान्त प्राप्त किये गए इस प्रतिनिधित्व को कांग्रेस पार्टी की सरकार ने क्षेत्र के हिमाचल प्रदेश में विलय के बाद 1966 से दलितों के लिए आवंटित पद उन्हें देना बंद कर दिया। दलितों द्वारा लगातार कांग्रेस पार्टी को वोट देने के बावजूद उनके पक्ष में इस पद को बहाल नहीं किया गया। इस समुदाय के लोग हर सम्भव स्तर पर इस विषय को उठाते भी रहे। लेकिन मार्कण्डे के विधायक रहने के दौरान इसे फिर से बहाल किया गया और शाम लाल को टीएसी का सदस्य मनोनीत किया गया यह अलग बात है कि उन लोगों के लिए उस दौरान भी कुछ नहीं किया गया।

अनुसूचित जनजातीय दलित अस्तित्व, अस्मिता एवं अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए मुझे 40-45 साल हो रहे हैं। हालांकि कुछ एतिहासिक उपलब्धियां भी प्राप्त हुई हैं। लेकिन जिस प्रकार कांग्रेस चाहे वह स्थानीय हो या राज्य का नेतृत्व हो, का रुख निराशाजनक और हतोत्साहित करने वाला रहा है वह अवांछनीय था। इस बात का जिक्र करते हुए पुस्तक संविधान के सामाजिक अन्याय से उदधृत करना चाहता हूं, ‘इस संदर्भ में एक रोचक अनुभव यह है कि इस पूरे दौर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़ किसी अन्य राजनीतिक दल ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। विशेषकर कांग्रेस ने, इस वर्ग के लोग जिसके परम्परागत मतदाता रहे हैं। सबसे निराशाजनक रुख उसी का रहा या कहें कि कांग्रेस, राज्य में जिसकी सरकार थी ने इस मुद्दे पर सोचना भी उचित नहीं समझा। इसके अतिरिक्त खुद को दलितों का मसीहा होने का दावा करने वाले, दलितों के नाम पर राजनीति करने, उनका ठेकेदार बनकर करोड़ों के फंड हजम करने वाले व्यक्तियों, पार्टियों, संस्थाओं आदि की ओर से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, चाहे वे दलित साहित्यकार हों, दलित नेता हों, दलित प्रकाशक हों, दलित अधिकारी हों, दलित संस्थाएं हों या फिर दलित पार्टियां हों। बार-बार लिखने, प्रार्थना करने और मिलने के बावजूद अपवादों को छोड़ कहीं से भी कोई सहायता-सहयोग नहीं मिला। बल्कि इसे सवर्ण मांग करार दिया गया।’

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